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Saturday, February 6, 2010

'बेगुनाहों' ने मार दिया बाटला अभियुक्त को गिरफ्तार कराने वाले मास्टर को

दिल्ली के बाटला कांड के 'बेगुनाह' अब भी जेल में सड़ रहे हैं और उनके सुराग देने पर दिल्ली पुलिस की एटीएस आजमगढ़ जाकर शहजाद को पकड़ लाई. वही शहजाद जिसने कबूल किया कि उसने भी वीर शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा (जिसके परिवार की सुरक्षा दिल्ली सरकार ने वापस ले ली अभी-अभी) पर गोली चलाई थी.

शहजाद को पकड़ने में एटीएस की मदद एक स्थानीय स्कूल के प्रबंधक ने की थी. उसने एटीएस के लोगों को रुकने का स्थान मुहैया कराया और एटीएस को शहजाद के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिये. इनका नाम श्री दिनेश यादव था, जिन्हें अब मार दिया गया है. इस कांड में स्कूल का एक आदमी और भी मारे गये. 

सबसे पहले तो नमन उस शहीद दिनेश यादव को जिसने भेड़ियों के शहर में रहते हुये भी देश का साथ न छोड़ा, और फिर धिक्कार उस दिगविजय सिंह को जिसने अभी-अभी आजमगढ़ की यात्रा कर बाटला कार्यवाही पर सवाल उठाने वालों को यह भरोसा दिलाया कि वह जांच मे 'पूरा सच' निकलवायेंगे.

क्या है पूरा सच दिग्विजय सिंह?

  • क्या मोहनचंद्र कि हत्या आतंकियों ने नहीं की?

हमें भी बताओ तुम्हें किस चीज़ पर शक है.

दिग्विजय सिंह क्या तुम एक बार और जाओगे आजमगढ़ उस शहीद की अंतिम यात्रा में जिसने देशद्रोही आतंकियों के खिलाफ मुहिम में अपनी जान कुर्बान की? या फिर तुम सत्ता के भूखे भेड़िये की तरह सिर्फ वोट खसोटने के लिये ही यात्रायें करते हो?

अब भी जिन्हें बाटला कांड की सत्यता और श्री मोहन चंद्र शर्मा की शहीदी पर शक हो उन्हें शर्म से डूब मरना चाहिये. लेकिन अगर यह शर्म का मामला होता तो डूब भी मरते, यह तो साफ-साफ देशद्रोहियों की साजिश है.

बिहार में चुनाव होते हैं तो मुम्बई में हाहाकर मचता है, और मुंबई में चुनाव होने होते हैं तो बिहार में रेल स्टेशन जल जाता है. सत्ता हथियाने के लिये जो न करना पड़े वो कम है़.

जब देश जल रहा होगा तब सत्ताधारी उसके हाल पर रोयेंगे या नीरों की तरह चैन से बंसी बजायेंगे?

खबर: नईदुनिया के हवाले से.

Friday, September 26, 2008

आप सड़ें चाहे गलें, लेकिन अगर हमारा साथ छोड़ा, तो मिटा देंगे

हिन्दू धर्म की रक्षा हेतू निकल पड़े हैं तेजोमय वीर. ओत-प्रोत है वो भग्वद-भक्ती के भाव में. माने बैठें है खुद को श्रीकृष्णावतार जो संकल्पित है धर्म की ग्लानी और अधर्म के अभ्युत्थान को रोकने के लिये. निकल पड़े है ले-ले लट्ठ, पेट्रोल, तमंचा, चाकू धर्मांतरण के खिलाफ.

बांके वीर, जिनकी छवि देखते ही बने.

धर्मांतरण के खिलाफ इस हिंसक घटनाओं को सिर्फ हालिया घटनाओं का प्रतिफल समझ लेना गलती होगी. यह परिणाम है धर्म के ठेकेदारों की लंबी मुहिम का जिसमें बेकार बैठें हुये नौजवानों को brain-wash करके इस्तेमाल किया जा रहा है. (यही कुछ मौलवी भी कर रहे हैं, और पादरी भी). क्रिस्तानी नक्सलियों द्वारा हिंदू साधू का कत्ल तो बहाना मात्र था इस योजना पर अमली जामा पहनाने का.

बहुत सही खेल है यह. हर धर्म का ठेकेदार जुटा है इसमें कि कहीं लोग धार्मिक रूढ़ियां तोड़ कर आजाद न हो जायें.

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किस भी व्यक्ति को अगवा करना गलत है. उसे अपनी मर्जी के बिना आचरण के लिये मजबूर करना गलत है. यह सरकारी नहीं, इन्सानी कानून की बात है. तो फिर किस बिना पर किसी भी व्यक्ति को कोई भी धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपनाने से रोका जा सकता है?

ये बांके वीर जो धर्मांतरण के खिलाफ चर्च फूंकने में लगे है, क्या आपके उसी परम-पिता परमेश्वर के आदेश पर ऐसा कर रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हर मानव का कल्याण चाहता है?

***

किसी भी चर्च को जलाने से पहले.
किसी भी नव-क्रिस्तानी को सताने से पहले.
किसी भी किस्तानी पादरी को धार्मिक प्रचार से रोकने से पहले.

हम ये क्यों नहीं सोचते कि क्यों धर्म परिवर्तन करते हैं लोग.

क्या देते हैं यह पादरी उस परिवार को जो चला जाता है 'येसू मसीह' की शरण में?
क्यों धुंधले पड़ जाते है आपके पीढ़ीयों के संस्कार?
क्यों लोग छोड़ने को तैयार हो जाते हैं अपने उस समाज, और परिवार को जिसमें से निकाला जाना बहुत बड़ी सजा है?

जवाब है -
एक बेहतर कल.

इस देश में सारी प्रशासनिक सेवाओं, व्यापार, व नौकरियों में हिन्दू ही भरे हैं. देश के बड़े अमीरों में भी अधिसंख्य हिन्दू हैं. फिर भी हिन्दुओं को 'पैसे, और शिक्षा' के द्वारा अपने धर्म के प्रसार करने वाले क्रिस्तानी संगठनों से खतरा महसूस होता है?

क्या हिन्दू धार्मिक संगठन सिर्फ मंदिर और मूर्ति ही बना सकते हैं?
क्या पुजारी-पंडे सिर्फ भजन, श्लोक और दक्षिणा ही जानते हैं?

जिन्हें चर्च के स्कूलों से डर लगता है, उन्होंने गुरुकुलों को क्यों नष्ट होने दिया?
क्या इस्तेमाल होता है उन करोंड़ो अरबों रुपयों का जो हर साल छोटे बड़े मंदिरों में दान के स्वरूप आते हैं?
क्या यह रकम चर्च के हिन्दुस्तान के सलाना बजट से कम है?

तो फिर क्यों चर्च के स्कूल ज्यादा हैं?
क्यों उनकी कल्याणकारी संस्थान ज्यादा हैं?
क्यों वो बेहतर तरीके से खुद को प्रचारित प्रसारित कर पाते हैं?


जो हिंदू 200 करोड़ का मंदिर बनवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं, वो देखें की उसके बगल में दो कमरों का स्कूल भी नहीं. लेकिन हर दो-कमरे के चर्च के साथ दस कमरों का स्कूल बनाया जाता है.

कैसे करेंगे आप उनसे मुकाबला?

***

धार्मिक कदाचारी वह नहीं हैं जो धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं, या वह जो कर रहे हैं.

धार्मिक कदाचारी वह हैं जो अपने धर्म की कमजोरियों (जो नींव है इस समस्या का) की जगह सतही समाधान में जुटे हैं.

ये अपने मकसद में तो क्या सफल होंगे, बस इस देश के देशवासियों को थोड़ा और अलग-थलग कर देंगे.

Monday, September 15, 2008

बदलाव कैसे आता है # 1 - उस काली औरत ने बस के पीछे वाली सीट पर बैठने से इंकार कर दिया

rosa किसी वर्ग को पूरी तरह दबाने के लिये जरूरी है उसका आत्मसम्मान खत्म कर देना. जब अपने लिये खुद के दिल में ही सम्मान न हो तो बहुत मुश्किल है किसी दूसरे के हाथों अपना अपमान रोकना.

ऐसे माहौल में बदलाव की उम्मीद भी महंगी जान पड़ती है. लोग सोचते हैं बदलाव के लिये भीड़ इकट्ठी करनी पड़ेगी, भाषण देने होंगे, जुलूस निकालने होंगे. लेकिन बदलाव के बीज तो इस सबसे बहुत पहले बोये जाते हैं. जिस तरह रोसा पार्क्स ने बोये.

अमेरिका में रंगभेद के दौर में रोसा का जन्म हुआ. जब उत्तर में तो काले व्यक्तियों को उनके कुछ हक मिलने लगे थे, लेकिन दक्षिण के कुछ प्रांत अब भी काले व्यक्तियों को बराबर का इन्सान मानने को तैयार न थे.

दिसंबर 1, 1955 की सुबह अलबामा में बस से सफर करते हुये रोसा ने बस के आगे वाली सीट एक गोरे के लिये खाली कर पीछे की तरफ बैठने से इंकार कर दिया जो कि कानून के अनुसार काले व्यक्तियों के लिये जरूरी था.

इस पोलीसि को अमेरिका के दक्षिणी प्रांतो में नाम दिया गया था "बराबरी, लेकिन अलग". याद करिये ओर्वैल की एनिमल फार्म - "All animals are equal, but some animals are more equal than others."

यह घातक वार था दक्षिण की अलगवादी नीति पर, और इस घटना के बाद बसों का बायकाट का आंदोलन शुरु हुआ. वह संघर्ष पूरे एक साल चला. बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि काले व्यक्तियों को बस के पीछे वाली सीटों पर बैठने को विवश करना गलत है.

इस तरह रोसा और काले लोगों ने जीता बस के आगे की तरफ बैठने का अधिकार.

जाद:-ए-हुब्बे-वतन (देशप्रेम) में पेंचो-खम का खून क्या
चलने वाला चाहिये, यह राह कुछ मुश्किल नहीं

(सुखदेव प्रसाद)