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Friday, June 11, 2010

भारत की सरकार न्यौत चुकी है भोपाल से भी बड़ा जीनोसाइड... भारत क्या तुम इसके लिये तैयार हो?

भोपाल की टीस फैसले के बाद उभर चुकी है. मुनाफे के वहशी भेड़ियों के द्वारा किया गया वह कत्ले-आम बाहर वालों के लिये सिर्फ चंद तस्वीरें बन कर रह गया है लेकिन भोपाल वालों के सीने में अब भी धधक रहा है.

20,000 लोगों की मौत पर मारा गया $470 मिलियन का तमाचा, आज़ाद घूमते वो बड़े पद वाले जिन्होंने भोपाल में हर नियम की धज्जियां उड़ाईं और सस्ते में छूट चुके छोटे अफसर भारत के शर्मनाक हद तक गिर चुकी न्याय व्यवस्था की कहानी बयां कर रही हैं.

भारत कभी उस दर्दनाक हादसे को भूले न भूले आपके सरकारी हुक्मरान उसे दफना चुके हैं और इसलिये वह तैयारी कर रहे हैं भोपाल से भी बड़े हादसे की. बात हो रही है भारत-अमेरिका के बीच होने वाले न्युक्लियर करार की जो आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखों का वो सपना है जिसे पूरा करने के लिये वो कुर्सी गंवाने की हद तक जाने को तैयार थे.

भूलियेगा नहीं किस तरह आपके ही एक साथी ब्लागर अमर सिंह ने सांसदो को पैसे देकर मनमोहन की सरकार बचवाई (ऐसा IBN पर देखा था).

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आपको इस न्युक्लियर करार के बारे में पता है? यह वह करार है जो भारत को विश्व शक्ति का दर्जा दिलवा सकता है. वह करार जो भारत को एकलौता ऐसा देश बनायेगा जो संयुक्त राष्ट्र का परमानेन्ट सदस्य न होकर भी मुक्त रूप से परमाणू ऊर्जा के व्यापार में हिस्सा ले सकेगा.

जिसके बाद आयेंगी अमेरिकी परमाणू कम्पनियां भारत में और पैसे लेकर लगायेंगी वह संयंत्र जिसमें परमाणू ऊर्जा से बिजली बन पाये.

लेकिन यह करार सिर्फ पैसे के बदले मिलता तो कीमत छौटी थी. इसकी कीमत हम बहुत बड़ी चुकानी को तैयार हैं. इसकी कीमत हम देने को तैयार है लांखों जानों से. जो इस करार को करने के लिये भोपाल को भुला चुके हैं वो चेर्नोबिल याद कर लें. वहां भी था एक परमाणू संयंत्र जहां पर हुई दुर्घटना के प्रभाव से 100,000 (एक लाख) से ज्यादा जानें कैन्सर से गईं और 10,000,000 (दस लाख) से ज्यादा लोग कैंसर ग्रस्त हुये. यह कह रही है ग्रीनपीस की ताज़ा रपट.

कामन सेन्स कहता है कि किसी भी दुर्घटना को रोकना हो तो ऐसे कठोर नियम बनाने चाहिए जिसमें गलती की कोई जगह न हो. और उन नियमों का पालन न करने वालों को सख्त से सख्त सज़ा देनी चाहिये ताकी कोई कोताही न करे... लेकिन भारत की कांग्रेस सरकार ने कह दिया है कि आप इस देश में आयेंगे तो आपको हम पूरा लाइसेंस देंगे देश में लाखों जानों से खेलने का और अगर आपने दुर्घटना कर दी तो आपको हम पूरी मदद करेंगे बिना किसी जवाबदारी के साफ बच कर जाने को.

भोपाल के नरसंहार के बाद हमारी सरकारी मशीनरी तुरत-फुरत हरकत में आयी... काबिले-तारीफ थी वह तेज़ी, लेकिन तेज़ी थी क्योंकि यूनियन कार्बाइड के दोषियों को बचाना था. इसलिये कानून ताक पर रखे गये, नियम भुलाये गये और ऊपर-ऊपर और ऊपर से आदेश आते रहे दोषियों को बचाने के लिये.

लेकिन इस बार सरकार ने और भी तेज़ी दिखाई है. दोषियों को बचाने के लिये दुर्घटना होने का इंतज़ार तक नहीं किया... पहले ही सर्टिफिकेट दे दिया कि आप चाहें जितनों को मारें हम आपका पीछा नहीं करेंगे. फिर हम मांग लेंगे आपसे चिड़ियों का चुग्गा और डाल देंगे अपनी भिखारी जनता के सामने. और फिर आपको पूरा मौका देंगे निकल जाने का. यही हिस्सा है उस करार का जो भारत सरकार अमेरिका के साथ कर रही है.

युनियन कार्बाइड के 470 मिलिअन तो उसने खुद भी नहीं चुकाये, यह तो उसके इंश्योरेंस की रकम ही थी. इस बार भी अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो मिल जायेगी आपको 460 मिलियन डालरों की भीख क्योंकि यही सबसे बड़ी वह कीमत है जो अमेरिकी कंपनियां चुकाने को बाध्य होंगी अगर कोई दुर्घटना घटी! और यह कीमत तय की है आपकी सरकार ने. अभी-अभी आपकी सरकार ने आपके देश वालों की जान की कीमत 10 मिलियन डालर घटा दी.

आपको कैसा लग रहा है मुद्रास्फीती के इस गिराव पर?

अमेरिकी जानें इस से कई गुना महंगी हैं वहां पर अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो कंपनियां देंगी 10 बिलियन डालर तक. मतलब हर अमेरिकी आपके जैसे 20 के बराबर है. अब तो आपको अपने देशवालों की औकात का सही अंदाज़ा भी हो गया होगा.

वही अमेरिका जो अपने देश की कंपनियो के लिये इतना सस्ता सौदा तलाश रहा है अपने देश में होने वाले तेल के रिसाव पर एक ब्रिटिश तेल कंपनी (BP) पर 10 बिलियन डालरों का जुरमाना ठोकने की तैयारी कर रहा है जिससे वह कंपनी तबाह और बरबाद हो जायेगी.

भारत, क्यों न यह सौदा ऐसे देशों से हों जो दूसरों की जान की कीमत भी समझें? रूस बढ़ा हुआ मुआवज़ा देने को तैयार है. और जर्मनी में तो मुआवज़े की कोई सीमा ही नहीं निर्धारित की जा सकती. तो क्यों इस देश के US रिटर्न प्रधानमंत्री बेताब हैं अपने देशवासियों की जानों का इतना सस्ता सौदा करने के लिये?

Wednesday, March 10, 2010

अबु आजमी ने कितने आतंकवादियों को बचाया? शहजाद, जुनैद… या कुछ और भी हैं?

अभी-अभी टीवी पर खुलासा हो रहा है कि मुम्बई के सपा नेता अबु आजमी बाटला हाउस के आतंकी शहजाद और जुनैद से मिला और उन्हें पैसा दिया कि वो छुप के रहें. चौरसिया और अजमानी मिलकर अबु आजमी से फोन पर बात कर रहे हैं, और कम से कम पहली बार चौरसिया के मुंह से कठिन सवाल सुनने को मिल रहे हैं

1. अबु आजमी दाउद की महफिल में शामिल रह चुका है.
2. अबु आजमी 1993 के विस्फोट के मामले में गिरफ्तार होकर जेल में रह चुका है.
3. अबु आजमी बार-बार आतंकवादी मामलों में संदिग्ध रहा है.
4. अबु आजमी ने खुद स्वीकार किया की शहजाद के बाप से उसके संबंध रहे और शहजाद का बाप उसके यहां आता जाता रहता है.

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बाटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के कातिलों में शामिल शहजाद को पैसे दिये और छुपने में मदद की... ठीक है.

लेकिन अभी-अभी मुझे याद आ रहा है कि मुंबई में ताज पर हमले में अबु आजमी गोलियों और हमलों के बीच में घुस कर कार लेकर आता है, और दो-तीन लोगों को बचाकर ले जाता है. बाद में बयान देता है कि वो सऊदी अरब के कुछ सम्माननीय लोग थे.

शहजाद का तो पता चला.. लेकिन अबु आजमी, कौन थे वो लोग जिन्हें तूने ताज होटल से निकाला था.

चौरसिया ने अभी अभी अबु आजमी से कहा
"आप इतने भोले भी नहीं है अबु आजमी की दाउद के घर में शादी में शामिल हों और आपका पता नहीं हो किसके घर में हैं"

अबु आजमी कह रहा है कि मैं भोला हूं... बिल्कुल भोला हूं.

"मैं मुसलमान हूं, मैं भगवान की नहीं अल्ला की कसम खा कर कहता हूं कि मैंने शहजाद को पैसे नहीं दिये और मैं उससे मिला भी नहीं हूं."

चौरसिया, क्या इस सवाल का जवाब निकलवा सकते हो कि इसने ताज होटल में किसको बचाया था.. कहीं कुछ और आतंकवादियों को तो नहीं निकाल ले गया? पुरानी फुटेज होगी न तुम्हारे पास?

लंदन भाग गया है अबु आजमी 5 तारीख को. ठीक उसी दिन जिस दिन दिल्ली पुलिस ने उससे पूछताछ की.

मनसे वालों तुमने हिंदी के नाम पर इसको झापड़ लगाया, क्या इस बात के लिये खुदा कसम इसको एक जबर्दस्त नहीं लगाना चाहिये?

और इधर कांग्रेस का एक पूर्व विधायक कांग्रेस की सरकार में हुये दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर जिसमें एक बहादुर पुलिस इंस्पेक्टर शहीद हुआ के बारे में कह रहा है कि ‘सारी दुनिया जानती है कि बाटला एनकाउंटर झूठ था’…

इस अब्दुस सलाम को लाफा कौन लगायेगा?

Monday, February 22, 2010

नक्सलीयों के 72 दिन शांति नहीं, अपने बचाव की कारवाई. हिन्दुस्तानी सरकार क्या तुम जाल में फंसोगी?

किशन 'जी?' की 72 दिन की शांति की पेशकश से पहले ही नक्सली कुत्तों का सामुहिक रूदन शुरु हो चुका है. कुछ ने तो इस पेशकश को भारतीय सरकार के लिये घोर गनीमत बना दिया है, कि नक्सली तुम्हारे पृ्ष्ठभाग पर जो कदमताल कर रहे हैं लो उनकी दया पर 72 दिन आराम कर लो. लेकिन क्या इस पेशकश की सच्चाई क्या है?

क्या नक्सलीयों का हॉलिडे सीज़न चल रहा है कि साल भर इतने लड़ाई-लफड़े के बाद जा कर हिल-स्टेशन पर आराम किया जाये?

या

वो महीनों से काम में लगे पुलिस वालों को छुट्टी के 72 दिन देना चाहते हैं?

साल भर कत्ले-आम करने वाले नक्सली आखिर चिदंबरम को 72 घंटे क्यों भेंट करना चाहते हैं? किसी भी तरह की पेशकश सुनने से भी पहले इस पर विचार कर लेना चाहिये, क्योंकि सच्चाई वह नहीं है जो किशनजी नाम का आतंकवादी कह रहा है और सच्चाई वह भी नहीं है जो इस आतंकी समूह के 'बुद्धुजीवी' चमचे पेश कर रहे हैं.

सच्चाई है:

नक्सलियों को चाहिये 72 दिन जंगलो से बचकर भाग जाने के लिये.

असल में नक्सली आतंकी झारखंड और छत्तीसगढ़ के जिन जंगलो में छिपे हैं वो जंगल में मुख्यत: साल के पेड़ है. यह वह समय है जब साल के पेड़ों पर से पत्ते झड़ते हैं और जंगल के जंगल बेरंग हो जाते हैं. साल के घने वृक्षों में छिपे नक्सलियों के लिये एक-दो हफ्तों के बाद शरण दुर्लभ होने वाली है, क्योंकि अप्रेल-मई तक साल के वृक्षों में नये पत्ते नहीं आने वाले.

वृक्षों से पत्ते झड़ जायें इससे पहले नक्सली कातिल भाग कर सुरक्षित ठिकानों में छिप जाना चाहते हैं. इसलिये उन्हें चाहिये 72 दिन. अगर सरकार ने यह पेशकश मान ली तो नक्सलियों के लिये बच के निकल जाना बेहद आसान हो जायेगा.

यह पेशकश मानना अक्षम्य अपराध होगा उन लोगों और पुलिस वालों के साथ जिन्होंने अपनी जान नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष में दी है.

अब वक्त है कि सरकार सही फैसला ले और नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष को वह तेजी दे जो साल भर नहीं दी, ताकी नंगे होते जंगलों में छुपे नक्सलियों को वक्त रहते खत्म किया जा सके. यह वह दुर्लभ मौका है जो साल में एक बार आता है, और त्वरित कार्यवाही से निश्चित है बहुत से नक्सली कातिल पकड़े/मारे जा सकेंगे.

चिदंमबरम, तुम हर हत्याकांड के बाद आंसू बहाते हो. अब फैसला तुम्हें करना है, और देखना हमें है कि तुम्हारे आंसू घड़ियाली हैं, या तुम आतंक को सचमुच मिटाने की कोशिश करोगे.

भारत, प्रधानमंत्री और पहला हक अल्प-संख्यकों का और पाकिस्तान के वो अल्प-संख्यक सिक्ख.

1. हिन्दुस्तानी सरकार के नुमाइंदे अपील कर रहे हैं कनाडा, यूएसए और यूरोप में बैठे सिक्खों से कि वो अपनी सरकारों पर दबाव बनायें कि वह सब मिल कर पाकिस्तान से कहें कि सिक्खों की जानमाल की रक्षा करो.

2. हिन्दुस्तान पाकिस्तान से बातचीत करने को तैयार है. कश्मीर पर भी, क्योंकि उसे विश्वास है कि पाकिस्तान के हर सवाल का उसके पास माकूल जवाब होगा. हिन्दुस्तान पाकिस्तान के हर सवाल का जवाब देगा, लेकिन एक भी सवाल नहीं होगा खुद उसके पास पूछने के लिये. यह भी नहीं कि कश्मीर के लिये आंसू बहाने वाले पाकिस्तानियों, क्या तुमने उन्हें देख रहे हो जो पाकिस्तान में ही मजहब के नाम पर मारे जा रहे हैं?

3. सुप्रीम कोर्ट ने सज्जन कुमार के खिलाफ नॉन बैलेबल वारंट निकाल दिया. तो 1984 से 25 साल बाद अब तो सज्जन कुमार गिरफ्तार हो जायेगा... या इसके लिये भी सिक्ख भाइयों को युरोप और यु-एस-ए में दबाव बनाना होगा?

4. मनमोहन 'सिंह' इतने महान निकले कि सिक्खों की कुर्बानी हंसते-हंसते दे रहे हैं. चाहे वो 1984 हो, या कश्मीर में सिक्खों की बड़े पैमाने पर हत्या, या अब पाकिस्तान, किसी से कुछ नहीं कहा जायेगा.

5. जूता मार कर एक खालसा ने टाइटलर का टिकट काट दिया. सरकार को रास्ते पर लाने के लिये कितने खालसों को जूते उठाने पड़ेंगे? कहां-कहां और किस-किस पर?

6. हिन्दुस्तान में 1411 बाघ हैं. सबको पता है. पाकिस्तान में 'सिंह' कितने है? इनको बचाने के लिये कौन सी कम्पनी बात करने की गुजारिश करेगी?

7. जो अल्पसंख्यक, मानवाधिकार, आदी-आदी वादी भारत के 'चिंताजनक' हालात पर बात करते नहीं थकते, क्यों वो चिंता नहीं करते हमारे उन लोगों कि जो बाहर अल्प-संख्यक हो गये हैं. क्या सिर्फ एक बयान भी इतना महंगा लगता है कि नहीं दिया जाता?

8. गुरु ने कहा था

चिड़ियां नाल मैं बाज लड़ांवा
तां गोबिंद सिंह नांव कहांवा...

और

देह शिवा वर मोहे इहै
शुभ कर्मन ते कबहुं न टरौं
न डरौं अरि सों जब जाय लरौं
निश्चय कर अपनी जीत करौं

तो क्या कमी हो गई हमारे निश्चय में कि जीती नहीं, हर बाजी हारी हमने और मोहताज हुये सहारे का उन्हीं लोगों का जो जिम्मेदार हैं इस शर्म का.

Saturday, February 6, 2010

'बेगुनाहों' ने मार दिया बाटला अभियुक्त को गिरफ्तार कराने वाले मास्टर को

दिल्ली के बाटला कांड के 'बेगुनाह' अब भी जेल में सड़ रहे हैं और उनके सुराग देने पर दिल्ली पुलिस की एटीएस आजमगढ़ जाकर शहजाद को पकड़ लाई. वही शहजाद जिसने कबूल किया कि उसने भी वीर शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा (जिसके परिवार की सुरक्षा दिल्ली सरकार ने वापस ले ली अभी-अभी) पर गोली चलाई थी.

शहजाद को पकड़ने में एटीएस की मदद एक स्थानीय स्कूल के प्रबंधक ने की थी. उसने एटीएस के लोगों को रुकने का स्थान मुहैया कराया और एटीएस को शहजाद के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिये. इनका नाम श्री दिनेश यादव था, जिन्हें अब मार दिया गया है. इस कांड में स्कूल का एक आदमी और भी मारे गये. 

सबसे पहले तो नमन उस शहीद दिनेश यादव को जिसने भेड़ियों के शहर में रहते हुये भी देश का साथ न छोड़ा, और फिर धिक्कार उस दिगविजय सिंह को जिसने अभी-अभी आजमगढ़ की यात्रा कर बाटला कार्यवाही पर सवाल उठाने वालों को यह भरोसा दिलाया कि वह जांच मे 'पूरा सच' निकलवायेंगे.

क्या है पूरा सच दिग्विजय सिंह?

  • क्या मोहनचंद्र कि हत्या आतंकियों ने नहीं की?

हमें भी बताओ तुम्हें किस चीज़ पर शक है.

दिग्विजय सिंह क्या तुम एक बार और जाओगे आजमगढ़ उस शहीद की अंतिम यात्रा में जिसने देशद्रोही आतंकियों के खिलाफ मुहिम में अपनी जान कुर्बान की? या फिर तुम सत्ता के भूखे भेड़िये की तरह सिर्फ वोट खसोटने के लिये ही यात्रायें करते हो?

अब भी जिन्हें बाटला कांड की सत्यता और श्री मोहन चंद्र शर्मा की शहीदी पर शक हो उन्हें शर्म से डूब मरना चाहिये. लेकिन अगर यह शर्म का मामला होता तो डूब भी मरते, यह तो साफ-साफ देशद्रोहियों की साजिश है.

बिहार में चुनाव होते हैं तो मुम्बई में हाहाकर मचता है, और मुंबई में चुनाव होने होते हैं तो बिहार में रेल स्टेशन जल जाता है. सत्ता हथियाने के लिये जो न करना पड़े वो कम है़.

जब देश जल रहा होगा तब सत्ताधारी उसके हाल पर रोयेंगे या नीरों की तरह चैन से बंसी बजायेंगे?

खबर: नईदुनिया के हवाले से.

Sunday, May 3, 2009

सरकार को पता है कि स्विस बैंको में माल किसका है, लेकिन आपको पता नहीं चलेगा

कांग्रेस के काम में भी बात है. वह जो भी करते हैं खुल्ले में, पूरे शानो-शौकत गाजे-बाजे के साथ करते हैं और कहते हैं, लो बेट्टा, कल्लो जो करना है. अपने पूर्व वित्तमंत्री चिदम्बरम जी ने पहले कहा कि उन्हें जर्मन सरकार ने नाम नहीं दिये – ‘लीगल प्रोसेस है भाई, समय लगता है’. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दर्ज ताजे हलफनामे में सरकार ने कहा की हां हमें नाम मालूम है.

खबर यहां पढ़ सकते हैं :

पहले ही पैरा में लिखा है : सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा दिया कि हमारे पास जर्मनी से स्विस बैंको के खातेदारों के ब्यौरे हैं, लेकिन हम 'confidentiality' की वजह से नाम जाहिर नहीं कर सकते.

नाम मालूम हैं?

मतलब उन्हें पता है कि किस-किस ने देश का धन चोरी किया.

piles_money बहुत सही खबर सुनाई है सरकार है. नाम पहले ही पता चल गये होंगे. उधर आडवाणी चिल्ला रहे थे कि भाई नाम लाओ, नाम लाओ इधर तो सारा कार्यक्रम हुआ बैठा है बिना बात को चिल्लाये आडवाणी. चलो जब सरकार को इन बेईमानों के नाम मालूम पड़ गये तो हमें भी चैन मिला. अभी सरकार करेगी प्रेस कान्फ्रेंस और छपेगी सारे नामों की लिस्ट. फिर जनता भी नेताओं वाले जूते लगा-लगाकर इन चोरों के सर सुजा देगी.

सही प्लानिंग है न भाई? अरे.. कहां चले? जूता खरीदने? जरा ठहरो भाई जरा बाकी एफिडेविट तो पढ़ लें.

ओये! यह क्या लिखा है? सरकार कहती है कि जनता को नहीं बतायेंगे कि किन-किन के नाम है.

जनता को नहीं बतायेंगे? क्यों नहीं बतायेंगे? क्या इसमें भी देश की सुरक्षा में जंग लग जायेगी? आतंकवादी छोड़ने पड़ेंगे?

नहीं, चोर पकड़ने पड़ेंगे.
भाई जब सरकार को मालूम पड़ गया है कि चोर कौन-कौन है तो क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि सरकर धरे उन्हें? सरकार ने कह तो दिया कि कर विभाग करेगा, लेकिन कब करेगा?

आपने सुना कि कोई बड़ा आदमी पकड़ा गया?
कहीं टैक्स बाबू रेड डालने गये? या फिर ये सिर्फ हमें आपको परेशान करने के लिये हैं.

चुनाव होते-होते तक सरकार ने कभी नहीं कहा कि हमें पता है,
वो कहते रहे कि ‘क्यों बोला, भई क्यों बोला’ अब जब चुनाव हो चले, वोट डल चुके तो सरकार ने कह दिया, हमें पता है, लेकिन हम कुछ नहीं करेंगे बोलो क्या कल्लोगे?

तो वोट दे दिया आपने? पेटी बंद. अब जाओ नहीं लाते देश का पैसा वापस. नहीं बताते चोरों के नाम

क्यों नहीं बताते?
भाई हिन्दू संस्कृति है, बीवियां अपने शोहरों के नाम नहीं लेती. हमारी सरकार कोई खसमानूंखानी थोड़े ही है.


confidentiality? किसको बचा रही है सरकार?

Friday, April 17, 2009

कसाब को किस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है?

अजमल कसाब जब पहले-पहल पकड़ा गया तो रो-रोकर उसने मांग की कि उसको मार दिया जाये, लेकिन थोड़ी ही देर बाद रोना अस्पताल में इलाज करवाने के लिये था. जेल गया तो पहले सारा कच्चा चिट्ठा उगल मारा. बाप-भाई, बहनोई सबके पते दे दिये, लेकिन हिन्दुस्तानी मेहमाननवाजी तो पूरे जग में प्रसिद्ध है, थोड़े दिन सरकारी मुर्ग खाये तो मुटिया गया, हिन्दुस्तानी कानून का हाल-बेहाल भी पता चल गया, इसलिए आजकल वो अपराधी नहीं नेताओं की तरह मांगे कर रहा है.

मुझे यह दो, मुझे वह दो, यह कैदी भी सुविधापरस्त हो चला है. जब ऐसी टोटल ऐश हो तो क्या डर कानून का, इसलिये अदालत में मजे से अपने बयान से मुकर गया. उसने कहा कि बयान तो दबाव में दिया था मैंने.

अगर इसकी जगह कोई और देश होता (जैसे चीन या रूस) तो पट से ट्रायल, और फटाक से फांसी तक पहुंच चुका होता कसाब. कसाब के अपराध को साबित करने के लिये भी लंबा मुकदमा चाहिये?

चलिये अब मुद्दे की बात पर आते हैं. आखिर कौन से कानून हैं वो जिनका उल्लंघन कसाब ने किया जब वो मुम्बई में लोगों की जानें लेने निकला (पूरे 166 लोगों को मारा इन इस्लामिक आतंकवादियों ने).

1. किसी व्यक्ति की जान लेना.
2. देश के खिलाफ युद्ध
3. लूट
4. खूब सारे और छोटे-मोटे कानून...

कानूनों कि लिस्ट लंबी है, और कसाब पर फाइल की गई चार्जशीट भी.... दिल थाम के सुनिये .... 1000, 2000, 3000.... नहीं, पूरे 11,000 पेज की है (पाकिस्तान के बाबा आजम के भी दद्दु गजनी के ताऊ से शुरु की होगी गपड़चौथ)

इस चार्जशीट को पढ़ने और समझने में लगेंगे जज को 20 साल, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाते-जाते और फैसला होते-होते कसाब भी अपनी हूरें कब्जाने जन्नतनशीन हो चुका होगा (बुढ़ापे से मरेगा)

अच्छा वो कानूनों की सूची पढ़ ली थी न आपने? सही सूची है न? कुछ कमीबेशी?.... नहीं है?

भाई आपको बता दें कि महाराष्ट्र (कांग्रेस का शासन है जी इधर) में एक धांसू कानून और है जिसे कहते हैं मकोका (MCOCA). नाम याद रखना. इस धांसू कानून के अंतर्गत कुछ और आतंकवादी बंद हैं जिन पर फौरन कांग्रेस के सेक्युलर सरकार ने मकोका चिपका दिया था और वो जेल में सड़ रहें हैं. वो थे 'हिन्दू आतंकवादी' प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित. कांग्रेस को भरोसा है कि प्रज्ञा और पुरोहित कसाब से ज्यादा खतरनाक हैं जिन पर ज्यादा कठोर कानून लगना चाहिये.

वैसे ये भी पता होना चाहिये कि अगर कसाब पर मकोका लगा होता तो वह आज अदालत में मुकर नहीं पाता क्योंकि मकोका के अंतर्गत उच्च पुलिस अधिकारी के आगे दिया बयान मान्य होता है. अब जब कसाब अपने हल्फिया बयान से मुकर गया तो पुलिस की सारी कार्यवाही नये सिरे से होगी (मतलब अफजल को नया हमसाया मिल गया).

और भी जबर्दस्त खबर सुनेंगे?

कसाब के वकील (वही जो दाउद के गुर्गों के मुकदमे लड़ता रहा है) ने कहा कि भैया कसाब तो एकदम बच्चा है. उस पर मुकदमा बच्चों के कोर्ट में चलाया जाये, इस कोर्ट को कोई हक नहीं सुनवाई की. अब समझे वाघमारे को हटाने का राज? जैसे-जैसे केस पुराना होगा, कसाब के खिलाफ तथ्य हल्के होंगे और उसके पक्ष में मजबूत.

अब तो यह सोचता हूं कि क्यों तुकाराम ओंबले ने जान देकर इस हरामखोर को जिंदा पकड़ा, ठोक देना था वहीं.

क्या आप में से कोई मुम्बई की चुनी हुई सरकार से पूछेगा कि उसे कसाब मकोका के लायक क्यों नहीं लगा?

Saturday, April 11, 2009

आइये, वापस कंधार चलें

आजकल गलती से कोई न्यूज़ चैनल खुल जाये तो कोई न कोई कांग्रेसी दिख जाता है एनडीए के पांच साला शासन को याद करते हुये. चाहे वो कपिल सिब्बल हो, दिग्विजय, राहुल, सोनिया, मनमोहन, या कोई और, सब एनडीए की यादों में खोये हुये हैं, ऐसा लगता है कि पिछले 5 सालों में भी शासन भाजपा का ही रहा है.

Debating एक कला है और उसमें कांग्रेस ने जो तरीका अपनाया है उसे कहते हैं ‘Tu Quoque’ (you too) इसका मतलब है कि हम तो चोर हैं सनम, तू भी चोर ही है. मतलब अगर सोनिया गांधी एनडीए के राज में हुये विस्फोटों का हवाला दें तो वो इस argument के जरिये कांग्रेस के शासन काल में हुये विस्फोटों को justify कर रही हैं.

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लेकिन एक बात याद रखिये, गलती चाहे कोई भी करे, कितनी भी बार की जाये, गलती तो गलती है. इसलिये कांग्रेस की यह दलील कि तुम भी चोर ही हो सिर्फ वाद-विवाद प्रतियोगिता में ही अंक दिला सकती है. मतलब कांग्रेस के शासन में हुये मुम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद, बंगलुरु, आसाम, में हुई घटनाओं के लिये यह सफाई काफी नहीं.

1. हर incompetence, हर असफलता, हर बेईमानी का जवाब यह नहीं कि उनके शासन काल में भी ऐसा हुआ था. अगर ऐसा था कांग्रेस, तो हम उन्हें ही क्यों न चुनें? आपको क्यों चुनें?

वैसे एनडिए के शासनकाल इतना सफल रहा कि जब उसका अंत आया तो india shining था, और आज जब कांग्रेस के यूपीए के शासनकाल का अंत हो रहा है तो india whining हो रहा है. इसकी जिम्मेदारी भाजपा नहीं कांग्रेस के सर ही है.

और अब बात करें मुख्य मुद्दे की, बात करें कंधार की. कांग्रेस ने कंधार के नाम पर एक ऐसा दाग लगाया है भाजपा पर जिसका जवाब मुश्किल ही देते बनता है. लेकिन मैं कहता हूं कि कंधार का सबक एनडीए को मिला जरूर, लेकिन उसके पीछे का कारण भाजपा की कमजोरी नहीं शासन की तुरत-फुरत कार्य करने की क्षमता की विफलता थी. यह एक ऐसी शासन प्रणाली की देन थी जिसे भाजपा को विरासत में दिया गया था, और जो घटनाक्रम उस समय बना, उसमें शायद दूसरा फैसला कर पाने की शक्ती भाजपा में ही नहीं, देश में भी नहीं थी.

में उस घटनाक्रम की तुलना करूंगा black September से, जिसके बाद इज़राइल की नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव आया. उस घटना में इज़राइल के 11 खिलाड़ी जर्मनी के ओलम्पिक खेलों में इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा अपहृत कर लिये (PLO द्वारा) और उनकी मांगे एक नहीं इज़राइल की जेलों में सड़ रहे सभी आतंकवादियों को छोड़ने की थी.

उस मामले पर बात चालू थी, और कहते हैं कि इज़राइल की सरकार कुछ लोगों को छोड़ने के लिये तैयार भी हो गई थी (सभी को नहीं), म्युनिख के हवाई अड्डे पर उन्हें हैलिकाप्टर भी दिया गया, लेकिन जर्मन सेना की जल्दबाजी से सारे खिलाड़ी मारे गये. उस समय इज़राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर को बहुत criticism का सामना करना पड़ा और उन्हें ऐसा कसाई भी कहा गया जिसने उन खिलाड़ियों को मरने छोड़ दिया. आज जरुर उन आतंकवादियों को न छोड़ने पर गर्व किया जाता है.

कंधार के घटनाक्रम में 11 नहीं, 110 नहीं 200 से ज्यादा लोग उन आतंकवादियों के कब्जे में थे. कौन भूल सकता है उन लोगों के बिलखते हुये परिजनों को जिन्हें हिन्दुस्तानी टीवी चैनल लागातार दिखा रहे थे. एक शो में मैंने एक फैशन डिज़ाइनर को रो-रोकर अपने दोस्त/भाई/कुछ और को छुड़वाने के लिये कहते सुना, शब्द कुछ ऐसे याद पड़ते हैं “कुछ भी करो, मान लो उनकी बातें.. बचा लो… बू हू… बचा लो”

सेना के एक शहीद की बेवा ने जब कहा कि आतंकवादियों को नहीं छोड़ना चाहिये तो उसे डपटकर चुप करा दिया गया. मतलब उस समय पूरा देश सहानूभूती से लबरेज था. देश की सरकार पर बहुत जबर्दस्त दबाव था उन लोगों को बचाने का, प्रेस की मुहिम भी यही थी.

उधर जहाज हमारे बुर्जुआ हो चुके सुरक्षा तंत्र के अव्यवस्था के चलते कंधार पहुंच चुका था. तालिबान के इस्लामिक आतंकवादियों के बीच, उनके हवाई अड्डे पर. वो न हमें कोई बात करने देने को तैयार थे, न कोई सैनिक आपरेशन चलाने देने के. असल में वो उन आतंकवादियों के ही साथी थे. कोई और देश होता, तो वो नहीं होता जो हुआ.

उस समय को याद कीजिये, उस समय में खुद अपनी अनुभूतियों को याद कीजिये, और याद कीजिये उस दर्द को सबने महसूस किया. उस समय की सबसे बड़ी priority आतंकवादी या आतंकवाद से मुकाबला नहीं उन 200 लोगों को बचाने की बन चुकी थी. और इसलिये कंधार हुआ.

क्या आप सोचते हैं कि भाजपा ने जो किया उस घटनाक्रम में कांग्रेस कुछ अलग कर पाती?

लेकिन अब बात करते हैं उसकी जो नहीं हुआ, जो भाजपा ने भी नहीं किया और कांग्रेस ने भी नहीं. बात करते हैं black September के बाद हुये उस घटनाक्रम की जिसने सारे इस्लामिक आतंकवादियों के दिल दहला दिये.

इज़रायल की सुरक्षा एजेंसी मौसाद ने 16 लोगों के बारे में पता लगाया जो काले सितंबर के जनक थे और उनमें से 11 को कार्यवाही में मारा.

  1. क्यों जीवित है अब तक हिन्दुस्तान के दुश्मन?
  2. रॉ जिसके नाम से सारा पाकिस्तान कांपता है क्यों दाउद इब्राहिम को देश में नहीं ला पाई, या विदेश में ही खत्म नहीं कर पाई.
  3. जिन्होंने कंधार आदी को अंजाम दिया, उन्हें हम क्यों सजा नहीं दे पाये.

मैं मानता हूं कि भाजपा और कांग्रेस की विफलता भी यही है… जो कंधार के बाद हुआ. कंधार विफलता नहीं विवशता थी.

क्या हम अपेक्षा करें की अगली चुनी हुई सरकार देश के दुश्मनों की दुश्मन बनकर दिखायेगी?

Saturday, November 22, 2008

शिवराज पाटिल ने कहा, "पुलिस सवालों के जवाब न दे, और चुप रहे, तो समस्या कम हो जायेगी"

आज एक चैनल पर शिवराज पाटिल का बयान सुना, वो बात कर रहे थे हाल के पुलिसिया घटनाक्रम के बारे में. बयान तो अंग्रेजी में था, लेकिन सार यह है.

"अगर पुलिस कोई बात कोर्ट को बताये, और वह कोर्ट से मीडिया तक पहुंचे तो यह जायज है. लेकिन अगर पुलिस मीडिया से लगातार सीधे लीक कर रही है तो नहीं. वो बहुत सवाल पूछेंगे, लेकिन पुलिस सवालों के जवाब न दे, और चुप रहे तो समस्या कम हो जायेगी."

सही नब्ज पकड़ी है समस्या की शिवराज पाटिल ने. समस्या यह नहीं है कि आतंकवाद है. समस्या यह नहीं है कि अत्याचार है, समस्या यह नहीं है कि देश में विभेद हैं. समस्या है जानकारी. समस्या हैं सवाल. अगर लोगों तक जानकारी नहीं पहुंचे तो समस्या ही नहीं रहेगी. क्योंकि जो समस्या इतने ढंग से छुपी हो जिसके बारे में किसी को पता ही न चले तो वह इन राजनेताओं के लिये समस्या है ही नहीं. सोचिये अगर गुजरात में विस्फोट हो, और आपको दिल्ली में पता ही न चले, तो आप बेखबर मजे में समय बिताते रहेंगे. इस खबर की वजह से ही तो आपका दिन खराब होता है. इस खबर की वजह से ही तो आप सोचने पर मजबूर होते हैं.

तो पुलिस को सही बात कही है पाटिल ने. सवालों के जवाब मत दो. यह नहीं कहा कि अत्याचार मत करो. यह नहीं कहा की निर्दोषों को सताओ मत. यह नहीं कहा की मजबूरों की रपटें दर्ज करो. यह नहीं कहा कि जिन्हें मदद की जरुरत है उनकी मदद करो. यह नहीं कहा की अपराधिओं को बचाना बंद करो. कहा की सवालों का जवाब मत दो. जब-जब तुम्हारी जवाबदेही मांगी जाये, जब-जब तुमसे पूछा जाये की बताओ,ऐसा क्यों हुआ तो चुप साध के बैठ जाओ. आखिर जवाबों के अभाव में सवाल भी तो मर जाते हैं. सारे सवाल मर जायेंगे, और तुम बच जाओगे.

पाटिल चाहे कितना ही अकर्मण्य प्रशासनिक हो, राजनीतिज्ञ कुशल है. तभी तो पिछले पांच सालों में उनकी कुर्सी अडिग रही, देश की अखंडता चाहे कितनी ही डिगी हो.

तो जिनके मन में सवाल मंडरा रहे हों, उनके सभी से गुजारिश है कि मर जाने दो हर सवाल को बिना जवाब के और मूक बन के देखो इस नंगे विद्रुप को.

और कुछ सवाल जिनके जवाब नहीं दिये जाने चाहिये.

1. क्यों सरकार नहीं पूछती स्विस बैंको से हिन्दुस्तानी खातेदारे के ब्यौरे? (जिनके बारे में कहा है कि सरकार पूछे तो वे देंगे)
2. जिन बिल्डरों ने पिछले पांच साल में करोड़ों का फायदा बनाया (sez, और उठते भू-दामों के कारण) उन्हें मंदी के आते ही दनादन छूटें क्यों दी गईं, जबकी विदर्भ के मरते किसानों के लिये कुछ नहीं किया?
3. क्यों किसी भी विस्फोट की जांच निष्कर्ष निकालने में हमेशा निष्फल रहती है और अपराधी खुले घूमते हैं, और चैन से जिंदगी काट रहे हैं?
4. सरकारी तंत्र दिन-ब-दिन, और, और क्यों सड़ रहा है?
5. बड़े उद्योगों के पैरों पर लोट लगाने वाला वित्त मंत्रालय छोटे उद्योंगो पर लगातार प्रहार क्यों कर रहा है?
6. जिन सड़कों पर करोड़ों हर साल खर्च किया जाता है, वो बार-बार टूट जाती हैं?
7. सांसद अपनी निधी किस बिना पर खर्च करते हैं? और उसका हिसाब कौन जांचता है?
8. क्यों हर नेता लगातार अमीर, और अमीर होता जा रहा है? इनकी स्कोर्पियो, फोर्ड इन्डीवरों से सड़कें भर गयी है, और पार्टियों के झंडे हर गाड़ी पर लगे हैं. कहां से आ रहा है यह पैसा?

क्यों...
क्यों...

नहीं, इनके भी जवाब मत देना.

Tuesday, September 16, 2008

क्यों भारत सरकार फैसले की घड़ी पर हमेशा खुद को असहाय पाती है ?

leader

हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं, एक दिखाने के लिये, और दूसरा छिपाने के लिये. राजनीतिज्ञ से ज्यादा perception की महत्ता कोई और नहीं समझता, इसलिए इनके लिये करने से ज्यादा जरूरी है दिखाना की हम कर रहे हैं.

सच्चाई ये है  कि अगर कोई राजनीतिज्ञ दिखावे से ऊपर उठकर अपनी विचारधारा, या बताई हुईं नीतियां लागू करने पर आ जाये तो शर्तिया वो राजनीति में कुछ ही रोज़ का मेहमान रहेगा.

इसलिये आपकी-हमारी सरकार चिल्लाती रहेगी - हम कर रहे हैं-हम कर रहें हैं, लेकिन एक भी असरदार कदम आपको नहीं दिखेगा.

आज dissect करते हैं कि ऐसा है, तो क्यों.

1. विविधता वाले जनतंत्र में हर मत के लिये पर्याप्त विरोध मौजूद है.

पूंजीवादी, समाजवादी, माओवादी, नस्लवादी, राष्ट्रवादी, मानवतावादी, ... हर तरह के वादी के लिये इस देश में पर्याप्त जगह है. क्योंकि इस देश में इतनी विविधता है, कि हर रंग, हर ढंग के लोग और विचार हैं यहां.

इसलिये पूरे देश के लिये समान नीति बनाना असंभव सी बात हो जाती है. मुद्दा चाहे हेल्मेट पहनने जैसी छोटी सी बात का हो, वैट जैसे वित्तिय प्रावाधानों, या फिर मकोका जैसे अपराध-निरोधी कानून, पूरे देश में हर नीति के विरोधी हैं, और विरोधी भी प्रबल और अधि-संख्यी, जिन्हें दबाना या समझाना मुश्किल हो.

साथ ही जब भी कोई नीती या मुद्दा उठता है, अवसरवादी लोग उसपर अपनी रोटियां सेंकने आ जाते हैं. इसलिये कोई आश्चर्य नहीं की आतंकवाद जैसे खतरनाक मुद्दों के साथ भी राजनीति चल रही है.

2. भारतीय सरकार का उद्देश्य राज्य नहीं, सरकार की रक्षा है

अजीब विडम्बना है कि वर्तमान भारत सरकार परमाणू करार जैसे अमुद्दे पर गिरने को तैयार है, लेकिन आतंकवाद जैसे बड़े खतरे का मुकाबला करने के लिये अप्रिय निर्णय लेने को तैयार नहीं.

इसका कारण यह है कि हमारी सरकार का उद्देश्य राज्य नहीं, अपने राज की रक्षा करना है. अपने वोट बटोरने के लिए कुछ पार्टियों ने मुस्लिम वर्ग को लगातार मुख्य धारा से अलग रखने के लिये कुटिल चालें चलीं और कामयाब रही.

एक पूरे वर्ग को programmed paranoia का शिकार बनाया गया ताकी उन्हें अपने मतलबानुसार वोट देने पर बाध्य किया जा सके. लेकिन इस paranoia का प्रभाव ये राजनीतिक दल भी नियंत्रण में नहीं रख पाये और उन्हें इस शक्तिशाली वोटबैंक का बंधुआ बनना पड़ा.

इसलिये अब सरकार परमाणू परिक्षण के नाम पर गिरना स्वीकार कर सकती है, क्योंकि कांग्रेस को पता है कि उसके वापस आने की संभावनायें बनीं रहेंगी, लेकिन अगर वो अपने मुख्य वोट बैंक को अगर वे नाराज करते हैं तो उनके वापस आने की कोई संभावना नहीं. इसलिये आतंकवादियों के खिलाफ उस स्तर के combing operations नहीं होते जिनकी जरुरत है.

3. राजनेता की योग्यता कर्मवीरता नहीं वाकवीरता से नापी जाती है

किसी कार्यालय के निचले स्तर के कर्मचारियों तक की भर्ती में योग्यता मापी जाती है. देखा जाता है कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का कितनी अच्छी तरह से निर्वाह कर पाता है. लेकिन राजनेताओं की योग्यता मापने का कोई मानदंड नहीं है.

ज्यादातर कोई व्यक्ति राजनेता इसलिये बनता है क्योंकि वो किसी खास जाती, समुदाय, परिवार का है, वाक्पटु है, या अपने समाज में किसी कारण से लोकप्रिय है. इस बात का ख्याल नहीं रखा जाता की सामने वाला राजकर्म में कितना कुशल है. इसलिये आज व्यापारी पैसों के बल पर, गुंडे बाहुबल पर, और फिल्मी कलाकार अपनी प्रसिद्धी के बल पर राजनेता बन रहे हैं.

यह लोग जब सरकार में जाते हैं तो राज्यकर्म में खुद को असहाय पाते हैं. या तो यह फैसला नहीं ले पाते, गलत फैसला लेते हैं, या अगर फैसला सही भी हो तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाते.

4. राजनैतिक पार्टियां काम करने वाले नहीं, चुनकर आने वालों को टिकट देती हैं.

यह लोकशाही की बुनियादी असफलता है कि उसके चुने गये राजकर्मियों की सफलता का मानदंड उनके द्वारा लागू नीतियों के कल्याणकारी प्रभाव नहीं, बलकि लोकप्रियता है. इसलिये कोई भी ऐसा फैसला कैसे लिया जाये जो लोकहित में हो, लेकिन लोकप्रिय नहीं?

अगर कोई राजनेता अपने कार्य का अच्छी तरह से निर्वाह करेगा तो कम-से-कम short-term में तो वो बहुत से लोगों को नाराज़ कर देगा, और उसका दोबारा चुनकर आना संदिग्ध हो जायेगा. इसलिये पार्टियां ऐसे उम्मीदवार चुनती हैं जो काम चाहे न करें, लेकिन लोगों को यकीन दिला दें की वो उनके भले में लगे हैं.

कौम के गम में खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ

देने दिलासा उनको, जो बम से खूनो-ख्वार हुये 
नई पोशाक में आयेंगे, दुख तमाम के साथ
(विश्व)

Monday, September 15, 2008

क्या बजरंग दल/विहिप इंडियन मुजाहिदीन जैसे हैं ?

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कुछ वक्फ़ा पहले जब सिमि पर से प्रतिबंध हटाने का विरोध हुआ, और नये सिरे से प्रतिबंध लगाने के लिये आंदोलन चालू हुआ तो कुछ राजनीतिक पार्टियों ने इसका विरोध किया. उनके अनुसार सिमि पर से प्रतिबंध हटना चाहिये. इनमें शामिल हैं - लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह, व कांग्रेस.

दलीलें कई दी गयीं, लेकिन सबसे हास्यास्पद बात थी यह मांग की सिमि पर प्रतिबंध है तो बजरंग दल व विहिप पर भी लगना चाहिये. आइये, आज इसी मांग का dissection करें.

- एक बार प्रभु ने रामधन से कहा 'मांग जो तुझे चाहिये, बस शर्त इतनी के तेरे पड़ोसी को उससे दुगुना मिलेगा'. रामधन सोच कर बोला, 'प्रभू मेरी एक आंख फोड़ दो'.

लालू, मुलायम, रामविलास सिमी पर प्रतिबंध लगवाने के लिये तैयार हैं, बशर्ते विहिप और बजरंग दल पर लग जाये. वाह री राजनीति!

- सउदी धर्म के किसी मौलाना के भाषण में सुना (Documentary : Radical Islam) कि अमेरिकी और बाकी विश्व उसका तेल ले रहा है, और सउदी अरब की हर तकलीफ के जिम्मेदार वो हैं, यहां तक की वहां होने वाले अपराधों का भी.

नेता चाहे यहां के हो, या वहां के, जानते हैं कि जनता को अच्छी जिंदगी न दे सकें तो एक मुद्दा थमा देना चाहिये. इसलिये लालू-पार्टी मुसलमानों के उत्थान के लिये चाहे कुछ करे-न-करे, बजरंग दल के मुद्दे को उछाल कर उनका भावनात्मक शोषण तो कर ही रही है.

-अगर कभी दाउद हिन्दुस्तान की गिरफ्त में आया तो कहेगा, 'मुझे पकड़ने से पहले छोटा राजन को पकड़ो, वरना मुझे भी खुला छोड़ दो.'

साफ बात है, कांग्रेस-लालू पार्टी को कई सौ लोगों की जान लेने की जिम्मेदार इंडियन मुजाहिद्दीन (सिमी भी कह सकते हैं) पर नकेल तभी स्वीकार है जब पहले बजरंग-दल और विहिप पर नकेल कस चुकी हो.

- भेड़िये को पकड़ने से पहले मरखने बकरे का फैसला करेगी यह सरकार.

ये तो सभी मानते हैं कि बजरंग दल वाले कोई महान कार्य नहीं कर रहे, लेकिन उनकी सिमी से तुलना उनका मूल्यांकन उन्हें एक बहुत अलग स्तर पर ले जाना है.

बजरंग दल की तरह की गतिविधियां करने वाली तो न जाने कितने छोटे-मोटे इस्लामिक संगठन हैं जिन पर प्रतिबंध की तो मांग भी नहीं उठी है (परिप्रेक्ष्य तस्लीमा के खिलाफ गतिविधियां).

बजरंगीयों में शैतानियत कम, बेवकूफी ज्यादा है, लेकिन सिमी और उसका इंडियन मुजाहिद्दीन खुले तौर पर शैतान की औलादें हैं.

तो फिर सिमी से बजरंग दल की तुलना क्यों करते हैं यह राजनेता?

- ताकी वो आपका अपनी अकर्मण्यता से ध्यान हटा सकें.

- ताकी वो मुस्लिम समाज को मुगालते में रख सकें की वो उनके हितचिन्तक हैं.

- ताकी वो अपने मुस्लिम वोट बैंक को बनाये रख पायें, और इसकी कीमत वो बम विस्फोटों में निर्दोष जानों से देने को तैयार हैं.

- ताकी वो अपने विरोधी पार्टियों, व दलों को बैकफुट पर ला सकें (If you don't have a defense, respond with an attack).

कोई भी स्टैन्ड दो ही कारणों से लिया जाता है

1. प्रबल विचार.
2. जाती फायदा.

यह सोचना मूर्खता है कि जो राजनीतिज्ञ सिमी पर प्रतिबंध का विरोध कर रहे थे वो अपने वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते ऐसा कर रहे थे. क्योंकि लोगों की हत्या की प्रतिबद्धता तो सिर्फ आतंकियों की होगी, और यकीनन कोई भी नेता उस जमात में नहीं शामिल दिखना चाहेगा.

तो उन्होंने ऐसा क्यों किया इसका जवाब सिर्फ जाती फायदे वाले नुक्ते में ढूंढ़िये.

 अफक के पार भी नजारा है बहुत दूर तलक
तंग-चश्मों को मगर इल्म-ए-हकीकत क्यों हो
(विश्व)

- मुद्दआ जारी रहेगा.

और हां. बजरंग दल के साथ क्या होना चाहिये, आगे इसकी चर्चा भी होगी.

Sunday, September 14, 2008

हमने पोटा हटाया, मकोका नहीं क्योंकि वो पुराना था. और हां गुजरात के लिये मकोका जैसा नया कानून नहीं देंगे.

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अभिषेक मनु सिंघवी सावधान राजनेता हैं, वो चाहते हैं कि लोग उनका वही मतलब समझें जो वो कहना चाहते हैं. वो टेलिव्हिजन पर कहते हैं - "मुझे पूरा मौका दीजिये अपनी बात कहने का, क्योंकि बहुत सारे लोग देख रहे हैं, और वो भी अपना दिमाग इस्तेमाल करेंगे."

लेकिन लगता है कि अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ही बात पर भरोसा नहीं. नहीं तो वो समझ जाते की जो दलीलें उन्होंने दीं वो कितनी थोथी थीं.

राजनीति मुद्दे से ध्यान भटकाकर अमुद्दे पर ले जाने की कला है, और अरुण जेटली भी इसमें कम माहिर नहीं. दोनों शातिर खिलाड़ी लगे हैं सबको बेवकूफ बनाने.

- कांग्रेस आतंकवादी विरोधी कानून बनाने को तैयार नहीं.
- बीजेपी केन्द्र संचालित आतंकवाद निरोधक विभाग के लिये तैयार नहीं.

क्यों? क्यों? क्यों? क्यों?!!!!

कांग्रेस कहती है

- पोटा कानून के अंतर्गत मानवाधिकार उल्लंघन का रिकार्ड है.
1. आतंकवाद के अंतर्गत मानवाधिकार उल्लंघन नहीं होता? कुल कितनी जानें गईं  - अहमदाबाद विस्फोट, मुम्बई, बैंगलोर, दिल्ली. क्या पोटा में उससे ज्यादा लोगों के मानवाधिकार का उल्लंघन हुआ?

क्या देश के नागरिक मानव नहीं हैं?

2. मानवाधिकार का उल्लंघन कानून नहीं करता, कानून के कारिंदे करते हैं. मानवाधिकार का उल्लंघन दफा 300, 302, 320, 351, (आगे)... में भी किया जा सकता है, तो क्यों न आप देश के सारे कानून निरस्त करें?

देश में हर साल कितने लोगों की पुलिस कस्टडी में जान जाती है? क्या वो सब पोटा के अंतर्गत मरते हैं? या उनके मानवाधिकार पोटा बंदी के मानवाधिकारों से कम थे?

क्या जरुरत कानून से बचने की है या उसका सही इस्तेमाल पक्का करने की.

हां ? नहीं ?

- पोटा से क्या आतंकवादी घटनायें रुक गईं ? संसद पर फिर भी हमला हुआ.

कांग्रेस की इस दलील पर कुर्बान हो जाने का दिल करता है.

इतने सारे कानून हैं इस देश में. कत्ल के खिलाफ, चोरी के खिलाफ, ब्लात्कार के खिलाफ, फिर भी क्या यह सब अपराध रुके?

हटा दो! हर कानून मिटा दो! विनती है तुमसे.

अपराध का निर्मूलन कानून बनाने से कब हुआ है? अपराध का निर्मूलन कानून को सही लागू करने से होता है. लेकिन लागू करने वालों के हाथों में सही कानून होना चाहिये. क्या खाली हाथ हमारी सुरक्षा एजेंसियां बदकार आतंकवादियों से लड़ पायेंगी?

- पोटा के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया.

लेकिन कानून तो बनाया गया था आतंकवादियों को निशाना बनाने के लिये. तो क्यों न यह निश्चित किया गया कि जो निर्दोष हो (बहुसंख्यक समुदाय से, या अल्पसंख्यक समुदाय से) उसे बचाया जा सके.

दूसरी बात. लगभग सभी आतंकवादी अल्पसंख्यक समुदाय के ही हैं. उन्हें बड़े स्तर पर प्रोपोगेन्डा का इस्तेमाल कर देश व समाज के विरुद्ध ब्रेनवाश किया जा रहा है. जब लगभग हर आतंकवादी इसी समाज का हो, तो यह दलील देना बहुत आसान है कि इस अल्पसंख्यक समाज को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि जो आतंकवादी मिलेगा, ज्यादातर मामलों में इसी समुदाय का होगा. तब क्या उसको गिरफ्तार न किया जाये?

क्या जो बचे-खुचे कानून हैं, उनमें अल्पसंख्यकों को गिरफ्तार न करने का प्रावाधान है, आरोप चाहे जो हो?

- गुजरात को मकोका जैसा कानून नहीं देंगे, क्योंकि गुजरात में उसका बेजा इस्तेमाल हो सकता है. महाराष्ट्र से मकोका नहीं हटायेंगे, क्योंकि वो पुराना है.

क्या हम सब देशवासी निर्बुद्धी हैं जिन्हें इस दलील के छेद दिखाई नहीं देंगे़?

गुजरात क्या देश का हिस्सा नहीं? या आतंकवाद गुजरात की समस्या नहीं? क्या केन्द्र सरकार को अहमदाबाद, अक्षरधाम, सूरत दिखाई नहीं देते? या फिर गुजराती मरें तो केन्द्र को फर्क नहीं पड़ता? तो क्यों न गुजरात को महाराष्ट्र की बराबरी का दर्जा देकर मकोका जैसा कानून दिया जाये?

या अगर ये ही मान लें कि मकोका इसलिये नहीं देना चाहिये क्योंकि उसका बेजा इस्तेमाल होगा तो फिर महाराष्ट्र में क्यों इस तरह का कानून है? वहां क्या इल्जाम नहीं लगे कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल हो रहा है?  या क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है तो वहां इसका बेजा इस्तेमाल इजाजत योग्य है?

अगर किसी कानून के गलत इस्तेमाल की संभावनायें हैं, इतनी कि उसे दूसरे राज्य में लागू करना सहीं नहीं माना जा रहा, तो क्या सिर्फ इस आधार पर उसे निरस्त न करना उचित है कि वह पुराना है?

अगर इस तर्क को उचित माना जाये तो फिर उन सारे कानूनों को निरस्त कैसे करा जा सकता था जिनका निर्माण अंग्रेजों ने देशवासियों का दमन करने के लिये किया था?

बीजेपी कहती है

- केन्द्रीय जांच एजेंसी से पहले पोटा जैसा कानून लाइये.

कांग्रेस आतंकवाद की जांच के लिये केन्द्रीय एजेन्सी बनाना चाहती है, लेकिन बीजेपी का कहना है कि समर्थन के लिये पोटा जैसा कानून लाइये.

एक तरफ तो अरुण जेटली का कहना है कि केन्द्रीय जांच बल की सोच आडवाणी की थी और उसके लिये तब कांग्रेस शासित प्रदेश तैयार नहीं थे. अब उसके शासित प्रदेश इसके निर्माण के लिये तैयार नहीं? निरी धांधली है यह.

क्या केन्द्रीय जांच ऐजेंसी का निर्माण सिर्फ इसलिये टलता रहे कि दोनों पार्टियां अपनी छिछली सौदेबाजी और बदला लेने की कार्यवाही में लगी हैं. क्या देशवासियों की जान इतनी सस्ती है?

बीजेपी को क्यों दिखाई नहीं देता की हर छोटा-से-छोटा कदम जिससे आतंकवादी कमजोर हो, देशहित में हैं, और इसको रोकने के बदले प्रोत्साहित करना चाहिये. क्या इस मुद्दे यह ओछापन देशद्रोह से कम है?

मैं कहता हूं

टूट जायेगी गुलामी की कड़ी दम भर में आप
हिन्दु-ओ-मुस्लिम के बस कंधा सटा देने के बाद
(माहिर)

ऐ हिन्दू, ऐ मुसलमान. उठ जाओ दीनो-धर्म से ऊपर.

सबसे बड़ा धर्म है इंसानियत, क्योंकि खुदा तक ने तुम्हें अकेला छोड़ दिया पाप-पुण्य के नाम पर मरने को और साथ दिया तो बस दूसरे इन्सानों ने.

आतंकवाद का उन्मूलन करने के लिये बात हो लिबर्टी की, फ्रीडम की, उम्मीद की, दीन की बिलकुल नहीं, धर्म की बिलकुल नहीं.

सबसे पहले तो हर देशवासी निश्चय करे की देश के खिलाफ किसी प्रकार का प्रोपोगेन्डा सुना न जाये, और इसके प्रसार को रोका जाये.

-- मुद्दआ जारी रहेगा.