Friday, June 11, 2010

भारत की सरकार न्यौत चुकी है भोपाल से भी बड़ा जीनोसाइड... भारत क्या तुम इसके लिये तैयार हो?

भोपाल की टीस फैसले के बाद उभर चुकी है. मुनाफे के वहशी भेड़ियों के द्वारा किया गया वह कत्ले-आम बाहर वालों के लिये सिर्फ चंद तस्वीरें बन कर रह गया है लेकिन भोपाल वालों के सीने में अब भी धधक रहा है.

20,000 लोगों की मौत पर मारा गया $470 मिलियन का तमाचा, आज़ाद घूमते वो बड़े पद वाले जिन्होंने भोपाल में हर नियम की धज्जियां उड़ाईं और सस्ते में छूट चुके छोटे अफसर भारत के शर्मनाक हद तक गिर चुकी न्याय व्यवस्था की कहानी बयां कर रही हैं.

भारत कभी उस दर्दनाक हादसे को भूले न भूले आपके सरकारी हुक्मरान उसे दफना चुके हैं और इसलिये वह तैयारी कर रहे हैं भोपाल से भी बड़े हादसे की. बात हो रही है भारत-अमेरिका के बीच होने वाले न्युक्लियर करार की जो आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखों का वो सपना है जिसे पूरा करने के लिये वो कुर्सी गंवाने की हद तक जाने को तैयार थे.

भूलियेगा नहीं किस तरह आपके ही एक साथी ब्लागर अमर सिंह ने सांसदो को पैसे देकर मनमोहन की सरकार बचवाई (ऐसा IBN पर देखा था).

2039942949_586125a39c

आपको इस न्युक्लियर करार के बारे में पता है? यह वह करार है जो भारत को विश्व शक्ति का दर्जा दिलवा सकता है. वह करार जो भारत को एकलौता ऐसा देश बनायेगा जो संयुक्त राष्ट्र का परमानेन्ट सदस्य न होकर भी मुक्त रूप से परमाणू ऊर्जा के व्यापार में हिस्सा ले सकेगा.

जिसके बाद आयेंगी अमेरिकी परमाणू कम्पनियां भारत में और पैसे लेकर लगायेंगी वह संयंत्र जिसमें परमाणू ऊर्जा से बिजली बन पाये.

लेकिन यह करार सिर्फ पैसे के बदले मिलता तो कीमत छौटी थी. इसकी कीमत हम बहुत बड़ी चुकानी को तैयार हैं. इसकी कीमत हम देने को तैयार है लांखों जानों से. जो इस करार को करने के लिये भोपाल को भुला चुके हैं वो चेर्नोबिल याद कर लें. वहां भी था एक परमाणू संयंत्र जहां पर हुई दुर्घटना के प्रभाव से 100,000 (एक लाख) से ज्यादा जानें कैन्सर से गईं और 10,000,000 (दस लाख) से ज्यादा लोग कैंसर ग्रस्त हुये. यह कह रही है ग्रीनपीस की ताज़ा रपट.

कामन सेन्स कहता है कि किसी भी दुर्घटना को रोकना हो तो ऐसे कठोर नियम बनाने चाहिए जिसमें गलती की कोई जगह न हो. और उन नियमों का पालन न करने वालों को सख्त से सख्त सज़ा देनी चाहिये ताकी कोई कोताही न करे... लेकिन भारत की कांग्रेस सरकार ने कह दिया है कि आप इस देश में आयेंगे तो आपको हम पूरा लाइसेंस देंगे देश में लाखों जानों से खेलने का और अगर आपने दुर्घटना कर दी तो आपको हम पूरी मदद करेंगे बिना किसी जवाबदारी के साफ बच कर जाने को.

भोपाल के नरसंहार के बाद हमारी सरकारी मशीनरी तुरत-फुरत हरकत में आयी... काबिले-तारीफ थी वह तेज़ी, लेकिन तेज़ी थी क्योंकि यूनियन कार्बाइड के दोषियों को बचाना था. इसलिये कानून ताक पर रखे गये, नियम भुलाये गये और ऊपर-ऊपर और ऊपर से आदेश आते रहे दोषियों को बचाने के लिये.

लेकिन इस बार सरकार ने और भी तेज़ी दिखाई है. दोषियों को बचाने के लिये दुर्घटना होने का इंतज़ार तक नहीं किया... पहले ही सर्टिफिकेट दे दिया कि आप चाहें जितनों को मारें हम आपका पीछा नहीं करेंगे. फिर हम मांग लेंगे आपसे चिड़ियों का चुग्गा और डाल देंगे अपनी भिखारी जनता के सामने. और फिर आपको पूरा मौका देंगे निकल जाने का. यही हिस्सा है उस करार का जो भारत सरकार अमेरिका के साथ कर रही है.

युनियन कार्बाइड के 470 मिलिअन तो उसने खुद भी नहीं चुकाये, यह तो उसके इंश्योरेंस की रकम ही थी. इस बार भी अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो मिल जायेगी आपको 460 मिलियन डालरों की भीख क्योंकि यही सबसे बड़ी वह कीमत है जो अमेरिकी कंपनियां चुकाने को बाध्य होंगी अगर कोई दुर्घटना घटी! और यह कीमत तय की है आपकी सरकार ने. अभी-अभी आपकी सरकार ने आपके देश वालों की जान की कीमत 10 मिलियन डालर घटा दी.

आपको कैसा लग रहा है मुद्रास्फीती के इस गिराव पर?

अमेरिकी जानें इस से कई गुना महंगी हैं वहां पर अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो कंपनियां देंगी 10 बिलियन डालर तक. मतलब हर अमेरिकी आपके जैसे 20 के बराबर है. अब तो आपको अपने देशवालों की औकात का सही अंदाज़ा भी हो गया होगा.

वही अमेरिका जो अपने देश की कंपनियो के लिये इतना सस्ता सौदा तलाश रहा है अपने देश में होने वाले तेल के रिसाव पर एक ब्रिटिश तेल कंपनी (BP) पर 10 बिलियन डालरों का जुरमाना ठोकने की तैयारी कर रहा है जिससे वह कंपनी तबाह और बरबाद हो जायेगी.

भारत, क्यों न यह सौदा ऐसे देशों से हों जो दूसरों की जान की कीमत भी समझें? रूस बढ़ा हुआ मुआवज़ा देने को तैयार है. और जर्मनी में तो मुआवज़े की कोई सीमा ही नहीं निर्धारित की जा सकती. तो क्यों इस देश के US रिटर्न प्रधानमंत्री बेताब हैं अपने देशवासियों की जानों का इतना सस्ता सौदा करने के लिये?

Wednesday, June 2, 2010

शीला दीक्षित की दिल्ली सरकार नहीं चाहती की आपका बिजली का बिल घटे – DERC को कीमतें घटाने से रोका

सबसे पहले एक पहेली – पिछले साल दिल्ली की दो निजी बिजली कंपनियों ने कितना मुनाफा कमाया? पहली ने करीब 450 करोड़ रुपये, और दूसरे ने करीब 468 करोड़ रुपये. लेकिन दिल्ली सरकार को लगता है की निजी कंपनियां का मुनाफा बढ़ना चाहिये आम आदमी की कीमत पर इसलिये अप्रेल में उन्होंने बिजली की कीमतें बढ़ाने के लिये पूरी तैयारी कर ली थी. यहां तक की दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बयान भी दिया था कि दिल्ली वालों को बढ़ी हुई बिजली की दरों के लिये तैयार रहना चाहिये

जबकी दिल्ली में बिजली की कीमतों का निर्धारण दिल्ली सरकार का मामला ही नहीं है. यह का है DERC का जो की दिल्ली सरकार के आधीन नहीं है.

तो फिर क्या बात है कि शीला दीक्षित बिजली कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिये इतनी मेहनत कर रही हैं

DERC ने पिछले साल बिजली की दरें बढ़ने से रोकीं और इस साल वह दरें घटाना चाहती है और शीला दीक्षित बढाना, जब दिल्ली सरकार का DERC के कामकाज में दखल बढ़ा तो खुद सोलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को आगे आकर बयान देना पड़ा और दिल्ली सरकार को उसके काम में दखल देने से रोका.

अभी अभी DERC ने कहा है कि बिजली कंपनियों के मुनाफे को देखते हुये कोई कारण नहीं है कि दरें ऐसे ही बढ़ीं रहें इसलिये उन्होंने दरों को 20% तक कम करने की वकालत की है़. लेकिन दिल्ली सरकार ने फिर बयान दे दिया कि दरें नहीं घटनी चाहिये क्योंकि डिश्ट्रिब्युशन कंपनियों को नुक्सान न हो वरना वो DERC को नयी दरें लागू करने की इजाजत नहीं देगी!

DERC ने तो इस बारे में तीनों निजी कंपनियों को पत्र भेज दिया है कि दरे कम करिये लेकिन मई 4 को दिल्ली सरकार ने अपने बनाये गये कानून Delhi Electricity Act का सहारा लेते हुये नई दरों पर रोक लगा दी. DERC का कहना है कि यह रोक गलत है क्योंकि अगर यही दरें रहीं तो इस साल के अंत तक दिल्ली की पावर कंपनियों के पास कुल 4000 करोड़ का सरप्लस आ जायेगा जो की बहुत ज्यादा है!

कैसी है यह दिल्ली सरकार?
आपने वोट दिया थ इसको?

  1. यह है निजी कंपनियों के साथ जिन्होंने पिछले साल 900 करोड़ का मुनाफा कमाकर भी अपना पेट नहीं भरा.
  2. यह रोकता है एक इमानदार संस्था को लोगों के लिये काम करने से.
  3. इसका मुख्यमंत्री बयान देता है कि दिल्ली के लोगों को बिजली के लिये ज्यादा पैसे देने को तैयार रहना चाहिये.
  4. यह बनाती है एक ऐसा एक्ट जिसके जरिये यह DERC को बिजली की दरें घटाने रोक सके.
  5. यह देती है बयान कि DERC का बिजली कंपनी के हितों के विरुद्ध काम करना ठीक नहीं.

क्या हैं वो हित… जानिये --

  • 2004-2005 में NDPL नाम की बिजली कंपनी का मुनाफा था 169.60 करोड़. 2009-2010 में यह बढ़ कर 468.82 करोड़ हो गया. फिर भी दिल्ली सरकार ने इनकी गुहार मानी कि इनका मुनाफा कम है.
  • BSES Yamuna Power का मुनाफा 2007-2008 में 16.89 करोड़ से बढ़कर 2009-2010 में 157.33 करोड़ हो गया. फिर भी दिल्ली सरकार चाहती है कि इन्हें और पैसा मिले.
  • दिल्ली की तीनों बिजली कंपनियों ने अपनी आडिटेड फाइनेन्शियल रिपोर्ट में 2010 में रिकार्ड मुनाफा (अब तक सबसे ज्यादा) दर्ज किया.

दिल्ली की सरकार की मंशा क्या है?
उसकी जिम्मेदारी किसके प्रति है?
क्या दिल्ली सरकार, इसके पदाधिकारी भी ए.राजा की राह पर चल निकले हैं कि देश और जनता की कीमत पर निजी व्यवसायों को करोड़ौं का फायदा पहुंचाना है?


बड़ी बात यह है कि DERC के इमानदार अफसरों में बहुतों का कार्यकाल जल्द ही खतम होने वाला है और दिल्ली सरकार इस फिराक में है कि इसके पदों पर उन लोगों को लाया जाये जो इसके हिसाब से चलें और जो वह चाहे होने दें. क्या इसको ऐसा करने से रोका जा सकेगा?


sheiladikshit
क्या यह चाहतीं हैं कि दिल्ली वाले अपना पेट काटकर बिजली कंपनियों का घड़ा भरते रहें?

Friday, May 28, 2010

सुन्नी मुसलमानों ने किया पाकिस्तान में अहमदियों का कत्लेआम – मुस्लिम देशों में मुसलमान माइनोरिटी असुरक्षित

जुमे की नमाज़ के दिन लाहौर के अहमदिया मुसलमान (जिन्हें पाकिस्तान में कुत्ते से भी बदतर औकात नसीब है) खुदा में भरोसा रखने वाले हर मुसलमान की तरह मस्ज़िद गये, लेकिन उन्हें इल्म नही था कि वह दिन खुदा की इबादत का नहीं, अजाब का होगा. इस्लामाबाद कि दो मस्ज़िदों पर गोली-बारूद, आधुनिक रायफलों, मशीनगनों व ग्रेनेडों से लैस सुन्नी आतंकियों पर हमला बोल दिया और न जाने कितने ही बेकसूर अहमदिया मुसलमानों को हलाक किया.

एक वक्त तो यह था कि इन सुन्नी आतंकियों के कब्जे में 2000 से ज्यादा अहमदिया मुसलमान थे जिनकी जान की कीमत उन आतंकियों के लिये कुर्बानी के बकरों से भी कम होगी. बहुत सारे बेकसूर अहमदियों के हलाक हो जाने के बाद पाकिस्तानी मशीनरी हरकत में आई और आतंकियों को रोका, लेकिन तब तक कितने ही घर बरबाद हो चुके थे.

असल में पूरी दुनिया में जो सुन्नी मुसलमान हैं उनकी अंध धार्मिकता ने ज़हर फैला रखा है. ज्यादातर आतंकी घटनायें सुन्नियों के गुट करवाते रहे हैं चाहे वो हिन्दुस्तान पर हमले हों या अमेरिका में. ये लोग न तो शियाओं को मुसलमान मानते हैं, और अहमदियों को तो इन्सान भी नहीं मानते. इनके मुल्क पाकिस्तान में अहमदियों को कागज़ी तौर पर इस्लाम से अलग किया जा चुका है. ये लोग सूफी मुसलमानों को भी दिन रात बेइज़्ज़त करते हैं और उनके गीत-संगीत पर जोर देने के कारण हिकारत की दृष्टी से देखते है.

अपने भारत देश में अहमदिया मुसलमान इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं और उन्हें मुसलमान होने का पूरा दर्जा हासिल है.

अपने देश में भी चाहे वंदे-मातरम हो, या आतंकियों की तरफदारी भरी बातें, या बेवकूफी भरे फतवे, यह सब करने वाले सुन्नी मुसलमान ही हैं. इस्लाम के सारे अवगुण जैसे ज्यादा बच्चे पैदा करना, औरतों पर अत्याचार की ज़िद यह सब भी सुन्नियों में ज्यादा मिलेगी.

वैसे तो शिया भी निर्दोष नहीं हैं. शियाओं के सबसे बड़े मुल्क ईरान में वहीं पैदा हुये बहाई धर्म का जिस निर्ममता से गला घोंटा गया वह दिल कंपकंपा देता है. बहाइयों के गुरुओं को कैद किया गया, उनपे अत्याचार किये और बहाइयों को मारा गय. कुछ जान बचा कर भागे और उन्हें हिन्दुस्तान ने ही आश्रय दिया, और अपना पूजा स्थल बनाने की जगह भी – दिल्ली में लोटस टैंपल बहाई पूजा स्थल ही है.

यह सब बताने का सार यह है कि सुन्नी मुसलमानों में असहिष्णुता हिंसा का जो रूप ले रही है वह हर मुसलमान देश की माइनोरिटी के लिये दर्दनाक है, फिर चाहे वो अरब देश हों, इराक हो, मलेशिया हो, इंडोनेशिया हो, बांग्लादेश हो या और कोई भी मुसलमान देश, हर देश में माइनोरिटी पर अत्याचार के इतने किस्से खून से लिखे गये हैं कि दुनिया का कागज़ खत्म हो जाये पर कहानियां खत्म न हों.

शिया, अहमदिया, सूफी व अन्य मुसलमान वर्गों को सुन्नियों का पुरजोर विरोध शुरु करना चाहिये जो पूरी मुस्लिम कौम को अतिवादी का तमगा दिला चुके हैं.

फिर भी यह हिन्दुस्तान है जहां इस देश की माइनोरिटी मुसलमान सुरक्षित हैं, और हमारे देश के प्रधानमंत्री ने जैसा कहा कि देश के संसाधनों पर हक भी रखते है, तो भी उन्हें एक बार नारा देकर यह कहने में हिचक क्यों होती है कि जय हिंद!

क्या दूसरों के कत्ल को प्रेरित करने वाले धर्मों से नास्तिक होना बेहतर नहीं है?

आज ही नास्तिक बनिये, धर्म से अपना पिंड छुड़ायें, इन्सानियत अपनायें.

Thursday, May 6, 2010

Delirium and realization

कभी खुद को घेर कर किसी तन्हा कोने में ले जाकर, बाजू कस कर पकड़ कर ज़ोरदार जिरह कर लेनी चाहिये. आप सबसे झूठ बोल सकते हैं लेकिन खुद से नहीं. इसलिये जब आप खुद से सवाल करना शुरु करते हैं तो जवाब इतनी इमानदारी भरे मिलते हैं कि सुनने के लिये दिल कड़ा करना पड़ता है.

आज घर आते वक्त दिमाग में कुछ विचार घुमड़ते रहे. मैं हमेशा खुद् को lone man against religion मानता रहा. ज्यादातर मेरी बातें सुन कर समाजिक लोग नाराज़ होते रहे, और उन्हें नाराज़ करके मुझे खुशी मिलती रही. मैंने कभी किसी वर्ग की चिता नहीं की, क्योंकि मुझे उन्हें न कुछ देना था, न मांगना. लेकिन आज खुद को परखा तो पता चला कि कहीं न कहीं अब मैं उनका अप्रूवल ढूंढ़ रहा हूं. fliअगर किसी का लिखा उसकी सोच का आईना होता है तो मैं अपनी सोच का चेहरा देख कर आज खुश नहीं हुआ. क्या मैं भी एक तरफ झुक चला… मेरी खाल इतनी मोटी हो चुकि की जिस वर्ग में मैं जन्मा अब उसकी कमियं मुझे दिखती नहीं… या मैंने सीख लिया है कि अपनी convenience के अनुसार सच से किस तरह आंखे फेरनी चाहिये.  धार्मिक हिन्दुओं से क्यों मुझे पहले जैसा डर नहीं लगता, चिढ़ नहीं आती… आती उम्र के साथ मैंने भी रुढ़ियों के साथ समझौते का फैसला कर लिया.

आज अपना लिखा देखता हूं तो शर्म आती है. इसलिये नहीं कि मैंने गलत लिखा, इसलिये क्योंकि एक ही गलत के बारे में लिखा. यह तो वही पुराना रास्ता हुआ जिस पर चलने वालों से मैं बचता रहा. पर अब…?

यह बदलाव क्यों हुआ… क्या इसलिये कि अब मैं थोड़ा paranoid हो गया हूं. जो उन पर घटा वह सुन-देखकर मुझे लगता हे कि वह मुझे पर भी घट सकता था. इसलिये अब मैं सहारे के लिये भीड़ तलाश रहा हूं… Their crowd vs. my crowd… असुरक्षा में आदमी भीड़ की तरफ ही भागता है, तो उसी भीड़ की तरफ भागना होगा जिससे डर कम लगे. चाहे उसमें अपना खुद का वज़ूद ही न खोना पड़े.

आईने में मुझे यह नयी सूरत अजनबी सी लगती है. यह तो वैसा ही आदमी है जिसका दोस्त मैं नहीं बनना चाहता था, फिर कैसे मैंने इसे अपनाया.

मैं अपनी नीयत पर शक करना सीखूंगा. जब भी खुद को गलत सोचते महसूस करूंगा तो रोकूंगा. यही शक मुझे फिर खुद पर विश्वास की और ले जायेगा.

Wednesday, May 5, 2010

देश की लोकसभा कुत्तों के हवाले किसने करी?

The parliament has gone to the dogs. देश कि संसद की ज़िम्मेदारी होती है कानून पर बातचीत करना और अपनी सम्मति से पेश हुये बिलों को कानून का दर्जा देना. इस देश की जनता की ज़िम्मेदारी थी वहां ऐसे सज्जन और जागरुक व्यक्तियों को भेजना जो ज्यादा से ज्यादा बिलों को कानून बना पायें और हर मुद्दे पर सजगता से बहस करें. लेकिन लगता है जनता ने संसद को कुत्तों के हवाले कर दिया है.

संसद जब सत्र में होती है तो खबर यही आती है कि इसने उस पर भौंक दिया, उसने इसको काट लिया, एक ग्रुप ने मिलकर दूसरे को नोंच-खसोट दिया… शोर-शराबा… चिल्लम-पें… जूता-झपटी… भौं..भौं..

ताज़ा सर्वे के अनुसार संसद को सत्र के दौरान चलाने के लिये हर मिनट 26,000 रुपये का खर्च आता है. सत्र के दौरान सारे सदस्य हवाई जहाज़ों में लद-लदकर, अपने वीआपी बंगलों में रहकर, सरकारी लाल-बत्ती वाली गाड़ियों में भरकर एक दूसरे पर भौंकने-काटने आते हैं.

संसद में इतनी ज़ोर से भौंकने वाले … नेता यह भूल जाते हैं कि वह सिर्फ संसद के खर्च का ही हर्जा नहीं कर रहे, वह देश को चलाने, बेहतर बनाने के लिये ज़रूरी कानूनों के लागू करने में दिक्कतें पैदा कर रहे हैं. एक द्सरे को गाली देना, फिर उस बात पर अपने दोस्तों, चमचों, गुर्गों को इकट्ठा करके पिल पड़ना यह सब इन कुत्तों को इस लिये सुहा रहा है क्योंकि सब सरकारी खर्च पर होता है.

- 1952-1961 के बीच राज्यसभा में सालाना औसतन 90.5 बैठकें होती थीं जो अब (1995-2001) घट  कर 71.3 रह गईं हैं, लेकिन कुत्तों का खर्चा बढ़ गया है.

- 1952-1961 के बीच सालाना 68 बिल पास होते थे जो अब 49.9 की औसत पर रहे गये हैं (1995-2001).

- 11वीं लोकसभा में कुल समय का 5.28 प्रतिशत भौंकने में बरबाद हुआ, 12वीं में 10.66 प्रतिशत, 13वीं में 18.95 प्रतिशत, 14वीं में 21 प्रतिशत! … मतलब हर बार जनता पहले से ज़्यादा कुत्ते चुनकर भेज रही है.

लेकिन यह कुत्ते भौकेंगे सरकारी खर्च पर!

2007 में प्रपोज़ल दिया गया कि अगर काम नहीं तो पैसा नहीं की तर्ज पर संसद में हंगामा करने वाले नेताओं की पगार व भत्ते रोक लिये जायें, लेकिन इस प्रपोज़ल को किसी भी राजनैतिक दल ने मंजूरी नहीं दी.

मतलब कुत्ते संसद में आयेंगे. भौंकेगे और सरकारी माल खा-खाकर और मोटे होकर आयेंगे और फिर भौंकेगे.

इस देश की संसद कुत्तों के हवाले किसने की? क्यों की?

इन कुत्तों से देश को बचाओ

हम अपनी भूमी को ‘सुजलाम-सुफलाम’ कहते हैं, लेकिन शायद इसकी नेता पैद करने की कूव्वत आज़ादी की लड़ाई में ही चुक गई. अब सिर्फ कुत्ते पैदा हो रहे हैं जिनमें से सबसे ज्यादा खतरनाक, भौंकेले कुत्ते हम संसद में चुन-चुनकर भेज रहे हैं.

कुत्तों को संसद में बार-बार भेजना हमारी ही गलती है, इसे सुधारने कोई और नहीं आयेगा कोशिश हमें ही करनी होगी.

--------

(इस लेख को पूरा लिखने के बाद महसूस हुआ कि मैंने गलत लिख दिया. इस तरह घटिया शब्द इस्तेमाल करके किसी को बेइज़्ज़त करना ठीक नहीं. नेताओं को कुत्ते कहना सही नहीं है. मुझे कोई हक नहीं है उन्हें गाली देने का.

कुत्ते तो जिसका खाते है, उसका साथ मरते दम तक पूरी वफादारी से निभाते हैं.  नेता अपने देश तक को नहीं छोड़ते… कोई खदानों को लूट रहा है, कोई आइपीएल को, कोई फसलों को, कोई कम्युनिकेशन संपदा उद्योपतियों को बेच रहा है

नहीं… मुझसे गलती हुई. नेताओं को कुत्ता कहकर मैं कुत्तों को इस कदर बेइज़्ज़त कर गया. मुझे माफ कर देना कुत्तों! मैं शर्मिंदा हूं कि मैंने तुम्हें गाली दी.)

Tuesday, May 4, 2010

भारत से सबूत दरयाफ्त करने वाले पाकिस्तान कि अमेरिका के आगे घिग्घी बंधी… देख ली रे जेहादियों कि हिम्मत!

पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर एक बदनुमा दाग़ है… एक ऐसा मुल्क जो दुनिया भर के इस्लामिक आतंकवादियों के लिये पनाहगाह भी है,  और उनके विचारों का पोषक भी.  चाहे तालिबान हो या अल-कायदा या फिलिस्तीन की PLO सभी इस्लामी आतंकवादी संगठनों के तार यहां से जुड़े मिलेंगे.

इस धोखेबाज मुल्क की सरकार एक तरफ तो अमेरिका की चमचागिरी में दिलोजान से लगी है वहीं उन्होंने ओसामा बिन लादेन को भी सरंक्षण दे रखा है और बैतुल्लाह महसूद जैसे तालिबानी कमांडर को मारने की झूठी खबर देकर अमेरिका को भी धोखे में रख चुकी है.

इस देश की सरकार पूरी दुनिया में अशांती फैलाना चाहती है. इसलिये वो आतंकवादियों को स्पेशल ट्रेंनिंग कैम्पों में सरकारी खर्च पर ट्रेनिंग की सुविधा मुहैया कराते हैं. कसाब और उस जैसे दूसरे आतंकवादियों को उन्होंने हिन्दुस्तान भेजा जिसे यह एक सॉफ्ट टार्गेट मानते हैं, लेकिनी अमेरिका जैसे शक्तिशालि मुल्क में भी यह छुप-छुप कर मौत बांट रहे हैं.

pakistan1

लेकिन इस आतंकि मुल्क की इस्लामिक आतंकवादी सरकार में कितनी हिम्मत है यह सभी को पता है. जब अमेरिका एक घुड़की देता है तो यह उसके पालतू कुत्ते की तरह चिचियाते हुए चले आते हैं. अभी अमेरिका में एक विस्फोट करने के लिये इसकी एजेंसी ISI ने आतंकी भेजे लेकिन अमेरिका के सजग तंत्र के आगे इनकी नहीं चल पायी. न सिर्फ यह विस्फोट करने में असफल हुये बल्कि इनके द्वारा भेजा आतंकी गिरफ्तार भी हो गया.

जिस पाकिस्तानी सरकार ने हाफिज़ सईद को गिरफ्तार करने से साफ इन्कार कर दिया और भारत से सबूतों की फरमाइश रख दी अब वह अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाता फिर रहा है और अमेरिका उसकी खूब खबर ले रहा है.

पाकिस्तानी इस्लामिक आतंकवादी की गिरफ्तारी ने इसकी सरकार के होश उड़ा दिये हैं. पाकिस्तान का गीदड़ विदेश मंत्री जो भारत के आगे शेर बन रहा था उसे अमेरिका के दूतावास ने बुलाकर वो फटकार लगाई कि उसके होश ही उड़ गये… बाहर आकर फौरन उसने बयान दिया कि पाकिस्तान अमेरिका की हर मदद करेगा.

वैसे भी अमेरिका अपनी आंतरिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता. पाकिस्तान को उस पर हमले की कीमत महंगी चुकानी पड़ेगी. आने वाले दिनों में हम सब यह आशा कर सकते हैं कि अमेरिका की पहल पर इस्लामिक आतंकवाद पर पाकिस्तान को शिकंजा कसने पर मजबूर किया जायेगा. इससे यकीनन भारत को भी शांति मिल सकती है़

लेकिन मेरा विचार है कि पाकिस्तान जैसे कट्टरवादी मुल्क का यह समाधान नहीं हो सकता. इस देश में धार्मिक उन्माद और कट्टरवाद इतना कूट-कूट कर भरा है कि या तो इसके देशवासी ही इसे नष्ट कर देंगे, या फिर अंतत: इसका भी वही हश्र होगा जो इराक का हुआ और इरान का होने कि पूरी संभावानायें बन रहीं है़

पूरी दुनिया को जाग कर, मिल कर यह फैसला करना होगा. और इस्लामिक कट्टरवाद के पोषक पाकिस्तानियों को लातें मार-मारकर अपने-अपने देशों से बाहर फेंकना होगा.

- विष्णु

आज शाम जब घर पहुंचा तो विष्णु जी का यह लेख तैयार था. वह मेरे पड़ोसी हैं और कल के लेख पर मिली प्रतिक्रियाओं से काफी खुश थे. अगर यही सिलसिला चला तो लगत है कि ब्लाग-जगत में एक और ब्लागर का शीघ्र आगमन होगा - vishwa

Monday, May 3, 2010

इज़राइल के सब्र का पैमाना अब छलकना ही चाहिये

पूरी दुनिया में एक ही देश है जो अपने दुश्मनों से चारों तरफ से घिरा होने के बावजूद भी उनसे लड़ रहा है और इस्लामिक आतंकवाद को इस कदर छठी का दूध याद दिला रहा है कि अगर किसी आतंकवादी को कब्ज़ की समस्या सताती है तो वह इज़राईल का नाम लेता है और बंद दरवाज़े फौरन खुल जाते हैं.

ये है उन देशों की सूची जिन्होंने इज़राइल नाम के इस छोटे, 60 लाख आबादी वाले मुल्क को घेरा हुआ है : लेबनान, जोर्डन, इजिप्ट, सीरिया.

israel_lebanon_map-300x276

इन कायर आतंकवादी देशों के साथ मिलकर इस्लामिक फंडामेंटिलिस्टों ने एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, पूरे चार बार इज़राइल पर हमला किया. पहली बार 1948 में, फिर 1956 में, फिर 1967 में फिर 1973 में... याद रहे इन आतंकी कायरों ने हमला किया, इज़राइल ने नहीं. लेकिन फिर इज़राइल ने इनकी हर बार ऐसी तीन-ताल बजाई कि इनके आतंकी मंसूबे पानी में मिल गये और यह इज़राइल के जलाल के आगे पनाह मांगते फिरे.

इज़राइल ने युद्ध के दौरान इन कायर धर्मांधों की बहुत सारी जमीन कब्जे में भी कर ली, लेकिन हर बार दया करके इनकी सारी जमीन इन्हें वापस कर दी (ठीक भारत की तरह). क्या कोई इस्लामिक आतंकी गुट ऐसा करेगा? नहीं वह सारी देसी जनता की हत्या कर, उनकी संस्कृति, उनके धर को नष्ट करना चाहेगा, लेकिन इज़राइल ने कई मौके मिलने के बावजूद भी ऐसा नहीं किया.

असल में इज़राइल के खिलाफ सारा युद्ध उन लालची अरब देशों के द्वारा स्पांसर्ड है जो पैसे के लिये अपनी मातृभूमि को तो बेच ही चुके हैं.

इज़राइल भी इन लालची अरबों को एक हड्डी दिखाकर बनाया गया. 1923 में टर्की ने इज़राइल का हिस्सा ब्रितानिया के हवाले किया जिसे ब्रिटेन ने जोर्डन को दे दिया. फिर 1947 में दूसरे विश्व युद्ध में जब लाखों यहूदियों की मौत के बाद यहूदियों ने पुरजोर तरीके से अपने लिये एक देश की मांग उठाई तब यू-एन ने इस हिस्से को दो भागों में बांटा और इज़राइल का निर्माण हुआ.

उसी समय आसपास के सारे इस्लामिक देशों ने इज़राइल पर अपना कब्जा जताया और ये घोषणा कर दी कि वह इज़राइल के खिलाफ अपना घटिया धार्मिक जेहाद कर रहे हैं (जेहाद आतंकवाद का दूसरा नाम है). फिर उन भेड़ियों ने अपने देशों मे रह रहे यहूदियों का उत्पीड़न शुरु कर दिया, हजारों यहूदियों को मारा गया और लगभग साढ़े तीन (350,000) यहूदियों को जान बचाकर देश छोड़ना पड़ा (अब इन्हीं कातिलों को जब इज़राइल भगा रहा है तो यह दुनिया भर के सामने छाती पीटन कर रहे हैं).

युद्ध में जब यह इस्लामिक आतंकवादी पीटे गये तो इन्होंने अपना पुराना तरीका छिपा हुआ आतंकवाद शुरु कर दिया (जैसा पाकिस्तान भारत के खिलाफ कर रहा है). इन अरबी आतंकियों ने मुस्लिम मुल्लों से अपने नौजवानों को भड़कवाया, फिर उन्हें हथियार दिये और झौंक दिया इज़राइल पर आतंकी कार्यवाही में. इन आतंकवादियों ने इज़राइल को बहुत त्रस्त किया, वहां बम विस्फोट किये और निर्दोष नागरिकों को मारा. औरतों और बच्चों को भी इन जंगली लकड़बग्घों ने अपना शिकार बनाया. फिर इज़राइल ने वही किया जो एक शक्तिशाली और आत्मसम्मान वाले देश को करना चाहिये. इन्होंने इस्लामी आतंकियों पर कानून सम्मत कार्यवाही की, उन्हें गिरफ्तार किया, मुकाबला किया और कितने ही आतंकवादियों को अपने देश से बाहर खदेड़ दिया.

आज हालात यह हैं कि दुनिया भर के इस्लामी फंडामेंटलिस्ट इज़राइल को इस धरती से मिटाना चाहते हैं. अमीर अरब शेख और इस्लामिक देश इज़राइल के खिलाफ बयान पर बयान देते हैं और इज़राइल को मिटाने के लिये हर कोशिश कर रहे हैं. एक बेहद घटिया और खौफनाक बयान तो इरान के अहमेदिज़ेनाद ने यह दिया कि जिस दिन उसके पास एटम बम आ जायेगा वह इज़राइल को इस धरती पर से मिटा देगा!

तो आज हालात यह है कि इज़राइल के विरोध का विष इन इस्लामिस्टों ने पूरे विश्व में फैला रखा है और क्योंकि यह पैसा और संख्या दोनों में ही ज्यादा हैं इसलिये इनका जहर धीरे-धीरे समझदार लोगों को भी निगलता जा रहा है.

इसलिये आश्चर्य नहीं होना चाहिये अगर इज़राइल का सब्र अब चुक न जाये. यह याद रखना चाहिये की इज़राइल के पास उन्नत हथियार और एटामिक हथियार भी हैं और इज़राइल ने यह भी कहा है कि किसी एटमी हमले की सूरत में वह पूरे अरब को नेस्तानबूद कर देगा. इसलिये जिन कातिलों के मंसूबे इज़राइल को नष्ट करने के हैं उन्हें याद रखना चाहिये कि यह कोई कमज़ोर देश नहीं है जो इनके अत्याचार को सह ले. इज़राइल का तमाचा जब गाल पर पड़ता है तो गाल लाल हो जाता है और वर्षों सहलाना पड़ता है.

अब इस्लामिक आतंकवादियों के दिन लद चुके हैं. इराक तबाह हो गया, अफगानिस्तान भी, और पाकिस्तान भी तबाह हो रहा है. इरान के दिन जल्द ही आने वाले हैं. जो भी देश विश्व में अशांति फैलायेगा उसे नष्ट होना ही होगा

- विष्णु

इस लेख के रचियेता श्री विष्णु पंडित त्रिपाठी हैं जो चैन्नई के एक मंदिर में पुजारी हैं और आतंकवाद का 'वैज्ञानिक अध्ययन' कर रहे हैं. उनके आग्रह पर आप सब के पढ़ने के लिये उनका यह लेख डाल रहा हूं