साम्राज्यवाद - Imperialism. साम्राज्य - Empire. साम्राज्यवादी राज्य एक ऐसा राज्य जिसका उद्देश्य अपने साम्राज्य, या राज्य का विस्तार हो. कुछ लोगों को यह भ्रांति है कि मुसलमान साम्राज्यवाद के लिये अंतिम या इकलौती चुनौती हैं.
यह जो कथित पश्चिमी साम्राज्यवाद है, उसमें भी मुस्लिम हिस्सेदारी है.
आइये समझे की किस हद तक कुछ मुस्लिम राष्ट्र, और संस्थायें न सिर्फ इस साम्राज्यवाद की में शामिल हैं, बल्कि इसकी पोषक भी हैं.
इस समय दुनिया में अगर कोई देश है जो यह दावा करता है कि वो इस्लाम के उस रूप को मानता है जो शरियत में दर्शाया है, वो है सउदी अरब, जहां मक्का है.
मुसलमानों के लिये इस पवित्र देश में सबसे बड़ी मात्रा में जिस तत्व का उत्पादन और निर्यात किया जाता है, वह है तेल. इस तेल के बल पर विश्व की अर्थ-व्यवस्था चलती है.
तेल का सबसे बड़ा आयातक दुनिया का कथित तौर पर सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश - अमेरिका है. सउदी अरब के शासक शेख तेल का निर्यात करके डालरों का आयात करते हैं. लेकिन यह डालर सउद बैंको में पड़े नहीं रहते, इनका निवेश किया जाता है. कहां? क्या किसी मुस्लिम देश में (हां जरूर, आखिर विश्व के आतंकवाद का सबसे बड़ा फाइनेन्सर भी सउद ही है)? नहीं, इस पैसे को लगाया जाता है और पैसा बनाने के लिये.
जिस अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बारे में दावा किया जा रहा है कि वो साम्राज्यवादी है उसमें सउद अपनी सारी आय का 60% निवेश करते हैं, 30% यूरोप में किया जाता है, और 10% बाकी दुनिया में.
सउदी डालरों का ही प्रताप है कि अमेरिकी कंपनियों के पास किसी भी उद्यम के लिये पैसे की कमी नहीं. अमेरिका में होने वाले कुल सलाना निवेश का 35% सउदी अरब से आता है, यह हिस्सेदारी किसी भी और देश से ज्यादा है. सउदी अरब के $860 अरब अमेरिका में निवेशित हैं (जो की अमेरिकी अर्थव्यवस्था का 6% है). और बहुत सारी बड़ी कंपनियां जिन्हें आप अमेरिकी मान बैठे हैं (और जो यकीनन साम्राज्यवादी लगेंगी) असल में अब सउदी अरब की हैं. कुछ कंपनियां जिनमें सउदी अरब ने बहुत बड़ा निवेश किया है - Apple computers, AOL, News Corp, Saks Inc. अमेरिकी बैंक Citibank (याद रखिये यह इस्लामिक बैंकिग के खिलाफ बैंकिग करती है) में भी अबु-धाबी के शेख अल-वालिद का majority stake है.
मतलब बहुत सारी 'साम्राज्यवादी' कंपनियां जिन्हें आप अमेरिकी मान बैठे हैं, असल में अपने मुसलमान आकाओं का ही साम्राज्यवाद फैला रहीं हैं.
साथ ही यह न भूलें की कथित साम्राज्यवादी अमेरिका की तरह इन सउदी देशों में भी दौलत कुछ ही हाथों में फंसी है. यहां के राज परिवारों पर आरोप है कि इन्होंने लगभग $800 अरब देश से बाहर छुपा रखा है.
इन देशों में एक तिहाई से आधी जनसंख्या बेरोजगार है. इन्हीं का ध्यान अपने द्वारा बनाई गई समस्याओं से हटाने के लिये सउदी राजनीतिज्ञ शोषण-शोषण चिल्ला कर आतंकवाद को हर-संभव मदद पहुंचा रहे हैं. साफ बात है, जिस भी व्यक्ति में क्रांति पैदा करने की ताकत और हिम्मत हो, उसे आतंकवादी बना कर देश से बाहर एक फालतू के डर से लड़ने भेज दो. अब देश में जो बच गया, उस पर सउद राजा आसानी से शासन कर लेंगे.
साम्राज्यवाद सिर्फ सउदी अरब के मुसलमान ही नहीं फैला रहे, दुबई में तो हालात इससे भी बदतर हैं. दुबई कि कंपनियां सारे विश्व में मशहूर है अपने न्याय विरोधी तरीकों के लिये. इनका लक्ष्य कुछ भी करके कान्ट्रेक्ट हासिल करना रहा है, और मौका मिलने पर यह लोगों को बेवकूफ बनाने की हर संभव कोशिश करती हैं.
अभी थोड़े ही दिनों पहले दुबई की एक कंपनी Emaar MGF ने भारत में पब्लिक इश्यु निकाला. इसे स्टॉक बूम का फायदा उठाने के लिये इतना महंगा रखा गया कि यह इस कंपनी की parent company की कुल कीमत से भी बड़ा रहता. लेकिन भारतीय निवेशक बेवकूफ नहीं बने, और यह असफल रहा.
बाकी कौन से मुस्लिम देश बचे? विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम देश - Indonesia. यहां का सलेम ग्रुप भी भारत-भूमि पर वाम-मार्गियों से सांठ-गांठ करके बहुत सी उपजाऊ भूमि हथिया चुका है जिसका विरोध भी हुआ है. यहां पूरी तरह से मार्केट अर्थ-व्यवस्था हैं.
मलेशिया में मुस्लिम बहुल आबादी की एक ही आकांक्षा है, उनसे अमीर चीनी व्यापारियों को खदेड़ कर व्यापार पर कब्जा करना. चीनियों को तो दमदार चीन की वजह से नहीं दबा पाये, लेकिन भारतियों को एकदम साम्राज्यवादी तरीकों से कुचल रखा है. (कुछ ही दिन पहले भारतीयों से विरोध का भी हक छीन लिया गया, याद कीजिये वो खबरें जिसमें अत्याचार विरोधियों को आतंकवादी बताया गया).
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असल में यह भूल भोले लोग करते हैं फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, इराक आदी को देखकर.
सच तो यह है कि उक्त सारे देश साम्राज्यवाद से नहीं, अमेरिका, या पश्चिम से लड़ रहे हैं. इसलिये नहीं की इनको साम्राज्यवाद से कोई परेशानी है, बल्कि इसलिये की सिक्का इनका नहीं चल रहा. (इराक तो खासा साम्रज्यवादी रहा है, और इरान भी -- इन देशों के आपसी, और कुवैत से होने वाले युद्ध याद करें)
जो एकाध देश छूट गये उन पर दया कीजिये, उनके लिये साम्राज्यवाद विरोधी होने के अलावा कोई चारा नहीं, क्योंकि उनके पास तो खाने-पीने की ही समस्या है. मतलब अगर वो साम्राज्यवादी होने का दावा करते तो बात यूं रहती - जेब में नहीं दाने, अम्मां चली भुनाने.
क्या अब भी आप इस सपने में जी रहें हैं कि मुसलमान साम्राज्यवाद के लिये अंतिम चुनौती हैं?