Wednesday, May 20, 2009

अमर सिंह की कांग्रेस को धमकी

खबर के अंदर की खबर पढ़ना भी एक कला है. अब राजनीति से दो-चार होते कई साल बीत चुके हैं तो राजनेताओं की चालों का अंदाजा लगाना भी अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है. amarsinghnishanchiबात है अमर सिंह की. ये पुराने चालबाज हैं. इनके पत्ते सधे होते हैं और अपने काम निकालने के लिये यह हर प्रपंच कर लेते हैं. इसी कला में निपुण होने के चलते यह मुलायम के लिये अपरिहार्य हो गये. भाई अब तो हालात यूं है कि आजम खान ने भी इनसे पंगा लिया तो उनकी चला-चली हो गई.

तो बात है अमर सिंह के कल के बयान की. विश्वास मत के इतने दिनों बाद, चुनाव के भी बाद अब अमर सिंह के अंदर का ईमान जाग गया और उन्होंने खुलासा कर ही डाला की सोमनाथ चटर्जी ने उनसे कांग्रेस समर्थन को कहा था.

क्यों? अब कैसे इन पुरानी बातों को याद कर लिया? क्या दुश्मनी हो गयी ताजी-ताजी सोमनाथ से? बुढऊ की मिट्टी क्यों खराब करने पर तुले हैं?

यह सोमनाथ से दुश्मनी नहीं है, सोमनाथ तो घुन है जो पिस गया क्योंकि अमर सिंह अपनी रोटियां सेंकने के लिये आटा बनाने में लगे हैं.

यह गूढ़ बात है. चेतावनी है अमर सिंह कि कांग्रेस को. अगर तुमने हमें लपेटा तो बर्रों के छत्ते को खोल डालूंगा. राजफाश कर दुंगा. पर्दानशीं रहस्यों को बेपर्दा कर दूंगा.

सोमनाथ को लपेट कर उन्होंने सैम्पल दिखाया है कि असल माल पोटली में बंद है, बोलो तो खोलूं.

अमर सिंह कांग्रेस के लिये नोट बांट रहे थे विश्वास मत के दौरान (आइबिएन ने छुपाते-छुपाते भी दिखा डाली). किसके कहने पर?

इतने राज दफन हैं अमर सिंह के सीने में कि जो खुल जायें तो ऐसी पिक्चर का मसाला तैयार हो जाये जिसे हिट कराने के लिये बड़े भैया अमिताभ की भी जरुरत न रहे.

और आप क्या सोच रहे थे? सोमनाथ को बेफालतू में निपटा दिया अमर सिंह ने? नहीं यह निशान्ची अब सारे गुर सीख चुका है, अब यह प्यादों पर वक्त बर्बाद नहीं करता, सीधे वज़ीर का शिकार करता है.

Sunday, May 17, 2009

आडवाणी जी का फैसला सही है

आडवाणी जी ने फैसला किया है कि वह अब विपक्ष के नेता नहीं होंगे. बीजेपी में अभी भी नये स्तरीय नेतृत्व की कमी है, और शायद इतनी जल्दी भरपाई भी नहीं होगी, लेकिन फिर भी आगे की राजनीति के हिसाब से मुझे लगता है कि आडवाणी जी का फैसला सही है.

आडवाणी जी जानते हैं कि यह पांच साल बीजेपी को बहुत काम करना है जिससे वह अगले पांच सालों में वह जिम्मेदारी निभा पाये जिसे निभाते हुये हम उसे देखना चाहते हैं.

इन पांच सालों में बीजेपी को उभरते हुये नेतृत्व की जरुरत है, आडवाणी जी को एक नये नेतृत्व को उभरने का मौका देना है और उसे मदद करनी है.

उन्हें देखना होगा कि बीजेपी सही राह पर चले… लेकिन अगली लड़ाई, अगली पीढ़ी के लिये होगी.

जय हिंद.

Wednesday, May 13, 2009

माओ कि मसखरियां

माओ इतने सालों तक चीन के सर्वोच्च पद पर रहे. इतने बड़े देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचे लोगों से अपेक्षा यह तो है ही कि उनमें ‘common sense’ नाम की uncommon चीज थोड़ी मिले, लेकिन विश्व के बाकी देशों से चीन अपवाद क्यों बने. अपने देश समेत हर देश में सनकी, गैर जिम्मेदार, और नाकाबिल लोग ही सर्वोच्च पदों पर ज्यादा पहुंचते हैं. खैर बात उनकी नहीं माओ की हो रही है. तो आज याद करते हैं माओ कि कुछ ऐसी मसखरियों को जिनकी कीमत चीन के लोगों ने गहरी चुकाई.maomaomao सचमुच माओ ने कुछ ऐसे अजीब फैसले लिये जिन्हें भीषण अदूरदर्शिता और सनक ही मान सकते हैं. देखिये तो जरा: -

1. चिड़ीमार माओ

माओ को सब लोग विश्व के पूंजीपतियों के दुश्मन के रूप में जानते हैं (यह वही ‘महान’ नेता हैं जिन्होंने स्तालिन को विश्वास दिलाया था कि वो पूंजीपति देशों के विनाश के लिये 30 करोड़ चीनीयों को कुर्बान करने से पीछे नहीं हटेंगे.) लेकिन कितने लोग यह जनते हैं कि प्यारे कम्युनिस्ट माओ चिड़ियों के भी कट्टर दुश्मन थे.

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भैया पांच चिड़िया मार दीं, अभी और कित्ती मार के माओ अंकल खुश होंगे?

1958 में उन्हें पता चला कि चीन के चावल चिडियां खा रहीं है इसलिये चीनी भूखें हैं. तो उन्होंने हुक्म पारित करा दिया – ‘मार चिड़िया’. चीन के किसानों, पदाधिकारियों को कहा गया कि चिड़िया उड़ाओ, चिड़िया के घोसले ढूंढ़-ढूंढ़ के तोड़ो, अंडे फोड़ दो, गुलेल से मार दो. तो लोग लग गये और चीन में लाखों चिड़ियाओं ने अपनी जानें गंवा दीं.

तो क्या चीन के चावल चिड़ियों से बच गये? लोग भूखे नहीं रहे?

नहीं भाई, बाद में बात खुली कि जितने चावल चीन की चिडि़या खातीं थीं उससे ज्यादा तो वे उन कीड़ों को खाती थी जो फसल बर्बाद करते थे. चिडि़यां मरीं तो कीड़ों की ऐश हो गयी. चिड़िया रहित चीन में टिड्डियों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हुई और इस हद तक बढ़ोतरी हुई कि फसलें टिड्डियों के पेट में गईं और चीन में अकाल पड़ा.

चीन के चावल टिड्डियां खा गईं.

2. गरीबमार माओ

माओ के धत्करम चिड़ियां मार कर ही रुक जाते तो क्या गनीमत होती, इन्होंने तो अपने देश के बाशिंदों को भी नहीं बख्शा. माओ को नारे गढ़ने का शौक था, चीनी भाषा में खूब आऊं-माऊं नारे गढ़े उन्होंने, उसमें से एक था ‘The great leap forward’ मैं इसका अनुवाद करूंगे ‘जेsss लंबी छलांग’.

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हमाला प्याला चेअलमैन माओ अंकल हमें छलांग लगवा लहे हैं

तो पहले माओ ने चीन को चलाया, फिर कुदवाया और तब भी दिल नहीं भरा तो ‘जेsss लंबी छलांग’ लगवायी.

इस जेsss लंबी छलांग में माओ ने चीन की कहानी कुछ यूं कर दी

1) स्वाधीन खेती के पर कतर दिये और किसानों को मजबूर किया कि वो झुंड के झुंड में पब्लिक खेती पर काम करे. इसके लिये उन्हें मजबूर किया गया कैद करके.

2) किसानों से सस्ते दरों में अनाज खरीद कर महंगे में बेचा, किसानों को सिर्फ सरकार को ही अनाज बेचने की इजाजत थी

3) घर-घर में गांव वालों को मजबूर किया गया कि वो लोहा बनाने के लिये भट्टी लगवायें और उन्हें लोहा बनाने का टार्गेट दिया गया. इस काम में लोग सब तरफ लकड़ी काटते डोलते रहे और टार्गेट पूरा करने के लिये लाखों ने अपने घर के बर्तन-भांडे गला डाले. नहीं करते तो माओ क्या करते वो हम बताना पड़ेगा आपको?

तो किसान को किसानी नहीं करनी दी, दे दनादन बेगार कराई (जिससे बचाने के लिये सत्ता में आये थे अपने कम्युनिस्ट शोषक). इसका असर यह हुआ कि खेत में अनाज पड़ा का पड़ा रह गया. लोगों को पार्टी के गुंडो ने परेशान किया (जैसा आजकल बंगाल में कर रहे हैं सीख कर) और गिनिये 1, 2, 3, नहीं पूरे 4.3 करोड़ लोग उस अकाल में मर गये जो इस सब नौटंकी के कारण पड़ा. कहते हैं उस बार चीन की 55 प्रतिशत भूमी अकाल ने चपेट डाली.

माओ की चंपू सरकार ने कितने ही लोगों को इस सब अत्याचार के बारे में खबर लीक करने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया.

भाइ अगर हिन्दुस्तान में ऐसा होता तो इतना तो है कि सरकार गिर जाती, लेकिन अपने कम्युनिस्ट एक बार काबिज होते हैं तो हटते हैं कहीं? उन्हें तो उखाड़ना पड़ता है.

3) यारमार माओ

इत्ता सब माओ ने करवा डाला तो कहीं से विरोध तो होना था? कुछ लोगों में तो होती है इतनी दम कि मृत्यु की कीमत पर भी गलत बात का विरोध किया जाये, तो ऐसे लोग उभरने लगे जो माओ की गलतियों के बारे में खुलकर बात करने लगे. आखिरकार जब माओ ने देख लिया कि सबको वो नहीं मार सकता तो माओ सत्ता के केंद्र से उतर गया और नाम का सत्ता अध्यक्ष हो गया, लेकिन माओ को क्या यह स्वीकार्य होता कि डेंग ज़ियाओपिंग और लिउ शाउकि देश को चला पायें.

lalsenagoonsतोड़ो, मारो, पीटो, खसोटो, अपना इतिहास बच न जाये

तो जब यह लोग सत्ता के केंद्र में आये तो माओ ने अपने इन पुराने दोस्तों की जड़ें खोखली करने का प्लान बनाय. उसने एक ‘सांस्कृतिक क्रांति’ करवाने के नाम पर नौजवान पीढ़ी को उकसाया, उन्हें गुटबंदित किया और एक नयी शक्ति बनाई जिसे नाम दिया गया ‘लाल रक्षक’ (The Red Guard).

तो क्या रक्षा की होगी इस ‘लाल सेना’ ने? इन लोगों ने क्रांति के नाम पर चीन के इतिहास को मिटा डालने में कसर नहीं छोड़ी. इन्होंने मूर्तियां तोड़ दीं, पुरातन इमारते ध्वस्त कर दीं, पुरानी बहुमूल्य किताबें जला दीं, यहां तक की परिवारों तक के लिखित इतिहास को मिटा दिया. ये था माओ का सांस्कृतिक कार्यक्रम.

ये इस हद तक हुआ कि जब यह लाल रक्षक चीन के ऐतिहासिक नगर ‘फोर्बिडन सिटी’ की तरफ बढ़ने लगे तो इस धरोहर के भी नष्ट हो जाने के डर से डेन्ग ज़ियाओपिंग ने शहर के दरवाजे बन्द करवा कर सेना तैनात करवा दी.

इस सेना ने के लोगों ने जासूसी कर के बहुत सारे लोगों को ‘क्रांति विरोधी’ करार देकर मौत के घाट उतरवाया. चाहे सरकार के उच्च अधिकारी हो, या निचले स्तर के, हर कोई डर में जीता था कि कब किसी भी बात पर उसे क्रांति विरोधी का नाम देकर टपका देंगे.

आखिरकार ये लाल सेना खुद ही गुटों में बंट गई और चीन की आधिकारिक सेना के हथियार आदी छीन कर जब उन्होंने आपस में लड़ना शुरु किया तो सरकार हरकत में आई और इस नालायकी का अंत किया.

तो माओ कि कुछ ऐसी दास्तानें आपने सुन ली जो ‘ईमानदार’ (या ईनामदार) कम्युनिस्ट लेखक आपको नहीं बताते. कम्युनिस्ट कारनामें और भी हैं, क्या-क्या कहें, क्या-क्या सुनायें.

Sunday, May 3, 2009

वो एक कमजोर कौम थी…

हिन्दू और यहूदी धर्म में वैसे तो कोइ समानता नहीं, लेकिन फिर भी आज दोनों धर्म समान धरातल पर खड़े दिखते हैं. यहूदी धर्म से जहां इस्लाम और इसाइयत दोनों का ही उद्भव हुआ, वहां हिन्दू धर्म तो खुद ही बहुत सारे धर्मों का समागम है, और भी कई दूसरे धर्मों का जन्म उससे हुआ.

दोनों ही धर्म पुराने हैं लेकिन जहां यहूदी धर्म अब धरातल से लगभग मिट चुका है (इसके सिर्फ 1 करोड़ बीस लाख मानने वाले ही दुनिया में हैं) वहां हिन्दू धर्म अब भी प्रबल रूप से जीवित है (लगभग 85 करोड़ मानने वाले). दोनों ही धर्म अब मुख्य रूप से एक राष्ट्र में सिमट चुके हैं और दोनों पर ही अब्रामिक धर्म (इस्लाम और इसाइयत) की टेढ़ी नजर है.

दोनों ही धर्मों का जोर प्रसार और लोगों को अपने धर्म में शामिल करने पर नहीं है.

किसी जमाने में यहूदी बेहद कमजोर कौम हुआ करती थी. यह कौम पूरे युरोप में बिखरी हुई थी और अमेरिका में अपना प्रभाव बनाना शुरु ही किया था. संख्या में कम, लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न और पढ़े-लिखे लोगों की यह कौम बहुत से इसाइयों की आंखों में खटकती थी. पूर्वाग्रह की हद क्या होगी यह इससे ही समझ सकते हैं कि शेक्सपीयर तक ने अपने नाटक मर्चेन्ट आफ वेनिस में यहूदी व्यापारीयों को खुल कर कोसा था. याद है आपको शाइलॉक? ये भी याद करिये कि जोर उसके उस खास वर्ग के होने पर बहुत था.

असल में इसाइयत का यहूदियों से पुराना बैर था, उनके नबी (जीसस) को भी आकर यहूदियों के कहने पर ही कत्ल किया गया था. बहुत दिनों तक इसाई यहूदियों द्वारा दमित भी रहे, लेकिन रोमन राजा के इसाई धर्म अपनाने के बाद इसाईयत का जोर युरोप में जो हुआ वह अब तक चालू है. धीरे-धीरे यहूदी और युरोप के बाकी धर्म हाशिये पर चले गये. यहूदी भी इस नई व्यवस्था में मिल गये. अब वह न शासक रहे न शोषक, वर्ण व्यवस्था में भी उनका स्थान दोयम था, लेकिन अपनी मेहनत लगन और अक्ल से वह समाज में आगे रहे.

लेकिन उनके पास न सामरिक शक्ति थी, ना राजनैतिक, और यह बात उन्हें बहुत महंगी पड़ी. द्वितीय विश्वयुद्ध में 30 लाख यहूदियों को हिटलर और दूसरे यहूदी विरोधियों ने मार दिया और यहूदी कुछ नहीं कर पाये. वह एक कमजोर कौम थी जिसपर जो चाहे, जैसा चाहे अत्याचार कर सकता था. हिटलर ने यह्युदियों को शहर से दूर अलग इलाकों में रहने पर मजबूर किया, और हर यहूदी को अपनी पहचान के लिये खास मार्क पहनना होता था (स्टार) जिस तरह आज तालिबानी पाकिस्तानी में इस्लाम को न मानने वालों को पहनना होता है.

यहूदियों ने बुरे दिन पहले भी देखे थे, लेकिन हर बार वो आगे बढ़ गये और पुराने दुख भूलते गये. लेकिन जिन्हें यह यहूदियों कि कमजोरी लगी, उन्होंने इसे कायरता सामझा. उस समाज में यह बात प्रचलित थी कि यहूदी में हिम्मत नहीं होती. वह डरपोक होता है. जबर मुस्लिम और इसाई दोनों ही इस कमजोर कौम को दबा-कुचल कर खुश थे.


यह मौसम्बी/संतरे नहीं यहूदियों को मारना चाहता है,
बेशक हिज्जे न आते हों, नफरत आती है


  1. यहूदियों ने एक भी युद्ध नहीं लड़ा.
  2. उनकी कोई सेना नहीं थी.
  3. वो सब के सब गैर सैनिक नागरिक थे जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध में पकड़-पकड़ कर मारा गया, उनके साथ कैम्पों में अमानवीय व्यवहार किया गया और गैस चैम्बरों में भर दिया गया.
बिना युद्ध लड़े एक कौम के 30 लाख लोगों की हत्या?
जो उस समय कुल यहूदी जनसंख्या की आधी थी!
मतलब एक कौम को आधा साफ कर दिया गया!

जिन कमजोर और बेबस यहूदियों को इतनी आसानी से मौत दी गई आज वह कहा हैं?
  • उनका प्रभुत्व अमेरिका की राजनीति पर है.
  • दुनिया का हर रैडिकल यहूदियों के नाम से कांप उठता है.
  • यहूदी लड़ाके दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक हैं.
  • यहूदीयों के अस्त्र-शस्त्र बहुत उन्नत हैं.
आज यहूदी ऐसी जगह रहते हैं जहां वो हर तरफ से दुश्मनों से घिरे हैं. फिर भी उनका वजूद प्रबल है. उनका हर दुश्मन उनसे घबराता है और उनके आगे पानी मांगता है.

क्यों?
क्योंकि 30 लाख लोगों को खोने के बाद यहूदियों ने फैसला किया –

Never again!

दोबारा कभी नहीं.

यही उनकी जीवनशैली है – दोबारा कभी नहीं!
आज के यहूदियों में मुझे कल के हिन्दुओं का चेहरा दिखाई देता है.
क्योंकि दुनिया में यह भी इतने ही अकेले हैं जितने की यहूदी. रैडिकल इस्लाम और इसाइयत का जितना दबाव हिन्दुओं पर पढ़ रहा है उसकी वजह से हिन्दू धर्म ने जो राह पकड़ी है वह शायद उसी मोड़ पर रुकेगी जिस पर आज यहूदी हैं.

सरकार को पता है कि स्विस बैंको में माल किसका है, लेकिन आपको पता नहीं चलेगा

कांग्रेस के काम में भी बात है. वह जो भी करते हैं खुल्ले में, पूरे शानो-शौकत गाजे-बाजे के साथ करते हैं और कहते हैं, लो बेट्टा, कल्लो जो करना है. अपने पूर्व वित्तमंत्री चिदम्बरम जी ने पहले कहा कि उन्हें जर्मन सरकार ने नाम नहीं दिये – ‘लीगल प्रोसेस है भाई, समय लगता है’. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दर्ज ताजे हलफनामे में सरकार ने कहा की हां हमें नाम मालूम है.

खबर यहां पढ़ सकते हैं :

पहले ही पैरा में लिखा है : सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा दिया कि हमारे पास जर्मनी से स्विस बैंको के खातेदारों के ब्यौरे हैं, लेकिन हम 'confidentiality' की वजह से नाम जाहिर नहीं कर सकते.

नाम मालूम हैं?

मतलब उन्हें पता है कि किस-किस ने देश का धन चोरी किया.

piles_money बहुत सही खबर सुनाई है सरकार है. नाम पहले ही पता चल गये होंगे. उधर आडवाणी चिल्ला रहे थे कि भाई नाम लाओ, नाम लाओ इधर तो सारा कार्यक्रम हुआ बैठा है बिना बात को चिल्लाये आडवाणी. चलो जब सरकार को इन बेईमानों के नाम मालूम पड़ गये तो हमें भी चैन मिला. अभी सरकार करेगी प्रेस कान्फ्रेंस और छपेगी सारे नामों की लिस्ट. फिर जनता भी नेताओं वाले जूते लगा-लगाकर इन चोरों के सर सुजा देगी.

सही प्लानिंग है न भाई? अरे.. कहां चले? जूता खरीदने? जरा ठहरो भाई जरा बाकी एफिडेविट तो पढ़ लें.

ओये! यह क्या लिखा है? सरकार कहती है कि जनता को नहीं बतायेंगे कि किन-किन के नाम है.

जनता को नहीं बतायेंगे? क्यों नहीं बतायेंगे? क्या इसमें भी देश की सुरक्षा में जंग लग जायेगी? आतंकवादी छोड़ने पड़ेंगे?

नहीं, चोर पकड़ने पड़ेंगे.
भाई जब सरकार को मालूम पड़ गया है कि चोर कौन-कौन है तो क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि सरकर धरे उन्हें? सरकार ने कह तो दिया कि कर विभाग करेगा, लेकिन कब करेगा?

आपने सुना कि कोई बड़ा आदमी पकड़ा गया?
कहीं टैक्स बाबू रेड डालने गये? या फिर ये सिर्फ हमें आपको परेशान करने के लिये हैं.

चुनाव होते-होते तक सरकार ने कभी नहीं कहा कि हमें पता है,
वो कहते रहे कि ‘क्यों बोला, भई क्यों बोला’ अब जब चुनाव हो चले, वोट डल चुके तो सरकार ने कह दिया, हमें पता है, लेकिन हम कुछ नहीं करेंगे बोलो क्या कल्लोगे?

तो वोट दे दिया आपने? पेटी बंद. अब जाओ नहीं लाते देश का पैसा वापस. नहीं बताते चोरों के नाम

क्यों नहीं बताते?
भाई हिन्दू संस्कृति है, बीवियां अपने शोहरों के नाम नहीं लेती. हमारी सरकार कोई खसमानूंखानी थोड़े ही है.


confidentiality? किसको बचा रही है सरकार?