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Sunday, May 3, 2009

सरकार को पता है कि स्विस बैंको में माल किसका है, लेकिन आपको पता नहीं चलेगा

कांग्रेस के काम में भी बात है. वह जो भी करते हैं खुल्ले में, पूरे शानो-शौकत गाजे-बाजे के साथ करते हैं और कहते हैं, लो बेट्टा, कल्लो जो करना है. अपने पूर्व वित्तमंत्री चिदम्बरम जी ने पहले कहा कि उन्हें जर्मन सरकार ने नाम नहीं दिये – ‘लीगल प्रोसेस है भाई, समय लगता है’. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दर्ज ताजे हलफनामे में सरकार ने कहा की हां हमें नाम मालूम है.

खबर यहां पढ़ सकते हैं :

पहले ही पैरा में लिखा है : सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा दिया कि हमारे पास जर्मनी से स्विस बैंको के खातेदारों के ब्यौरे हैं, लेकिन हम 'confidentiality' की वजह से नाम जाहिर नहीं कर सकते.

नाम मालूम हैं?

मतलब उन्हें पता है कि किस-किस ने देश का धन चोरी किया.

piles_money बहुत सही खबर सुनाई है सरकार है. नाम पहले ही पता चल गये होंगे. उधर आडवाणी चिल्ला रहे थे कि भाई नाम लाओ, नाम लाओ इधर तो सारा कार्यक्रम हुआ बैठा है बिना बात को चिल्लाये आडवाणी. चलो जब सरकार को इन बेईमानों के नाम मालूम पड़ गये तो हमें भी चैन मिला. अभी सरकार करेगी प्रेस कान्फ्रेंस और छपेगी सारे नामों की लिस्ट. फिर जनता भी नेताओं वाले जूते लगा-लगाकर इन चोरों के सर सुजा देगी.

सही प्लानिंग है न भाई? अरे.. कहां चले? जूता खरीदने? जरा ठहरो भाई जरा बाकी एफिडेविट तो पढ़ लें.

ओये! यह क्या लिखा है? सरकार कहती है कि जनता को नहीं बतायेंगे कि किन-किन के नाम है.

जनता को नहीं बतायेंगे? क्यों नहीं बतायेंगे? क्या इसमें भी देश की सुरक्षा में जंग लग जायेगी? आतंकवादी छोड़ने पड़ेंगे?

नहीं, चोर पकड़ने पड़ेंगे.
भाई जब सरकार को मालूम पड़ गया है कि चोर कौन-कौन है तो क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि सरकर धरे उन्हें? सरकार ने कह तो दिया कि कर विभाग करेगा, लेकिन कब करेगा?

आपने सुना कि कोई बड़ा आदमी पकड़ा गया?
कहीं टैक्स बाबू रेड डालने गये? या फिर ये सिर्फ हमें आपको परेशान करने के लिये हैं.

चुनाव होते-होते तक सरकार ने कभी नहीं कहा कि हमें पता है,
वो कहते रहे कि ‘क्यों बोला, भई क्यों बोला’ अब जब चुनाव हो चले, वोट डल चुके तो सरकार ने कह दिया, हमें पता है, लेकिन हम कुछ नहीं करेंगे बोलो क्या कल्लोगे?

तो वोट दे दिया आपने? पेटी बंद. अब जाओ नहीं लाते देश का पैसा वापस. नहीं बताते चोरों के नाम

क्यों नहीं बताते?
भाई हिन्दू संस्कृति है, बीवियां अपने शोहरों के नाम नहीं लेती. हमारी सरकार कोई खसमानूंखानी थोड़े ही है.


confidentiality? किसको बचा रही है सरकार?

Monday, April 13, 2009

हिमाकत देखिये… गलत वक्त पर सही बात!

चुनाव का समय है, आजकल नेतादर्शन कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं. नेतागण टीवी पर भारी डिबेटें कर रही हैं और उसमें लचर-लचर दलीलें आंय-बांय बक रहे हैं, हम मुंह फाड़े झेल रहे हैं.

ऐसी ही एक दलील का पोस्टमार्टम करते हैं

दलील है – गलत वक्त पर सही बात

बानगी पेश है : आडवाणी ने देश का पैसा वापस मंगाने की बात अब ही क्यों उठाई… क्यों उठाई अब? बोलो? जवाब दो… अब ही क्यों?

chup karटेप लगा दो मुंह पर, फिर नहीं बोलेगा. 

क्यों भैया कोई खास मुहुर्त चल रहा है इस समय जिसमें देश कि भलाई की बात करना मना है? भाई मेरे तुम ये न पूछ रहे कि बाकियों ने अब भी क्यों नहीं उठाई, तुम ये पूछ रहा हो कि जिसने उठाई उसने भी क्यों उठाई?

घसियारा लाजिक है. बल्कि घास चरके लीद किया हुआ लाजिक है.

देश हित की बात है. देश का पैसा है. टैक्स दिये बिना, घूस-वूस में कमा के देश के बाहर भेज दिया. कोई लाख-दो लाख नहीं 25 हजार करोड़ है. अगर कोई आदमी चुनाव के समय ही सही, अगर यह कहे की भैया देशचोरों से पैसा वापस लाना है तो इन्हें ऐतराज है?

खबर तो पिछले साल से है कि जर्मन सरकार नाम बतलाने के लिये तैयार थी. यहां तक की नवंबर में मैंने भी इसका जिक्र किया था (http://wohchupnahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html, नीचे जा के पहला पाइंट देखिये) अपने पत्रकार भाई लोग तो बिना बात की बकवास करके नोट जुटाने में चिपे थे… तो भैया तब तो न उन्होंने, न तुमने इस बात का जिक्र किया. तकिये के नीचे दबाकर बैठे थे. अब अगर बात उठी है तो इसे उड़ाने की बजाय बिठाकर गौरवान्वित कर रहे हो़? नेता लोग तो पहले ही अजब-गजब थे, और अब अपने देश के पत्रकार गजब-अजब हो रहे हैं.

इधर कोई चिल्ल मचा रहा है ‘ऐं क्यों बोला अब..’ उधर कोई बिलबिला रहा है ‘ओये.. अब क्यों बोला..’

सच्ची-सच्ची बोलूं?

बात यह नहीं है कि अब ही क्यों बोला.. बात यह है कि भैया -- क्यों बोला!… बोला ही क्यों! --  क्यों ही बोला!…

अब नहीं भी बोलता तो जब भी बोलता तब भी ‘अब बोला?’ कर देते अपने गुणीजन.

अबे थोड़ी तो शर्म करो… क्या इसी दिन के लिये देश का नमक खा कर बड़े हुये हो?

Saturday, February 28, 2009

तो अब शिवराज हर आवाज़ को दबा देंगे?

शिवराज सिंह ने कठिन समय में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव क्या जीत लिया उन्हें लगने लगा कि सारे मध्य प्रदेश का निर्बाध कब्जा उन्हें मिल गया, कि लो ठाकुर अपनी मिल्कियत चलाओ अपनी मर्जी से. और अगर इनकी जागीर में कोई ऐसी आवाज़ उभर आये हो जो इन्हें रास न आये, तो उसे अपने हथकंडो से दबाना भी ठीक उसी तरह इन्होंने सीख लिया है जिस तरह से फिल्मों में कोई दबंग जमींदार.

मैं बात कर रहा हूं शमीम मोदी की जो सालों से मध्य प्रदेश के सबसे निचले तबके - ग्रामीण, गरीब, आदिवासी लोगों के हित में आवाज उठा रहीं हैं. इनकी बातें और काम यहां के अमीर इन्डस्ट्री मालिकों के गले नहीं उतरा जो वन के संसाधनों का उपयोग वनवासियों के हित ताक पर रख के अपने हितों के लिये करना चाहते हैं. शिवराज सिंह चौहान पर गरीब लोग दबाव बना पाते हैं कि नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन इस इन्डस्ट्री लॉबी ने अपने मुख्यमंत्री को 48 घन्टे दिये थे शमीम से छुटकारा दिलाने के लिये और वहां कि पुलिस ने यह काम 24 घन्टों में ही कर दिखाया.

shamim
लाल घेरे में हैं शमीम मोदी, इन्होंने ही अपहरण वगैरा को अंजाम दिया है. देख कर ही डर गया ऐसी दबंग महिला को मैं. आप डरे...?

तो एक सालों पुराने झूठे अपहरण के केस को खोद निकाला गया और शमीम मोदी को गिरफ्तार कर लिया गया. मजे कि बात तो देखिये, जिस व्यक्ति का अपहरण का यह केस था, वह उसी समय अदालत में मौजूद था, और उसने जज से कहा कि ऐसी कोई भी बात नहीं. फिर भी शमीम को गिरफ्तार किया गया.

असल में बात सिर्फ इतनी सी है कि हर्दा जैसी छोटी जगह में इन मोटी आसामियों का राज नहीं चलेगा, तो किसका चलेगा? गरीब आदिवासियों को तो अपने हक का पता भी नहीं. जो लोग जंगलों का बेलाग दोहन कर रहे हैं वो नहीं चाहते कि कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति जंगल वासियों को उनका हक समझाये, या उनके लिये आवाज उठाये. इसलिये शमीम मोदी जैसे लोगो को तुरत-फुरत डराने और निकालने की इन्हें सख्त जरुरत महसूस हो रही है.

दरअसल शमीम मोदी के संगठन का नाम है श्रमिक आदिवासी संगठन और इसके काम के चलते जब आदिवासी श्रमिकों को पता लगने लगा कि उन्हें किस कदर दुहा जा रहा है तो उन्होंने अपने मालिकों से शिकायतें कीं. और जब ऐसा हुआ तो मालिक साहबों को बुरा लगा, उनका आरोप है कि 'अपने कर्मचारियों की बढ़ती शिकायतों से वो परेशान हैं' ('they feel harassed by the growing complaints raised by their employees') और समाधान क्या निकाला? शिकायतों का कारण दूर करने के बजाय शमीम को दूर कर दीजिये!

शमीम को 10 फरवरी को गिरफ्तार किया गया और इस समय यह होशन्गाबाद जेल में बंद हैं. और लगता है कि समाज के पुरजोर विरोध के बावजूद राजनीतिज्ञ-उद्योगों के मिलिभगत से यह अभी वहीं रहेंगी.

शमीम कोई नकसली महिला नहीं हैं. वो कोई डॉन-शॉन भी नहीं हैं. शायद उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि उनमें संवेदना है. इसका फल तो वो भुगत रहीं हैं. इस समाज में गुंडो और भ्रष्टों की बन आई है, और इन सबका ख्याल रख रहे हैं अपने मुख्यमंत्री.

जो पत्रकार हर बात-बेबात के मुद्दे को हवा में उछाल रहे हैं, क्या वो इस तरफ ध्यान देंगे?

और हां, अगर आपको लगता है कि जिस तरह म.प्र. में इंसानियत को सूली पर चढाया गया वह गलत है, तो जरा शिवराज जी के बॉस को बता देना. lkadavani.in पर आडवाणी जी का दर खुला है. क्या उन तक यह खबर आप पहुंचायेंगे?

और शिवराज भैया, लोकसभा चुनाव तो होने हैं. जनता के ऊपर मूंग दलेंगे तो वहां क्या मुंह दिखाइयेगा?


यहां भी पढ़े


शमीम मोदी की रिहाई के लिये पिटीशन पर हस्ताक्षर करे

Wednesday, February 4, 2009

बद और बद, और फिर बदतर

hiding अंग्रेजी में वैसे तो कई कहावते हैं, लेकिन जो मौजूं है उसको थोड़ा उलट-पलट कर कहना चाहता हूं कि -- before it can get bad, it will get worse. मतलब अब जो बद होना है, उसे पहले बदतर भी होना होगा. अगर आप बात का ओर-छोर नहीं पकड़ पा रहे, तो बता दुं कि मैं बात कर रहा हूं विश्व (मेरी नहीं, दुनिया की) के माली हालात की.

अभी थोड़ी देर पहले हंसते-मुस्कराते आॉस्कर फर्नांडीज को टीवी पर अपने सालिम दांतों की सलामी देते हुये देखा. मुद्दआ था कि 5 लाख लोगों की नौकरी पिछले साल के आखिरी तीन महीनों में चली गई, और इस साल मार्च तक 5 लाख और लोग बे-जॉब होने वाले हैं. आॉस्कर ने कह दिया की छ: महीनों की पगार में साल भर काम चला कर नये सिरे से ट्रेनिंग लेकर लोग तैयार हो जायेंगे नयी नौकरी के लिये. मुझे आॉस्कर की मुस्कराहट का राज समझ आ गया. आखिर चुनाव आने वाले हैं, नौकरी तो उनकी भी जाने वाली है. शायद उन्हें मालुम है कि कांग्रेस सरकार रहे या जाये, ये मुसीबत तो अब किसी और के ठीये ही पड़ेगी. तो इसलिये 10 लाख लोगों कि चिंता उन्हें नहीं सालती और वो इस मंदी में मुस्करा लेते हैं जहां हमारे-आपके नौकरी बजा लाने वाले लोगों के चेहरे घबराहट से सूख रहे हैं.

मंदी में पेंच बहुतेरे हैं, जो कंपनियां कुछ साल पहले 50% से ऊपर का महा-मार्जिन कमा रहीं थीं, वो आज आहत हैं कि उनका प्रोफिट मार्जिन सिर्फ 25% रह गया है (आज यह पार्श्वनाथ बिल्डर के बारे में एक लेख में पढ़ा). मतलब मौके की सारी जमीन पर कब्जा कर के जबरिया घर-आफिसों के दाम उछाल कर आपको ज्यादा चूना न लगा पाने का गम इन्हें साल रहा है. तो अब यह करोड़पति खड़ें हैं सरकार के सामने कटोरा लेकर और सरकार दरियादिली से इनके अंधे कटोरे में करोड़ों रुपये झोंकती जा रही है.

कहने को तो यह सब हो रहा है मंदी की मार रोकने के लिये, लेकिन असल में बाज लोगों ने मंदी में भी मलाई मारने के तरीके निकाल लिये हैं. जरा ठहर कर सोचिये कि इन सब प्रोपर्टी कंपनियों और पूंजी वालों का नुक्सान कम करने की इस कवायद में आपकी हिस्सेदारी कितनी है, जिसे इस मंदी का असली नुक्सान पहुंचा है.

उधर अमेरिका की वाट लगी हुई है, ओबामा ने राष्ट्रपति पद तो संभाल लिया, लेकिन इतने बड़े पद पर होने के बाद भी बड़े उद्योगों की लॉबिइंग के आगे मजबूर नजर आते हैं. इसलिये मंदी के समय पर अपने उच्च ओहदेदारों को 18 बिलियन डॉलर का बोनस देने वाले बड़ें उद्योगों पर सिर्फ चिंघाड़ के रह गये.

अपनी सरकार कहती है की कुछ महीनों में हालात सुधरेंगे. सही है... सुधरना अच्छा सा सापेक्ष शब्द है. कोई अवारा-गुंडा लड़का जिसे बात-बात पर हाथ-पांव चलाने की आदत हो अगर गाली देकर ही काम चला ले तो कहते हैं सुधर रहा है.

इसलिये कह रहा हूं कि बाबू यह इंडिया है... यहां हालात बद थे, अब बदतर होंगे और फिर जब दोबारा बद होंगे तो हम चैन कि सांस ले लेंगे.

Friday, November 14, 2008

तो अच्छा हुआ कि विकास थम गया, और मंदी आ गयी

sales_graph देश और दुनिया के विकास कि वो तेजी, ऐसी की सुधिजन-गुणीजन वाह कर उठे हैं. पिछले 20 सालों में हमारा देश ने क्या सर्रर प्रगति की. शहरों किन-किन तरह की कारें दौड़ उठी हैं. ऐसा ही 20 एक साल और चल जाये तो इंडिया का 2020 हो जाये.

बेरोक-टोक विकाश विश्व का किस कदर दुश्मन हो सकता है, यह जानने से पहले यह जान लिया जाये कि दुनिया का विकास किस कदर हुआ.

विश्व अर्थव्यवस्था का आकार (मिलियन $ में)
1950 - 5336101
1973 - 16059180
1998 - 33725635
2008 - 65000000

मतलब लगभग हर बीस साल में विश्व की अर्थव्यवस्था का आकार दुगुना होता रहा है, और पिछले समय में नये उभरते बाज़ारों के कारण इस गति में किसी कमी के आने के आसार भी नहीं थे. खासकर चीन और भारत में इतने बड़े नये बाजार बन रहे हैं कि आने वाले समय में वो अमेरिका और युरोप के बाजारों से सीधी प्रतिस्पर्धा करेंगे.

लेकिन अर्थव्यवस्था का मतलब सिर्फ उत्पादन ही नहीं, इसका मतलब उपभोग भी है. अर्थव्यवस्था, या उत्पादन के बढ़ने के साथ ही उपभोग भी बढ़ रहा है. मतलब हर बीस साल में उपभोग भी दुगुना हो रहा है.

तो अर्थव्यवस्था के साथ ही हर चीज के उत्पादन की संख्या बढ रही है

कुर्सी, फूलदान, किताबें, डब्बे, दवाईयां, खाद्य, पेय, कपड़े, कारें, जूते, टीवी, बोतलें, विद्युत, गैस, सर पर लगाने का तेल... हर चीज को ज्यादा, ज्यादा, और ज्यादा संख्या में लगातार बनाया जा रह है. और यह सब कैसे बनता है? प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके.

1998 से 2005 तक प्राकृतिक संसाधनो के इस्तेमाल में 30 प्रतिशत की बढ़त हुई. (http://www.swivel.com/graphs/show/21865778)

सात सालों में 30 प्रतिशत की बढ़त!

तेजी से बढ़ती विश्व अर्थव्यवस्था (याद रखिये, हमारी बढ़त साल-दर-साल है. हर साल 10% की बढ़त से सिर्फ आठ सालों में अर्थव्यवस्था दुगुनी से भी बड़ी हो जाती है) की कीमत हमारी पृथ्वी चुका रही है. हम इतनी तेजी से जमीन, धातुओं, तेल, पेड़, आदी का इस्तेमाल कर रहे हैं की पृथ्वी के लिये इसकी भरपाई कर पाना असंभव है. इस तरह की बढ़त लगातार बनाये रखना तो असंभव है, लेकिन जब तक हम उस मोड़ पर पहुंचेगे कि आगे बढ़त पर संसाधनों की कमी से रोक लगे, तब तक हमारी दुनिया को अपूर्ण क्षति हो चुकि होगी.

हममें से हर किसी का मकसद अपने जीवन स्तर को उठाना है, लेकिन अगर हममें से हर व्यक्ति का जीवन स्तर उतना हो जितना की किसी साधारण अमेरिकी का होता है, तो हमें इस जैसी दस पृथ्वियों के संसाधनों की जरुरत होगी.

कहां से लायेंगे हम ये सारे संसाधन?

आने वाले 100-150 सालों तक यही दोहन चलता रहा तो वैसे भी संसाधनो का उपयोग इतना महंगा हो जायेगा कि वो हर किसी को मयस्सर नहीं होंगे, तो कम संसाधनों में रहना तो विश्व के जनमानस को सीखना ही है. लेकिन उस समय तक अति-दोहन के कारण हम downward spiral में प्रविष्ट कर चुके होंगे. प्रदुषण और संसाधनों को नष्ट करने से बहुत बड़ी crisis भी पैदा होगी.

मतलब, अगर मानवों का जीवन स्तर बढ़ेगा, तो जो बोझ पड़ेगा, उसे पृथ्वी सह नहीं सकती. तो फिर कैसे हम हासिल करें सभी मानवों के लिये सही जीवन स्तर, कैसे सबको प्रदान करें एक अच्छी और गौरवशाली जिंदगी, कैसे जब कि पृथ्वी पर साधन इतने कम है?

तो जवाब है एक सूक्ती

"यह पृथ्वी सभी की जरुरत को पूरा कर सकती है, लेकिन एक भी आदमी के लालच को नहीं"

फिलहाल तो इस मंदी को झेलें, और इसे एक मौका मानें यह समझने का कि कैसे हम विश्व की अर्थव्यवस्था को उत्पादन नहीं, मानव के विकास से नाप पायें.

भूटान की GNH (Gross National Happiness) की तरह.

Saturday, October 11, 2008

सरकारी औपचारिकताओं और जुल्म से परेशान छोटे व्यापारी, व्यापार बंद न करें, तो क्या करें

जिस अर्थव्यवस्था को छोटे व्यापारियों और उनके कर्मचारियों ने खून पसीना मिलाकर विश्व स्तरीय बनाया, उसका दोहन ठीक ताजा-ताजा ब्याही भैंस की तरह कर लिये पी. चिदंमबरम ने. सारा दूध काढ़कर बाल्टी में अलग रख लिया, और बछड़े को इतना भी न मिला की वो जिंदा रह सके.

तो अब जब industrial growth rate रेट 11% से घटकर 1.3% रह गयी तो कमलनाथ इतना बौखला गये की आंकड़े बदलने की बात कर डाली. अरे मूर्खों पिछले पांच साल में तुमने इस फसल के सारे फल सूत लिये, अब तो बीज के लिये भी कुछ नहीं बचा.

छोटे व्यापारियों पर तो गिन-गिन कर सितम हुये हैं. उनके लिये अब रोजगार चलाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होने लगा.

1. सर्विस टैक्स
पहले जिन सुविधाओं पर बिल्कुल टैक्स नहीं लगता था, उनपर 5 सालों में 12% टैक्स हो गया. यहां तक की ट्रांसपोर्ट जैसी मूल-भूत सुविधाओं को भी बख्शा नहीं गया. आपके यहां जो दाल-चावल की महंगाई बढ़ी, उसके लिये बहुत हद तक जिम्मेदारी इसी सर्विस टैक्स की है.

असल में चिदंमबरम का उद्देश्य हर तरीके से सरकारी खजाना भरना रहा, लेकिन इस पैसे का उद्देश्य जन-कल्याण के लिये नहीं हो रहा है. अभी भी भारत की शिक्षा और स्वास्थ पर खर्च प्रति व्यक्ति न्यून स्तर पर है.

2. बिल्डर लाबी को बेतहाशा छूट
कांग्रेस और उसकी दोस्त पार्टियां बिल्डरों पर खासा मेहरबान रहीं. जहां-तहां बड़े-बड़े भूमिखंड कभी SEZ, कभी housing projects के नाम पर औने-पौने दामों में बांटे. वहां जो SEZ बन रहे हैं उनमें छोटे उद्योगों के लिये कोई जगह नहीं, असल में वह सिर्फ land prices के speculation का जरिया भर बने.

लेकिन अब उन सारे चोरों को सबक आ रहा है. सब की सब बर्बादी की कगार पर हैं, और उन्हें होना भी चाहिये बर्बाद.

3. मार्केट बंद, मॉल चालू
भारत में मार्केटों का चलन रहा है जहां छोटे-छोटे दुकानदार सस्ता माल लाकर भारत के बहुत बड़े मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग को उपलब्ध कराते रहे हैं. जब मॉल भारत में खुले तो मार्केटों से टक्कर लेना मुश्किल हो गया. लोग मॉल देखने गये, और खाने-पीने, लेकिन खरीदने वही मार्केट में. तो सरकार ने भारत भर में मॉल स्वामियों के दबाव में मार्केट बंद करने की छुपी मुहिम चालू कर दी. कभी किसी, तो कभी किसी कानून का सहारा लेकर मार्केटों और छोटे दुकानदारों पर दबाव बनाना चालू रहा.

4. खुले बाजार के नाम पर विदेशी निवेशकों को बाजार का पटरा करने दिया
बाजार को निवेश के लिये खोलने का बहाना बनाकर विदेशी निवेशकों को न्योता. उन्होंने बड़ी पूंजी के बल पर शेयरों को मन-माफिक उठाने-गिराने का खेल किया और छोटे निवेशकों को फुटबाल की तरह कभी इस पाले तो कभी उस पाले उछाला.

5. FBT, Deposit Tax आदि कानून
पहले कर्मचारियों पर जिन खर्चों पर पूरी टैक्स छूट मिलती थी, उस पर भी कर लगा दिया. मतलब अब व्यापार के लिये फोन और यात्रा पर भी टैक्स देना होगा. इस घटिया कानून के चलते कंपनियों ने कर्मचारियों को दी गई छूटों में कटौती की.

साथ ही यह भी भूलने की बात नहीं की जितने ज्यादा टैक्स जोड़े जाते हैं, उतना ही परेशानी व्यापारियों को झेलनी पड़ती है. उनके लिये आज मुश्किल यह है कि व्यापार के लिये समय लगायें, या टैक्स के झमेलों से निपटने के लिये.

बैंक में जमा खुद की राशी को निकालना पर भी सरकार को टैक्स देना पड़ रहा है. यह तो सिर्फ एक मजाक ही है.

6. विदेशों कंपनियों को सुविधायें, देशी को पेनल्टी
अगर आप विदेशी उद्योग, या बड़े उद्योग के मालिक हैं तो सरकार आपके लिये खास सुविधायें बनायेगी. कानूनों में रद्दोबदल करेगी, और कई जगह तो कानून तोड़ने में मदद भी करेगी. लेकिन छोटे उद्योंगों और व्यापारों को शुरु करने की सरकारी खानापूर्ती ही बहुत सारे उद्योंगों को शुरु होने से पहले ही खत्म कर देती है.

मैकडानल्ड में खाद्य निरीक्षक सलाम बजाने जाता है, और कोने के रेस्तरां को परेशान करने. यही फर्क है बड़े पैसे का.

7. 20 की जगह 10 कर्मचारियों पर PPF
पहले 20 या उससे ऊपर के कर्मचारियों वाली संस्थाओं को ही PPF की सुविधा देनी पड़ती थी, लेकिन इसे 10 कर दिया गया. PPF देने की परेशानी तो छोटी है, बड़ी मुश्किल हैं PPF के रजिस्टर और द्स्तावेजों को बनाना. फिर उन मुफ्तखोर सरकारी अफसरों को झेलना तो और भी मुश्किल है जिन्हें काम नहीं अपने हफ्ते से मतलब है.

इसलिये छोटे उद्योगों के लिये अब भर्ती और कर्मचारियों की छंटनी और भी मुश्किल है.

8. नाना प्रकार के रजिस्ट्रेशन
अगर आप दुकानदार है तों म्युनिसिपाल्टी में रजिस्ट्रेशन कराइये, सेल्स टैक्स में कराइये, सर्विस टैक्स में कराइये, और भी दस जगह दौड़ते रहिये, फिर इन सब जगहों की कागजी खानापूर्ती में साल बीत जायेगा.

पिछले कुछ सालों में इन तरहों की परेशानियों में कमी नहीं, इजाफा हुआ है. इसलिये अब छोटे-छोटे व्यापारियों के लिये राह कठिन होती जा रही है.

9. हर महीने कर का भुगतान
सरकार ने मध्यम स्तर के व्यापारों के लिये बहुत सारे करों का हर महीने भुगतान का प्रावाधान रखा है, और कुछ का quarterly. इन करों का भुगतान करने से पहले बहुत सारी reports का निर्माण करना पड़ता है कि कहीं कमी न छूट जाये. किसी भी व्यापारी के लिये इन सारी reports का निर्माण और analysis का समय अपने व्यापार से निकालना मुश्किल है. महीनावार कर तो बड़ी परेशानी है.

Tuesday, September 30, 2008

अरे! ये महान वाम-पथ के चैंपियन

कम्युनिस्टों की बातें सुनकर एक अजीब सी उत्तेजना होती है. हां, वो दुनिया भी क्या होगी जहां सब बराबर हों. न कोई अमीर हो, न गरीब, हर साधन पर हर व्यक्ति का समान हक हो. कितनी प्यारी होगी वह दुनिया? और किसकी जिम्मेदारी है ऐसी दुनिया बनाना? आइये उनसे मिलें:

Fidel Castro1

1. फिडेल कास्ट्रो
अमेरिकी छाती पर 1959 से मूंग दल रहे हैं यह. अमेरिकी जमीन से कुछ ही दूर इनका देश है क्यूबा, जहां हर बच्चे को पैदा होते ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से नफरत, और अपने नेता फिडेल कास्ट्रो से प्यार सिखाया जाता है.

आये तो थे जिन्दगी पर सभी को बराबर का हक दिलाने. लेकिन 1959 से कुर्सी पर ऐसे बैठे कि उठने का मन फिर नहीं बना. महंगे सिगार पीते हुये सोचते रहे कि किस तरह गरीबों को उनका हक दिलाया जाये. समाधान ढूढंते-ढुंढ़ते बुढ़ा गये तो सत्ता अपने छोटे भाई को दे दी. बिल्कुल लालू यादव की तरह आखिर और कौन होगा उनके जितना जिम्मेदार?

अब शायद कुछ साल इनके भाई रॉल ये कठिन जिम्मेदारी संभालें. जब थक जायेंगे तो यकीनन उनके बाल-बेटे होंगे जिसे यह कठिन जिम्मेदारी वो सौंप पायें.

Robert Mugabe

2. रॉबर्ट मुगाबे
वो महान नेता जिसने गोरों के खिलाफ जिम्बाब्वे में हल्ला बोलकर तहलका मचा दिया, गोरों को खदेड़ दिया तो खुशी के मारे जनता ने इन्हें राष्ट्रपति बना दिया. काम इनको पसंद आ गया. 1980 से शौक फर्मा रहे हैं. बीच में तीन-चार बार नाम के चुनाव भी करवा चुके हैं. अपने दुश्मनों पर बहुत मेहरबान रहे हैं, कहते हैं कि कइयों को उनके बनाने वालों से मिलवा चुके हैं.

अब ये भी बूढ़े हो गये, आखिर बहुत सालों तक जनता को साम्यवाद बांटा है, थक भी गये. पुराने दोस्त अब उतारू हैं कि साहब को आराम करायें, और आगे समानता का अलख खुद जगायें.

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3. ह्यूगो चावेज
बड़े मुखर वक्ता है. पूंजीवाद की हर बुराई का भरपूर ज्ञान है जिसे वक्त-बेवक्त बांटते रहते हैं. 1998 से वेनेजुयेला के राष्ट्रपति हैं. 1992 में सशस्त्र सत्ता-पलट में असफल रहे थे. पार्टी बनाकर चुनावी पलटी मार दी. साम्यवाद पर इतना भरोसा है कि मजदूर युनियनों के चुनाव भी राज्य के देख-रेख में कराते रहे हैं.

अभी जवान हैं, सिर्फ 10 साल हुये हैं सत्ता में. आगे इनमें बहुत संभावनायें हैं, कम-से-कम 30-35 साल और सत्ता में रहकर पूरी दुनिया के मजदूरों को एक करेंगे.

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4. माओ जेडोंग
वाम मार्गियों के लिये परम-पिता परमेश्वर से थोड़ा ही उपर रहे. इन्होंने चीन जैसे बड़े देश से पूंजीवाद का इस कदर नाश किया कि बाद में चीन अमेरिका के लिये most preferred investment destination बन गया. इन्होंने गांव के लोगों को गांव में, और शहर के लोगों को शहर में ही रखने का फरमान जारी किया. सभी की भलाई चाहते थे, इसलिये पूछने की जरुरत भी नहीं समझी कि कौन कहां रहना चाहता है.

बाद में इन्होंनें अपने देश को 'बड़ी ऊंची छलांग' (Great Leap Forward) लगवाई, जिसमें लोगों को अपनी खेती-बाड़ी छोड़कर सरकारी बेगार के लिये मजबूर करके पूंजीवादियों द्वारा मजबूर होने से बचा लिया. आज भी आधुनिक चीन तक में उनके सिखाये पाठ पढ़े चीनी नेता मजदूरों को खुद शोषित करके साम्राज्यवादियों द्वारा शोषित होने से बचाते हैं.

Monday, September 29, 2008

खाक चुनौती हैं मुसलमान साम्राज्यवाद के लिये.

साम्राज्यवाद - Imperialism. साम्राज्य - Empire. साम्राज्यवादी राज्य एक ऐसा राज्य जिसका उद्देश्य अपने साम्राज्य, या राज्य का विस्तार हो. कुछ लोगों को यह भ्रांति है कि मुसलमान साम्राज्यवाद के लिये अंतिम या इकलौती चुनौती हैं.

यह जो कथित पश्चिमी साम्राज्यवाद है, उसमें भी मुस्लिम हिस्सेदारी है.

आइये समझे की किस हद तक कुछ मुस्लिम राष्ट्र, और संस्थायें न सिर्फ इस साम्राज्यवाद की में शामिल हैं, बल्कि इसकी पोषक भी हैं.

इस समय दुनिया में अगर कोई देश है जो यह दावा करता है कि वो इस्लाम के उस रूप को मानता है जो शरियत में दर्शाया है, वो है सउदी अरब, जहां मक्का है.

मुसलमानों के लिये इस पवित्र देश में सबसे बड़ी मात्रा में जिस तत्व का उत्पादन और निर्यात किया जाता है, वह है तेल. इस तेल के बल पर विश्व की अर्थ-व्यवस्था चलती है.

तेल का सबसे बड़ा आयातक दुनिया का कथित तौर पर सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश - अमेरिका है. सउदी अरब के शासक शेख तेल का निर्यात करके डालरों का आयात करते हैं. लेकिन यह डालर सउद बैंको में पड़े नहीं रहते, इनका निवेश किया जाता है. कहां? क्या किसी मुस्लिम देश में (हां जरूर, आखिर विश्व के आतंकवाद का सबसे बड़ा फाइनेन्सर भी सउद ही है)? नहीं, इस पैसे को लगाया जाता है और पैसा बनाने के लिये.

जिस अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बारे में दावा किया जा रहा है कि वो साम्राज्यवादी है उसमें सउद अपनी सारी आय का 60% निवेश करते हैं, 30% यूरोप में किया जाता है, और 10% बाकी दुनिया में.

सउदी डालरों का ही प्रताप है कि अमेरिकी कंपनियों के पास किसी भी उद्यम के लिये पैसे की कमी नहीं. अमेरिका में होने वाले कुल सलाना निवेश का 35% सउदी अरब से आता है, यह हिस्सेदारी किसी भी और देश से ज्यादा है. सउदी अरब के $860 अरब अमेरिका में निवेशित हैं (जो की अमेरिकी अर्थव्यवस्था का 6‍% है). और बहुत सारी बड़ी कंपनियां जिन्हें आप अमेरिकी मान बैठे हैं (और जो यकीनन साम्राज्यवादी लगेंगी) असल में अब सउदी अरब की हैं. कुछ कंपनियां जिनमें सउदी अरब ने बहुत बड़ा निवेश किया है - Apple computers, AOL, News Corp, Saks Inc. अमेरिकी बैंक Citibank (याद रखिये यह इस्लामिक बैंकिग के खिलाफ बैंकिग करती है) में भी अबु-धाबी के शेख अल-वालिद का majority stake है.

मतलब बहुत सारी 'साम्राज्यवादी' कंपनियां जिन्हें आप अमेरिकी मान बैठे हैं, असल में अपने मुसलमान आकाओं का ही साम्राज्यवाद फैला रहीं हैं.

साथ ही यह न भूलें की कथित साम्राज्यवादी अमेरिका की तरह इन सउदी देशों में भी दौलत कुछ ही हाथों में फंसी है. यहां के राज परिवारों पर आरोप है कि इन्होंने लगभग $800 अरब देश से बाहर छुपा रखा है.

इन देशों में एक तिहाई से आधी जनसंख्या बेरोजगार है. इन्हीं का ध्यान अपने द्वारा बनाई गई समस्याओं से हटाने के लिये सउदी राजनीतिज्ञ शोषण-शोषण चिल्ला कर आतंकवाद को हर-संभव मदद पहुंचा रहे हैं. साफ बात है, जिस भी व्यक्ति में क्रांति पैदा करने की ताकत और हिम्मत हो, उसे आतंकवादी बना कर देश से बाहर एक फालतू के डर से लड़ने भेज दो. अब देश में जो बच गया, उस पर सउद राजा आसानी से शासन कर लेंगे.

साम्राज्यवाद सिर्फ सउदी अरब के मुसलमान ही नहीं फैला रहे, दुबई में तो हालात इससे भी बदतर हैं. दुबई कि कंपनियां सारे विश्व में मशहूर है अपने न्याय विरोधी तरीकों के लिये. इनका लक्ष्य कुछ भी करके कान्ट्रेक्ट हासिल करना रहा है, और मौका मिलने पर यह लोगों को बेवकूफ बनाने की हर संभव कोशिश करती हैं.

अभी थोड़े ही दिनों पहले दुबई की एक कंपनी Emaar MGF ने भारत में पब्लिक इश्यु निकाला. इसे स्टॉक बूम का फायदा उठाने के लिये इतना महंगा रखा गया कि यह इस कंपनी की parent company की कुल कीमत से भी बड़ा रहता. लेकिन भारतीय निवेशक बेवकूफ नहीं बने, और यह असफल रहा.

बाकी कौन से मुस्लिम देश बचे? विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम देश - Indonesia. यहां का सलेम ग्रुप भी भारत-भूमि पर वाम-मार्गियों से सांठ-गांठ करके बहुत सी उपजाऊ भूमि हथिया चुका है जिसका विरोध भी हुआ है. यहां पूरी तरह से मार्केट अर्थ-व्यवस्था हैं.

मलेशिया में मुस्लिम बहुल आबादी की एक ही आकांक्षा है, उनसे अमीर चीनी व्यापारियों को खदेड़ कर व्यापार पर कब्जा करना. चीनियों को तो दमदार चीन की वजह से नहीं दबा पाये, लेकिन भारतियों को एकदम साम्राज्यवादी तरीकों से कुचल रखा है. (कुछ ही दिन पहले भारतीयों से विरोध का भी हक छीन लिया गया, याद कीजिये वो खबरें जिसमें अत्याचार विरोधियों को आतंकवादी बताया गया).

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असल में यह भूल भोले लोग करते हैं फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, इराक आदी को देखकर.

सच तो यह है कि उक्त सारे देश साम्राज्यवाद से नहीं, अमेरिका, या पश्चिम से लड़ रहे हैं. इसलिये नहीं की इनको साम्राज्यवाद से कोई परेशानी है, बल्कि इसलिये की सिक्का इनका नहीं चल रहा. (इराक तो खासा साम्रज्यवादी रहा है, और इरान भी -- इन देशों के आपसी, और कुवैत से होने वाले युद्ध याद करें)

जो एकाध देश छूट गये उन पर दया कीजिये, उनके लिये साम्राज्यवाद विरोधी होने के अलावा कोई चारा नहीं, क्योंकि उनके पास तो खाने-पीने की ही समस्या है. मतलब अगर वो साम्राज्यवादी होने का दावा करते तो बात यूं रहती - जेब में नहीं दाने, अम्मां चली भुनाने.

क्या अब भी आप इस सपने में जी रहें हैं कि मुसलमान साम्राज्यवाद के लिये अंतिम चुनौती हैं?