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Friday, June 11, 2010

भारत की सरकार न्यौत चुकी है भोपाल से भी बड़ा जीनोसाइड... भारत क्या तुम इसके लिये तैयार हो?

भोपाल की टीस फैसले के बाद उभर चुकी है. मुनाफे के वहशी भेड़ियों के द्वारा किया गया वह कत्ले-आम बाहर वालों के लिये सिर्फ चंद तस्वीरें बन कर रह गया है लेकिन भोपाल वालों के सीने में अब भी धधक रहा है.

20,000 लोगों की मौत पर मारा गया $470 मिलियन का तमाचा, आज़ाद घूमते वो बड़े पद वाले जिन्होंने भोपाल में हर नियम की धज्जियां उड़ाईं और सस्ते में छूट चुके छोटे अफसर भारत के शर्मनाक हद तक गिर चुकी न्याय व्यवस्था की कहानी बयां कर रही हैं.

भारत कभी उस दर्दनाक हादसे को भूले न भूले आपके सरकारी हुक्मरान उसे दफना चुके हैं और इसलिये वह तैयारी कर रहे हैं भोपाल से भी बड़े हादसे की. बात हो रही है भारत-अमेरिका के बीच होने वाले न्युक्लियर करार की जो आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखों का वो सपना है जिसे पूरा करने के लिये वो कुर्सी गंवाने की हद तक जाने को तैयार थे.

भूलियेगा नहीं किस तरह आपके ही एक साथी ब्लागर अमर सिंह ने सांसदो को पैसे देकर मनमोहन की सरकार बचवाई (ऐसा IBN पर देखा था).

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आपको इस न्युक्लियर करार के बारे में पता है? यह वह करार है जो भारत को विश्व शक्ति का दर्जा दिलवा सकता है. वह करार जो भारत को एकलौता ऐसा देश बनायेगा जो संयुक्त राष्ट्र का परमानेन्ट सदस्य न होकर भी मुक्त रूप से परमाणू ऊर्जा के व्यापार में हिस्सा ले सकेगा.

जिसके बाद आयेंगी अमेरिकी परमाणू कम्पनियां भारत में और पैसे लेकर लगायेंगी वह संयंत्र जिसमें परमाणू ऊर्जा से बिजली बन पाये.

लेकिन यह करार सिर्फ पैसे के बदले मिलता तो कीमत छौटी थी. इसकी कीमत हम बहुत बड़ी चुकानी को तैयार हैं. इसकी कीमत हम देने को तैयार है लांखों जानों से. जो इस करार को करने के लिये भोपाल को भुला चुके हैं वो चेर्नोबिल याद कर लें. वहां भी था एक परमाणू संयंत्र जहां पर हुई दुर्घटना के प्रभाव से 100,000 (एक लाख) से ज्यादा जानें कैन्सर से गईं और 10,000,000 (दस लाख) से ज्यादा लोग कैंसर ग्रस्त हुये. यह कह रही है ग्रीनपीस की ताज़ा रपट.

कामन सेन्स कहता है कि किसी भी दुर्घटना को रोकना हो तो ऐसे कठोर नियम बनाने चाहिए जिसमें गलती की कोई जगह न हो. और उन नियमों का पालन न करने वालों को सख्त से सख्त सज़ा देनी चाहिये ताकी कोई कोताही न करे... लेकिन भारत की कांग्रेस सरकार ने कह दिया है कि आप इस देश में आयेंगे तो आपको हम पूरा लाइसेंस देंगे देश में लाखों जानों से खेलने का और अगर आपने दुर्घटना कर दी तो आपको हम पूरी मदद करेंगे बिना किसी जवाबदारी के साफ बच कर जाने को.

भोपाल के नरसंहार के बाद हमारी सरकारी मशीनरी तुरत-फुरत हरकत में आयी... काबिले-तारीफ थी वह तेज़ी, लेकिन तेज़ी थी क्योंकि यूनियन कार्बाइड के दोषियों को बचाना था. इसलिये कानून ताक पर रखे गये, नियम भुलाये गये और ऊपर-ऊपर और ऊपर से आदेश आते रहे दोषियों को बचाने के लिये.

लेकिन इस बार सरकार ने और भी तेज़ी दिखाई है. दोषियों को बचाने के लिये दुर्घटना होने का इंतज़ार तक नहीं किया... पहले ही सर्टिफिकेट दे दिया कि आप चाहें जितनों को मारें हम आपका पीछा नहीं करेंगे. फिर हम मांग लेंगे आपसे चिड़ियों का चुग्गा और डाल देंगे अपनी भिखारी जनता के सामने. और फिर आपको पूरा मौका देंगे निकल जाने का. यही हिस्सा है उस करार का जो भारत सरकार अमेरिका के साथ कर रही है.

युनियन कार्बाइड के 470 मिलिअन तो उसने खुद भी नहीं चुकाये, यह तो उसके इंश्योरेंस की रकम ही थी. इस बार भी अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो मिल जायेगी आपको 460 मिलियन डालरों की भीख क्योंकि यही सबसे बड़ी वह कीमत है जो अमेरिकी कंपनियां चुकाने को बाध्य होंगी अगर कोई दुर्घटना घटी! और यह कीमत तय की है आपकी सरकार ने. अभी-अभी आपकी सरकार ने आपके देश वालों की जान की कीमत 10 मिलियन डालर घटा दी.

आपको कैसा लग रहा है मुद्रास्फीती के इस गिराव पर?

अमेरिकी जानें इस से कई गुना महंगी हैं वहां पर अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो कंपनियां देंगी 10 बिलियन डालर तक. मतलब हर अमेरिकी आपके जैसे 20 के बराबर है. अब तो आपको अपने देशवालों की औकात का सही अंदाज़ा भी हो गया होगा.

वही अमेरिका जो अपने देश की कंपनियो के लिये इतना सस्ता सौदा तलाश रहा है अपने देश में होने वाले तेल के रिसाव पर एक ब्रिटिश तेल कंपनी (BP) पर 10 बिलियन डालरों का जुरमाना ठोकने की तैयारी कर रहा है जिससे वह कंपनी तबाह और बरबाद हो जायेगी.

भारत, क्यों न यह सौदा ऐसे देशों से हों जो दूसरों की जान की कीमत भी समझें? रूस बढ़ा हुआ मुआवज़ा देने को तैयार है. और जर्मनी में तो मुआवज़े की कोई सीमा ही नहीं निर्धारित की जा सकती. तो क्यों इस देश के US रिटर्न प्रधानमंत्री बेताब हैं अपने देशवासियों की जानों का इतना सस्ता सौदा करने के लिये?

Friday, April 23, 2010

शरद पवार की बेटी ने माना कि उसने झूठ बोला था

शरद पवार की पार्टी पावर में हो और घपला न हो ऐसा कहीं होता है? एनसीपी को देखकर तो अपने पाक दामन पर लालू प्रसाद जैसे भी गर्व कर सकते हैं. चाहे तेलघी  हो, या शक्कर या आईपीएल के शेयर ये लोग खाने में हमेशा अव्वल रहते हैं.

झूठ बोलने में नेता तो जगजाहिर ही हैं लेकिन उनकी औलादें (जो नेता नहीं हैं) वो भी इस सफाई से झूठ बोल लेती हैं यह नही पता था. अब पता चल गया है कि बचपन से ही ट्रेनिंग मिले तो बेईमानी करने के लिये नेता होना जरूरी नहीं है.

बात हो रही है सुप्रिया सुले की (जिनके नाम के साथ अब पवार तो जुड़ा भी नहीं है… फिर भी..?) जो शरद पवार की पुत्री हैं और झूठ बोलने में नंबर वन हैं. लेकिन अब शक्कर पवार… अर्र्र.. शरद पवार के साथ नहीं रहती तो झूठ पर कायम रहने की ट्रेनिंग कमजोर हो गई है.

पहले सुप्रिया सुले कहती रहीं की मेरे पति कि IPL से संबंधित किसी कंपनी में (इन्डीयन पैसाखोरों की लीग) में हिस्सेदारी नहीं है, लेकिन जब छापे पर छापे पड़ने चालू हुये और ढोल की पोल बजने लगी तो अब इन्होंने मान लिया कि हां भई हिस्सेदारी है!

त भैया 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है इनके पति कि MSM (Multi-Screen Media) नाम की कंपनी में जिसके पास इस पैसाखोर लोगों की लीग के प्रसारण अधिकार हैं.

बीसीसीआई का चेयरमैन बनकर शरद पवार ने भी क्या गुल खिलाये हैं?

इन पैसाखोरों का पेट तो भरने का नहीं, लेकिन क्या इनके पाप का घड़ा कभी भरेगा?

[सुनने में आया है कि ICC अपना चेयरमैन पवार को बनाने वाली है. सही है, शायद उन्हें घपलेबाजों की कमी पड़ रही होगी.]

अबे कुछ तो शर्म करो नेताओं.

Wednesday, March 10, 2010

अबु आजमी ने कितने आतंकवादियों को बचाया? शहजाद, जुनैद… या कुछ और भी हैं?

अभी-अभी टीवी पर खुलासा हो रहा है कि मुम्बई के सपा नेता अबु आजमी बाटला हाउस के आतंकी शहजाद और जुनैद से मिला और उन्हें पैसा दिया कि वो छुप के रहें. चौरसिया और अजमानी मिलकर अबु आजमी से फोन पर बात कर रहे हैं, और कम से कम पहली बार चौरसिया के मुंह से कठिन सवाल सुनने को मिल रहे हैं

1. अबु आजमी दाउद की महफिल में शामिल रह चुका है.
2. अबु आजमी 1993 के विस्फोट के मामले में गिरफ्तार होकर जेल में रह चुका है.
3. अबु आजमी बार-बार आतंकवादी मामलों में संदिग्ध रहा है.
4. अबु आजमी ने खुद स्वीकार किया की शहजाद के बाप से उसके संबंध रहे और शहजाद का बाप उसके यहां आता जाता रहता है.

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बाटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के कातिलों में शामिल शहजाद को पैसे दिये और छुपने में मदद की... ठीक है.

लेकिन अभी-अभी मुझे याद आ रहा है कि मुंबई में ताज पर हमले में अबु आजमी गोलियों और हमलों के बीच में घुस कर कार लेकर आता है, और दो-तीन लोगों को बचाकर ले जाता है. बाद में बयान देता है कि वो सऊदी अरब के कुछ सम्माननीय लोग थे.

शहजाद का तो पता चला.. लेकिन अबु आजमी, कौन थे वो लोग जिन्हें तूने ताज होटल से निकाला था.

चौरसिया ने अभी अभी अबु आजमी से कहा
"आप इतने भोले भी नहीं है अबु आजमी की दाउद के घर में शादी में शामिल हों और आपका पता नहीं हो किसके घर में हैं"

अबु आजमी कह रहा है कि मैं भोला हूं... बिल्कुल भोला हूं.

"मैं मुसलमान हूं, मैं भगवान की नहीं अल्ला की कसम खा कर कहता हूं कि मैंने शहजाद को पैसे नहीं दिये और मैं उससे मिला भी नहीं हूं."

चौरसिया, क्या इस सवाल का जवाब निकलवा सकते हो कि इसने ताज होटल में किसको बचाया था.. कहीं कुछ और आतंकवादियों को तो नहीं निकाल ले गया? पुरानी फुटेज होगी न तुम्हारे पास?

लंदन भाग गया है अबु आजमी 5 तारीख को. ठीक उसी दिन जिस दिन दिल्ली पुलिस ने उससे पूछताछ की.

मनसे वालों तुमने हिंदी के नाम पर इसको झापड़ लगाया, क्या इस बात के लिये खुदा कसम इसको एक जबर्दस्त नहीं लगाना चाहिये?

और इधर कांग्रेस का एक पूर्व विधायक कांग्रेस की सरकार में हुये दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर जिसमें एक बहादुर पुलिस इंस्पेक्टर शहीद हुआ के बारे में कह रहा है कि ‘सारी दुनिया जानती है कि बाटला एनकाउंटर झूठ था’…

इस अब्दुस सलाम को लाफा कौन लगायेगा?

Saturday, February 6, 2010

'बेगुनाहों' ने मार दिया बाटला अभियुक्त को गिरफ्तार कराने वाले मास्टर को

दिल्ली के बाटला कांड के 'बेगुनाह' अब भी जेल में सड़ रहे हैं और उनके सुराग देने पर दिल्ली पुलिस की एटीएस आजमगढ़ जाकर शहजाद को पकड़ लाई. वही शहजाद जिसने कबूल किया कि उसने भी वीर शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा (जिसके परिवार की सुरक्षा दिल्ली सरकार ने वापस ले ली अभी-अभी) पर गोली चलाई थी.

शहजाद को पकड़ने में एटीएस की मदद एक स्थानीय स्कूल के प्रबंधक ने की थी. उसने एटीएस के लोगों को रुकने का स्थान मुहैया कराया और एटीएस को शहजाद के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिये. इनका नाम श्री दिनेश यादव था, जिन्हें अब मार दिया गया है. इस कांड में स्कूल का एक आदमी और भी मारे गये. 

सबसे पहले तो नमन उस शहीद दिनेश यादव को जिसने भेड़ियों के शहर में रहते हुये भी देश का साथ न छोड़ा, और फिर धिक्कार उस दिगविजय सिंह को जिसने अभी-अभी आजमगढ़ की यात्रा कर बाटला कार्यवाही पर सवाल उठाने वालों को यह भरोसा दिलाया कि वह जांच मे 'पूरा सच' निकलवायेंगे.

क्या है पूरा सच दिग्विजय सिंह?

  • क्या मोहनचंद्र कि हत्या आतंकियों ने नहीं की?

हमें भी बताओ तुम्हें किस चीज़ पर शक है.

दिग्विजय सिंह क्या तुम एक बार और जाओगे आजमगढ़ उस शहीद की अंतिम यात्रा में जिसने देशद्रोही आतंकियों के खिलाफ मुहिम में अपनी जान कुर्बान की? या फिर तुम सत्ता के भूखे भेड़िये की तरह सिर्फ वोट खसोटने के लिये ही यात्रायें करते हो?

अब भी जिन्हें बाटला कांड की सत्यता और श्री मोहन चंद्र शर्मा की शहीदी पर शक हो उन्हें शर्म से डूब मरना चाहिये. लेकिन अगर यह शर्म का मामला होता तो डूब भी मरते, यह तो साफ-साफ देशद्रोहियों की साजिश है.

बिहार में चुनाव होते हैं तो मुम्बई में हाहाकर मचता है, और मुंबई में चुनाव होने होते हैं तो बिहार में रेल स्टेशन जल जाता है. सत्ता हथियाने के लिये जो न करना पड़े वो कम है़.

जब देश जल रहा होगा तब सत्ताधारी उसके हाल पर रोयेंगे या नीरों की तरह चैन से बंसी बजायेंगे?

खबर: नईदुनिया के हवाले से.

Wednesday, May 20, 2009

अमर सिंह की कांग्रेस को धमकी

खबर के अंदर की खबर पढ़ना भी एक कला है. अब राजनीति से दो-चार होते कई साल बीत चुके हैं तो राजनेताओं की चालों का अंदाजा लगाना भी अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है. amarsinghnishanchiबात है अमर सिंह की. ये पुराने चालबाज हैं. इनके पत्ते सधे होते हैं और अपने काम निकालने के लिये यह हर प्रपंच कर लेते हैं. इसी कला में निपुण होने के चलते यह मुलायम के लिये अपरिहार्य हो गये. भाई अब तो हालात यूं है कि आजम खान ने भी इनसे पंगा लिया तो उनकी चला-चली हो गई.

तो बात है अमर सिंह के कल के बयान की. विश्वास मत के इतने दिनों बाद, चुनाव के भी बाद अब अमर सिंह के अंदर का ईमान जाग गया और उन्होंने खुलासा कर ही डाला की सोमनाथ चटर्जी ने उनसे कांग्रेस समर्थन को कहा था.

क्यों? अब कैसे इन पुरानी बातों को याद कर लिया? क्या दुश्मनी हो गयी ताजी-ताजी सोमनाथ से? बुढऊ की मिट्टी क्यों खराब करने पर तुले हैं?

यह सोमनाथ से दुश्मनी नहीं है, सोमनाथ तो घुन है जो पिस गया क्योंकि अमर सिंह अपनी रोटियां सेंकने के लिये आटा बनाने में लगे हैं.

यह गूढ़ बात है. चेतावनी है अमर सिंह कि कांग्रेस को. अगर तुमने हमें लपेटा तो बर्रों के छत्ते को खोल डालूंगा. राजफाश कर दुंगा. पर्दानशीं रहस्यों को बेपर्दा कर दूंगा.

सोमनाथ को लपेट कर उन्होंने सैम्पल दिखाया है कि असल माल पोटली में बंद है, बोलो तो खोलूं.

अमर सिंह कांग्रेस के लिये नोट बांट रहे थे विश्वास मत के दौरान (आइबिएन ने छुपाते-छुपाते भी दिखा डाली). किसके कहने पर?

इतने राज दफन हैं अमर सिंह के सीने में कि जो खुल जायें तो ऐसी पिक्चर का मसाला तैयार हो जाये जिसे हिट कराने के लिये बड़े भैया अमिताभ की भी जरुरत न रहे.

और आप क्या सोच रहे थे? सोमनाथ को बेफालतू में निपटा दिया अमर सिंह ने? नहीं यह निशान्ची अब सारे गुर सीख चुका है, अब यह प्यादों पर वक्त बर्बाद नहीं करता, सीधे वज़ीर का शिकार करता है.

Wednesday, May 13, 2009

माओ कि मसखरियां

माओ इतने सालों तक चीन के सर्वोच्च पद पर रहे. इतने बड़े देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचे लोगों से अपेक्षा यह तो है ही कि उनमें ‘common sense’ नाम की uncommon चीज थोड़ी मिले, लेकिन विश्व के बाकी देशों से चीन अपवाद क्यों बने. अपने देश समेत हर देश में सनकी, गैर जिम्मेदार, और नाकाबिल लोग ही सर्वोच्च पदों पर ज्यादा पहुंचते हैं. खैर बात उनकी नहीं माओ की हो रही है. तो आज याद करते हैं माओ कि कुछ ऐसी मसखरियों को जिनकी कीमत चीन के लोगों ने गहरी चुकाई.maomaomao सचमुच माओ ने कुछ ऐसे अजीब फैसले लिये जिन्हें भीषण अदूरदर्शिता और सनक ही मान सकते हैं. देखिये तो जरा: -

1. चिड़ीमार माओ

माओ को सब लोग विश्व के पूंजीपतियों के दुश्मन के रूप में जानते हैं (यह वही ‘महान’ नेता हैं जिन्होंने स्तालिन को विश्वास दिलाया था कि वो पूंजीपति देशों के विनाश के लिये 30 करोड़ चीनीयों को कुर्बान करने से पीछे नहीं हटेंगे.) लेकिन कितने लोग यह जनते हैं कि प्यारे कम्युनिस्ट माओ चिड़ियों के भी कट्टर दुश्मन थे.

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भैया पांच चिड़िया मार दीं, अभी और कित्ती मार के माओ अंकल खुश होंगे?

1958 में उन्हें पता चला कि चीन के चावल चिडियां खा रहीं है इसलिये चीनी भूखें हैं. तो उन्होंने हुक्म पारित करा दिया – ‘मार चिड़िया’. चीन के किसानों, पदाधिकारियों को कहा गया कि चिड़िया उड़ाओ, चिड़िया के घोसले ढूंढ़-ढूंढ़ के तोड़ो, अंडे फोड़ दो, गुलेल से मार दो. तो लोग लग गये और चीन में लाखों चिड़ियाओं ने अपनी जानें गंवा दीं.

तो क्या चीन के चावल चिड़ियों से बच गये? लोग भूखे नहीं रहे?

नहीं भाई, बाद में बात खुली कि जितने चावल चीन की चिडि़या खातीं थीं उससे ज्यादा तो वे उन कीड़ों को खाती थी जो फसल बर्बाद करते थे. चिडि़यां मरीं तो कीड़ों की ऐश हो गयी. चिड़िया रहित चीन में टिड्डियों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हुई और इस हद तक बढ़ोतरी हुई कि फसलें टिड्डियों के पेट में गईं और चीन में अकाल पड़ा.

चीन के चावल टिड्डियां खा गईं.

2. गरीबमार माओ

माओ के धत्करम चिड़ियां मार कर ही रुक जाते तो क्या गनीमत होती, इन्होंने तो अपने देश के बाशिंदों को भी नहीं बख्शा. माओ को नारे गढ़ने का शौक था, चीनी भाषा में खूब आऊं-माऊं नारे गढ़े उन्होंने, उसमें से एक था ‘The great leap forward’ मैं इसका अनुवाद करूंगे ‘जेsss लंबी छलांग’.

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हमाला प्याला चेअलमैन माओ अंकल हमें छलांग लगवा लहे हैं

तो पहले माओ ने चीन को चलाया, फिर कुदवाया और तब भी दिल नहीं भरा तो ‘जेsss लंबी छलांग’ लगवायी.

इस जेsss लंबी छलांग में माओ ने चीन की कहानी कुछ यूं कर दी

1) स्वाधीन खेती के पर कतर दिये और किसानों को मजबूर किया कि वो झुंड के झुंड में पब्लिक खेती पर काम करे. इसके लिये उन्हें मजबूर किया गया कैद करके.

2) किसानों से सस्ते दरों में अनाज खरीद कर महंगे में बेचा, किसानों को सिर्फ सरकार को ही अनाज बेचने की इजाजत थी

3) घर-घर में गांव वालों को मजबूर किया गया कि वो लोहा बनाने के लिये भट्टी लगवायें और उन्हें लोहा बनाने का टार्गेट दिया गया. इस काम में लोग सब तरफ लकड़ी काटते डोलते रहे और टार्गेट पूरा करने के लिये लाखों ने अपने घर के बर्तन-भांडे गला डाले. नहीं करते तो माओ क्या करते वो हम बताना पड़ेगा आपको?

तो किसान को किसानी नहीं करनी दी, दे दनादन बेगार कराई (जिससे बचाने के लिये सत्ता में आये थे अपने कम्युनिस्ट शोषक). इसका असर यह हुआ कि खेत में अनाज पड़ा का पड़ा रह गया. लोगों को पार्टी के गुंडो ने परेशान किया (जैसा आजकल बंगाल में कर रहे हैं सीख कर) और गिनिये 1, 2, 3, नहीं पूरे 4.3 करोड़ लोग उस अकाल में मर गये जो इस सब नौटंकी के कारण पड़ा. कहते हैं उस बार चीन की 55 प्रतिशत भूमी अकाल ने चपेट डाली.

माओ की चंपू सरकार ने कितने ही लोगों को इस सब अत्याचार के बारे में खबर लीक करने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया.

भाइ अगर हिन्दुस्तान में ऐसा होता तो इतना तो है कि सरकार गिर जाती, लेकिन अपने कम्युनिस्ट एक बार काबिज होते हैं तो हटते हैं कहीं? उन्हें तो उखाड़ना पड़ता है.

3) यारमार माओ

इत्ता सब माओ ने करवा डाला तो कहीं से विरोध तो होना था? कुछ लोगों में तो होती है इतनी दम कि मृत्यु की कीमत पर भी गलत बात का विरोध किया जाये, तो ऐसे लोग उभरने लगे जो माओ की गलतियों के बारे में खुलकर बात करने लगे. आखिरकार जब माओ ने देख लिया कि सबको वो नहीं मार सकता तो माओ सत्ता के केंद्र से उतर गया और नाम का सत्ता अध्यक्ष हो गया, लेकिन माओ को क्या यह स्वीकार्य होता कि डेंग ज़ियाओपिंग और लिउ शाउकि देश को चला पायें.

lalsenagoonsतोड़ो, मारो, पीटो, खसोटो, अपना इतिहास बच न जाये

तो जब यह लोग सत्ता के केंद्र में आये तो माओ ने अपने इन पुराने दोस्तों की जड़ें खोखली करने का प्लान बनाय. उसने एक ‘सांस्कृतिक क्रांति’ करवाने के नाम पर नौजवान पीढ़ी को उकसाया, उन्हें गुटबंदित किया और एक नयी शक्ति बनाई जिसे नाम दिया गया ‘लाल रक्षक’ (The Red Guard).

तो क्या रक्षा की होगी इस ‘लाल सेना’ ने? इन लोगों ने क्रांति के नाम पर चीन के इतिहास को मिटा डालने में कसर नहीं छोड़ी. इन्होंने मूर्तियां तोड़ दीं, पुरातन इमारते ध्वस्त कर दीं, पुरानी बहुमूल्य किताबें जला दीं, यहां तक की परिवारों तक के लिखित इतिहास को मिटा दिया. ये था माओ का सांस्कृतिक कार्यक्रम.

ये इस हद तक हुआ कि जब यह लाल रक्षक चीन के ऐतिहासिक नगर ‘फोर्बिडन सिटी’ की तरफ बढ़ने लगे तो इस धरोहर के भी नष्ट हो जाने के डर से डेन्ग ज़ियाओपिंग ने शहर के दरवाजे बन्द करवा कर सेना तैनात करवा दी.

इस सेना ने के लोगों ने जासूसी कर के बहुत सारे लोगों को ‘क्रांति विरोधी’ करार देकर मौत के घाट उतरवाया. चाहे सरकार के उच्च अधिकारी हो, या निचले स्तर के, हर कोई डर में जीता था कि कब किसी भी बात पर उसे क्रांति विरोधी का नाम देकर टपका देंगे.

आखिरकार ये लाल सेना खुद ही गुटों में बंट गई और चीन की आधिकारिक सेना के हथियार आदी छीन कर जब उन्होंने आपस में लड़ना शुरु किया तो सरकार हरकत में आई और इस नालायकी का अंत किया.

तो माओ कि कुछ ऐसी दास्तानें आपने सुन ली जो ‘ईमानदार’ (या ईनामदार) कम्युनिस्ट लेखक आपको नहीं बताते. कम्युनिस्ट कारनामें और भी हैं, क्या-क्या कहें, क्या-क्या सुनायें.

Saturday, April 18, 2009

व्हाट अ कान्फीडेन्ट मैन!

ये सारे वो ‘कान्फीडेन्ट मैन’ हैं. इनका कान्फीडेन्स का राज इनका खुद पर नहीं अपने गुर्गों पर भरोसा है.

akshay pratap singh 
अक्षय प्रताप सिंह

anna shukla
अन्ना शुक्ला

Baleshwar Yadav
बालेश्वर यादव

Brij Bhushan Sharan Singh
बृज भूषण शरण सिंह

Munna Shukla 24 criminal charges
मुन्ना शुक्ला

owaisi
सलाउद्दीन ओवैसी

     afzalansari
अफज़ल अंसारी

dpyadav
डी पी यादव

guddu pandit   
गुड्डू पंडित

Pappu Yadav
पप्पु यादव

taslimuddin
तस्लीमुद्दीन

prabhunath singh
प्रभुनाथ सिंह

dadan
ददन पहलवान

shahabuddin    
शहाबुद्दीन

conf1
मुख्तार अंसारी

surajbhansingh
सुरजभान सिंह

ये सब आपका वोट चाहते हैं, ज्यादातर अपने लिये, और जिन्हें कानून के चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया है वो अपने रिश्तेदारों के  लिये.

  इन सबके चेहरे को देखिये

इनके चेहरे पर तारीख गवाही दे रही है. क्या आप उसे पढ़ सकते हैं?

Wednesday, April 15, 2009

पंजे से हाथ मिला कर उन्होंने कमल का फूल सूंघा, और साइकल से होकर हाथी पर चढ़ गये

उत्तर प्रदेश की राजनीति बेमिसाल है. इसलिये नहीं कि यहां के नेता या जनता कोई बहुत अच्छा काम कर रही है, बल्कि इसलिये कि घटिया नेतृत्व और जातिभक्त जनता इतनी बेदर्दी से प्रदेश को खसोट रही है कि इसकी मिसाल नहीं मिलेगी.

यहां वोट चलता है बनिया, ब्राहम्ण, दलित, लोध, ठाकुर, यादव, मुसलमान का, इनकी जाती का कोई जानवर भी अगर चुनाव में खड़ा हो जाता है तो आंख बंद कर बटन दबा देते हैं. इसलिये यहां इमानदार की कोई कीमत नहीं. कीमत है ऐसे भेड़िये की जो अपने चारों और गिरोह खड़ा कर सके. खुद एक जाती से हो और दूसरी जाती के एकाध का समर्थन हासिल कर लो तो चुनाव जीता ही जीता.

इसलिये इस प्रदेश में जातिवाले गुन्डों और माफिया कि बन आई है. मुख्तार अंसारी, अफजल जैसे माफिया... गुड्डू पन्डित जैसे बालात्कारी और डीपी यादव जैसे बदमाशों निर्बाध रूप से यहां चुनकर आते हैं. और ये लोग जब सभायें करते हैं तो भीड़ की भीड़ जुटती है.

इन्हें टिकट कौन देता है? वही पार्टियां जो गरीबों की आवाज उठाने का दम भरती हैं. समाजवादी पार्टी के राज में गुन्डो की तूती बोलती थी... क्या होता होगा इससे ही सोच लीजिये कि निठारी भी समाजवादी पार्टी के बड़े भैया को छोटी-मोटी घटना लगी थी.

गुन्डाराज से परेशान जनता को मायावती ने छलावा दिया - “चढ गुन्डन की छाती पर, मोहर लगाना हाथी पर.” बेवकूफ लोगों ने विश्वास कर लिया, और हाथी का बटन दबा दिया. मायावती ने शुरुआत में गुन्डों से मुकाबले की तत्परता का जो परिचय दिया अब वो बीते दिनों की बात है. सारे गुन्डे दल बदल कर अब मायावती के साथ हैं और वहां से बहन जी का भरपूर लाड़ पा रहें है. मुख्तार अंसारी पर बसपा के राजू पाल और भाजपा के कृष्णानंद राय के कत्ल का इलजाम है, मायावती ने एक वक्त पर उसे सबक सिखाने की कसम खाई थी, लेकिन आज उसे गरीबों का मसीहा कहती हैं.

असल में इस खेल में कोई भी पार्टी साफ दामन वाली नहीं रही. एक वक्त पर तो इस समय भारत के प्रधानमंत्री पद के सर्वश्रेष्ट उम्मीदवार आडवाणी भी डी पी यादव जैसे माफिया को पार्टी में लाने को तत्पर दिखे थे. शुक्र है कि लोगों के दबाव के चलते यह नहीं हुआ.

मतलब बात यह है कि सत्ता की चाभी उत्तर प्रदेश में अब नेताओं के हाथ से निकल कर गुन्डों के हाथ में जा पहुंची है. या तो इनके समर्थित उम्मीदवार चुन कर आते हैं, या फिर यह खुद ही चुनाव में खड़े होकर चुन लिये जाते हैं.

और इसके लिये जिम्मेदार और कुछ नहीं यहां कि वो घटिया जनता है जो जाति, या किसी भी और वास्ते पर (जिसमें देश कहीं नहीं आता) बार-बार इन्हें वोट दे रही है.

ऐसा नहीं हैं कि इमानदार उम्मीदवार नहीं हैं. हर चुनाव में निर्दलीय खड़े होते हैं. कई अच्छे लोग भी होते हैं. लेकिन जाति के सरमायों के द्वारा समर्थित नहीं होते.

भविष्य अंधेरा दिखता हैं क्योंकि गुन्डे पंजे से हाथ मिलाकर, कमल की खुशबू सूंघते हुए साइकल पर सवार होकर हाथी पर चढ़ चुके हैं.

इस समय एक नये आंदोलन की जरुरत है, एक नये भविष्य की.. किसी ऐसे संघटन की जो अपराधियों से नहीं जनता से वास्ता रखे.

और उत्तर प्रदेश की जनता के लिये एक संदेश है. अगर अब भी जाति के नाम पर वोट देना जारी रखोगे तो पहले नेताओं वाला एक-एक जूता खुद को लगाओ फिर वोट देने जाओ.

Monday, April 13, 2009

हिमाकत देखिये… गलत वक्त पर सही बात!

चुनाव का समय है, आजकल नेतादर्शन कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं. नेतागण टीवी पर भारी डिबेटें कर रही हैं और उसमें लचर-लचर दलीलें आंय-बांय बक रहे हैं, हम मुंह फाड़े झेल रहे हैं.

ऐसी ही एक दलील का पोस्टमार्टम करते हैं

दलील है – गलत वक्त पर सही बात

बानगी पेश है : आडवाणी ने देश का पैसा वापस मंगाने की बात अब ही क्यों उठाई… क्यों उठाई अब? बोलो? जवाब दो… अब ही क्यों?

chup karटेप लगा दो मुंह पर, फिर नहीं बोलेगा. 

क्यों भैया कोई खास मुहुर्त चल रहा है इस समय जिसमें देश कि भलाई की बात करना मना है? भाई मेरे तुम ये न पूछ रहे कि बाकियों ने अब भी क्यों नहीं उठाई, तुम ये पूछ रहा हो कि जिसने उठाई उसने भी क्यों उठाई?

घसियारा लाजिक है. बल्कि घास चरके लीद किया हुआ लाजिक है.

देश हित की बात है. देश का पैसा है. टैक्स दिये बिना, घूस-वूस में कमा के देश के बाहर भेज दिया. कोई लाख-दो लाख नहीं 25 हजार करोड़ है. अगर कोई आदमी चुनाव के समय ही सही, अगर यह कहे की भैया देशचोरों से पैसा वापस लाना है तो इन्हें ऐतराज है?

खबर तो पिछले साल से है कि जर्मन सरकार नाम बतलाने के लिये तैयार थी. यहां तक की नवंबर में मैंने भी इसका जिक्र किया था (http://wohchupnahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html, नीचे जा के पहला पाइंट देखिये) अपने पत्रकार भाई लोग तो बिना बात की बकवास करके नोट जुटाने में चिपे थे… तो भैया तब तो न उन्होंने, न तुमने इस बात का जिक्र किया. तकिये के नीचे दबाकर बैठे थे. अब अगर बात उठी है तो इसे उड़ाने की बजाय बिठाकर गौरवान्वित कर रहे हो़? नेता लोग तो पहले ही अजब-गजब थे, और अब अपने देश के पत्रकार गजब-अजब हो रहे हैं.

इधर कोई चिल्ल मचा रहा है ‘ऐं क्यों बोला अब..’ उधर कोई बिलबिला रहा है ‘ओये.. अब क्यों बोला..’

सच्ची-सच्ची बोलूं?

बात यह नहीं है कि अब ही क्यों बोला.. बात यह है कि भैया -- क्यों बोला!… बोला ही क्यों! --  क्यों ही बोला!…

अब नहीं भी बोलता तो जब भी बोलता तब भी ‘अब बोला?’ कर देते अपने गुणीजन.

अबे थोड़ी तो शर्म करो… क्या इसी दिन के लिये देश का नमक खा कर बड़े हुये हो?

Sunday, April 12, 2009

समाजवादियों का मेनिफेस्टो… हंसी के गुलगुले

लोग सपा के मेनिफेस्टो पर हंस रहे हैं बहुतों का कहना है कि ऐसी बेवकूफी पहले नहीं देखी. इन्टरनेट पर जिस भी जगह मेनिफेस्टो के बारे में पढ़ा तो उस टिप्पणी करने वालों ने गुस्सा नहीं हंसी का इजहार किया. सचमुच अमिताभ के छोटे भाई, अनिल अंबानी के दोस्त ने जो गुल खिलाया है उससे गुलगुली होती है.

लेकिन भाई जरा टेक्स्ट का सबटेक्स्ट पढ़ना सीखो. इस मेनिफेस्टो की अपील कहीं और ही है. जरा इसके प्रस्तावों पर गौर करते हैं. होली की भांग का नशा, चढ़ा हुआ है अब तक. बेचारे


होरी की भांग अब तक
ना उतरी भैया
  1. अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा बंद करेंगे. (यह देशभाषा प्यार है?)
    तालिबान ने भी अफगानिस्तान में अंग्रेजी शिक्षा बंद करा दी थी हम करा देंगे तो अपन को कुछ खास वोट तो मिलेंगे.

  2. सारे आफिसों में से अंग्रेजी गायब करा देंगे.
    क्या चलायेंगे जनाब? उर्दू या हिंदी यह भी बता देते.

  3. सारे कम्पयुटरों को आफिसों और शिक्षा स्थलों से गायब कर देंगे
    वैसे भी ज्यादातर मदरसे कम्प्युटर क उपयोग नहीं करते (सिवाय उनके जहां समझदार लोग हैं).

  4. सारे कृषि उपकरण बंद करा देंगे. ट्रेक्टर की जगह बैल चलायेंगे
    बहुत अच्छे, इन बुलों से बुलशिट लेकर देश में बांटने में आसानी होगी

  5. शेयर बाजार बंद कर देंगे
    फिर अनिल अंबानी का क्या होगा? छोटा भाई नाराज हो जायेगा.

  6. बड़े-बड़े वेतन पाने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही करेंगे
    भाई देश में बस एक ही अमर अर्रे… अमीर आदमी चलेगा… और कौन अपने अमीर सिंह (भैया 7 मिलियन डालर की मिल्कियत वाला तो खुद को खुल्ले में कहते हैं अमीर सिंह जी)

  7. मालें बंद करा देंगे
    शुरुआत सहारा माल से कराओगे चाचा या बत्ती दे रहे हो?

  8. सारी प्राइवेट कम्पनी में कम से कम मजदूरों के स्तर का वेतनमान करा देंगे
    सही है इनकी सरकार बनी तो वैसे भी पूरे देश को यही वेतनमान नसीब होगा.

  9. सारी महंगी शिक्षा बंद करा देंगे
    वैसे भी देश में इंजीनियर, वैज्ञानिक, डाक्टर ज्यादा हो गये हैं.

  10. पाकिस्तान और बांग्लादेश से दोस्ती बढ़ायेंगे
    हमारे भविष्य के वोटर वहीं से तो आने हैं. है न अमीर सिंह जी?

  11. सांप्रादायिक ताकतों पर वार कर आतंक को जड़ से मिटा देंगे
    देश के सारे हिंदुओं को नष्ट कर दिया जाये तो किसके खिलाफ होगा आतंक?

  12. बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देंगे
    रोजगार देने से ज्यादा आसान है.

  13. वकीलों और व्यापारियों के लिये योजनायें बनायेंगे
    वकीलों कि तो जरुरत पड़ेगी अगर यह सब कर दिया भैया, और व्यापारी जब आप उनका भरता बना दोगे तो भत्ता देना होगा न.

  14. किसानों की समस्याओं पर ध्यान देंगे
    देना, ध्यान देना बहुत समस्यायें मिलेंगी जब उनके ट्रेक्टर छीन कर, उनके कृषी उपकरण हथिया कर आप उन्हें आदिम युग में धकेल दोगे.

Saturday, April 11, 2009

आइये, वापस कंधार चलें

आजकल गलती से कोई न्यूज़ चैनल खुल जाये तो कोई न कोई कांग्रेसी दिख जाता है एनडीए के पांच साला शासन को याद करते हुये. चाहे वो कपिल सिब्बल हो, दिग्विजय, राहुल, सोनिया, मनमोहन, या कोई और, सब एनडीए की यादों में खोये हुये हैं, ऐसा लगता है कि पिछले 5 सालों में भी शासन भाजपा का ही रहा है.

Debating एक कला है और उसमें कांग्रेस ने जो तरीका अपनाया है उसे कहते हैं ‘Tu Quoque’ (you too) इसका मतलब है कि हम तो चोर हैं सनम, तू भी चोर ही है. मतलब अगर सोनिया गांधी एनडीए के राज में हुये विस्फोटों का हवाला दें तो वो इस argument के जरिये कांग्रेस के शासन काल में हुये विस्फोटों को justify कर रही हैं.

kandahar

लेकिन एक बात याद रखिये, गलती चाहे कोई भी करे, कितनी भी बार की जाये, गलती तो गलती है. इसलिये कांग्रेस की यह दलील कि तुम भी चोर ही हो सिर्फ वाद-विवाद प्रतियोगिता में ही अंक दिला सकती है. मतलब कांग्रेस के शासन में हुये मुम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद, बंगलुरु, आसाम, में हुई घटनाओं के लिये यह सफाई काफी नहीं.

1. हर incompetence, हर असफलता, हर बेईमानी का जवाब यह नहीं कि उनके शासन काल में भी ऐसा हुआ था. अगर ऐसा था कांग्रेस, तो हम उन्हें ही क्यों न चुनें? आपको क्यों चुनें?

वैसे एनडिए के शासनकाल इतना सफल रहा कि जब उसका अंत आया तो india shining था, और आज जब कांग्रेस के यूपीए के शासनकाल का अंत हो रहा है तो india whining हो रहा है. इसकी जिम्मेदारी भाजपा नहीं कांग्रेस के सर ही है.

और अब बात करें मुख्य मुद्दे की, बात करें कंधार की. कांग्रेस ने कंधार के नाम पर एक ऐसा दाग लगाया है भाजपा पर जिसका जवाब मुश्किल ही देते बनता है. लेकिन मैं कहता हूं कि कंधार का सबक एनडीए को मिला जरूर, लेकिन उसके पीछे का कारण भाजपा की कमजोरी नहीं शासन की तुरत-फुरत कार्य करने की क्षमता की विफलता थी. यह एक ऐसी शासन प्रणाली की देन थी जिसे भाजपा को विरासत में दिया गया था, और जो घटनाक्रम उस समय बना, उसमें शायद दूसरा फैसला कर पाने की शक्ती भाजपा में ही नहीं, देश में भी नहीं थी.

में उस घटनाक्रम की तुलना करूंगा black September से, जिसके बाद इज़राइल की नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव आया. उस घटना में इज़राइल के 11 खिलाड़ी जर्मनी के ओलम्पिक खेलों में इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा अपहृत कर लिये (PLO द्वारा) और उनकी मांगे एक नहीं इज़राइल की जेलों में सड़ रहे सभी आतंकवादियों को छोड़ने की थी.

उस मामले पर बात चालू थी, और कहते हैं कि इज़राइल की सरकार कुछ लोगों को छोड़ने के लिये तैयार भी हो गई थी (सभी को नहीं), म्युनिख के हवाई अड्डे पर उन्हें हैलिकाप्टर भी दिया गया, लेकिन जर्मन सेना की जल्दबाजी से सारे खिलाड़ी मारे गये. उस समय इज़राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर को बहुत criticism का सामना करना पड़ा और उन्हें ऐसा कसाई भी कहा गया जिसने उन खिलाड़ियों को मरने छोड़ दिया. आज जरुर उन आतंकवादियों को न छोड़ने पर गर्व किया जाता है.

कंधार के घटनाक्रम में 11 नहीं, 110 नहीं 200 से ज्यादा लोग उन आतंकवादियों के कब्जे में थे. कौन भूल सकता है उन लोगों के बिलखते हुये परिजनों को जिन्हें हिन्दुस्तानी टीवी चैनल लागातार दिखा रहे थे. एक शो में मैंने एक फैशन डिज़ाइनर को रो-रोकर अपने दोस्त/भाई/कुछ और को छुड़वाने के लिये कहते सुना, शब्द कुछ ऐसे याद पड़ते हैं “कुछ भी करो, मान लो उनकी बातें.. बचा लो… बू हू… बचा लो”

सेना के एक शहीद की बेवा ने जब कहा कि आतंकवादियों को नहीं छोड़ना चाहिये तो उसे डपटकर चुप करा दिया गया. मतलब उस समय पूरा देश सहानूभूती से लबरेज था. देश की सरकार पर बहुत जबर्दस्त दबाव था उन लोगों को बचाने का, प्रेस की मुहिम भी यही थी.

उधर जहाज हमारे बुर्जुआ हो चुके सुरक्षा तंत्र के अव्यवस्था के चलते कंधार पहुंच चुका था. तालिबान के इस्लामिक आतंकवादियों के बीच, उनके हवाई अड्डे पर. वो न हमें कोई बात करने देने को तैयार थे, न कोई सैनिक आपरेशन चलाने देने के. असल में वो उन आतंकवादियों के ही साथी थे. कोई और देश होता, तो वो नहीं होता जो हुआ.

उस समय को याद कीजिये, उस समय में खुद अपनी अनुभूतियों को याद कीजिये, और याद कीजिये उस दर्द को सबने महसूस किया. उस समय की सबसे बड़ी priority आतंकवादी या आतंकवाद से मुकाबला नहीं उन 200 लोगों को बचाने की बन चुकी थी. और इसलिये कंधार हुआ.

क्या आप सोचते हैं कि भाजपा ने जो किया उस घटनाक्रम में कांग्रेस कुछ अलग कर पाती?

लेकिन अब बात करते हैं उसकी जो नहीं हुआ, जो भाजपा ने भी नहीं किया और कांग्रेस ने भी नहीं. बात करते हैं black September के बाद हुये उस घटनाक्रम की जिसने सारे इस्लामिक आतंकवादियों के दिल दहला दिये.

इज़रायल की सुरक्षा एजेंसी मौसाद ने 16 लोगों के बारे में पता लगाया जो काले सितंबर के जनक थे और उनमें से 11 को कार्यवाही में मारा.

  1. क्यों जीवित है अब तक हिन्दुस्तान के दुश्मन?
  2. रॉ जिसके नाम से सारा पाकिस्तान कांपता है क्यों दाउद इब्राहिम को देश में नहीं ला पाई, या विदेश में ही खत्म नहीं कर पाई.
  3. जिन्होंने कंधार आदी को अंजाम दिया, उन्हें हम क्यों सजा नहीं दे पाये.

मैं मानता हूं कि भाजपा और कांग्रेस की विफलता भी यही है… जो कंधार के बाद हुआ. कंधार विफलता नहीं विवशता थी.

क्या हम अपेक्षा करें की अगली चुनी हुई सरकार देश के दुश्मनों की दुश्मन बनकर दिखायेगी?

Saturday, March 21, 2009

क्योंकि प्रभू ईसा को मानने वाले हत्या कर ही नहीं सकते

यीशू ने अपना खून बहाकर सबको बचाया. उन सबको जो उनपर विश्वास करते हैं, जो कहते हैं कि हे मेरे आसमानी बाप तूने अपना बेटा भेजा कि वो हम पापियों को बचा सके. लेकिन यीशू के अनुयायी हमें बताते हैं कि बचाया सिर्फ उन्हीं पापीयों को है जिन्हें यीशू के बचाने पर यकीन है. बाकी पापी सड़ेंगे अनंत नर्क की आग में.

fire

सही है, दयावान यीशू ने हमें बचाया, और सिखाया कि हिंसा मत करो, दया करो, प्रेम करो, अपने दुश्मन से भी प्रेम करो.

तो यीशू के अनुयायियों ने यह सीख लिया. इसलिये उन्होंने कभी किसी की हत्या नहीं की (वैसे करते भी तो भी चलता क्योंकि प्रभु यीशू ने पहले ही सारे पाप माफ कर रखे हैं).

- न तो उन्होंने अफ्रीका में लाखों लोगों को गुलाम बनाने के लिये और कई लाखों का कत्ल किया,
- न उन्होंने मेक्सिको और पूरे साउथ अफ्रीका में फैले आज्टेक और माया प्रजाती के लोगों की हत्या सिर्फ इसलिये की क्योंकि उन्होंने ईसा पर विश्वास नहीं किया,
- उन्होंने लाखों मूल अमेरिकियों की भी हत्या नहीं की, और उनके मूल धर्म का समूल विनाश भी नहीं किया.
- उन्होंने मध्य एशिया के मुसलमानों के खिलाफ 'क्रूसेड' (धर्मयुद्ध/जेहाद) भी नहीं किया, और उसमें करोड़ों लोगों को मारा नहीं.
- आज भी कोई इसाई समुदाय धर्म के लिये कहीं कोई हत्या या हिंसा नहीं करता

इसलिए जब ओड़िसा की सरकार कहती है कि प्रभात पाणीग्रही की हत्या में इसाईयों का हाथ नहीं था तो दिल बिना किसी दिक्कत के स्वीकार कर लेता. इतने उज्ज्वल अतीत और उससे भी ज्यादा उज्ज्वल वर्तमान वाला यह धार्मिक समुदाय हत्या कर ही नहीं सकता.

इसलिये न तो लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या में इसाई हाथ था, और न इसी हफ्ते हुई संघ के प्रभात पाणीग्रही की हत्या में इनका हाथ होने की कोई संभावना है (इसलिये पुलिस से आशा भी मत करिये इस दिशा में जांच की, क्योंकि जब ऐसा हो ही नहीं सकता तो पुलिस वाले क्यों अपना समय वहां बरबाद करें). तो जांच हो रही है और कातिल भी इसाई धर्म से इतर कहीं न कहीं मिल जायेंगे.

लेकिन शायद हिन्दुओं को ईसा संदेश नहीं पहुंचा है. इसलिये यह बर्बर हिन्दू उतारू हैं इसाईयों की हत्या पर. इसाई कुछ नहीं करते, लेकिन फिर भी पगलाये हिन्दू उन्हें सता रहे हैं.

यकीनन इतनी बर्बरता असहनीय है और बीजद के नवीन पटनायक भी यह सह नहीं पाये. क्योंकि ये सारे बर्बर हिन्दू बीजेपी की पैदाइश हैं इसलिये बीजद ने बीजेपी से छुटकारा पाना बेहतर समझा. अब उन बेचारे इसाईयों को वह यह संदेश दे सकते हैं कि भाई तुम्हारे हिन्दुओं की हत्या न करने में हमारा पूरा सहयोग रहेगा.

वैसे यह भी बता दूं कि निरीह इसाई विरोध की यह अजब-गजब बीमारी ओड़िसा के हिन्दुओं को कैसे लगी. असल में हिन्दुओं में जो दो-चार इन्सान हैं वो कूद-कूद कर, बच-बचाकर, किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर इसाई बनना चाहते हैं, और हिन्दू उन्हें बनने नहीं दे रहे हैं.

घोर अधर्म है यह. न तो इसाई किसी तरह का प्रलोभन दे रहे हैं, न वो कुप्रचार का सहारा ले रहे हैं, न वो झूठे चमत्कार और नकली 'चंगाई' फैला रहे हैं, न वो पैसा बांट रहे हैं, न वो भोले आदिवासियों को बरगला रहे हैं, फिर भी पागल हिन्दू उनके खिलाफ चिल्ला रहे हैं.

वैसे ज्यादातर लोगों को शायद प्रभात पाणीग्रही की हत्या के बारे में पता भी न हो. प्रभात पाणीग्रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता थे जिन्हें दो दिन पहले 20 लोगों ने आ कर गोली मार दी वो लोग जो जो यकीनन इसाई नहीं थे.

अखबारों में बहुत पढ़ा होगा कि कंधमाल में इसाइयों को गांव में घुसने नहीं दे रहे, यह नहीं करने दे रहे, वह नहीं करने दे रहे. फीचर पर फीचर छपते हैं. लेकिन प्रभात पाणीग्रही की हत्या की बात किसी बड़े अखबार ने उस तरह नहीं उठाई जिस तरह वह एक निरीह इसाई के गांव बदर होने की बात करते हैं.

जाते-जाते कुछ लिंक दे चलूं, कि आप खबर तो जानें

और भी जाते-जाते एक खबर और – पोप ने कहा की अंगोला के लोग अपना धर्म छोड़ कर इसाई बनें

Saturday, February 28, 2009

तो अब शिवराज हर आवाज़ को दबा देंगे?

शिवराज सिंह ने कठिन समय में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव क्या जीत लिया उन्हें लगने लगा कि सारे मध्य प्रदेश का निर्बाध कब्जा उन्हें मिल गया, कि लो ठाकुर अपनी मिल्कियत चलाओ अपनी मर्जी से. और अगर इनकी जागीर में कोई ऐसी आवाज़ उभर आये हो जो इन्हें रास न आये, तो उसे अपने हथकंडो से दबाना भी ठीक उसी तरह इन्होंने सीख लिया है जिस तरह से फिल्मों में कोई दबंग जमींदार.

मैं बात कर रहा हूं शमीम मोदी की जो सालों से मध्य प्रदेश के सबसे निचले तबके - ग्रामीण, गरीब, आदिवासी लोगों के हित में आवाज उठा रहीं हैं. इनकी बातें और काम यहां के अमीर इन्डस्ट्री मालिकों के गले नहीं उतरा जो वन के संसाधनों का उपयोग वनवासियों के हित ताक पर रख के अपने हितों के लिये करना चाहते हैं. शिवराज सिंह चौहान पर गरीब लोग दबाव बना पाते हैं कि नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन इस इन्डस्ट्री लॉबी ने अपने मुख्यमंत्री को 48 घन्टे दिये थे शमीम से छुटकारा दिलाने के लिये और वहां कि पुलिस ने यह काम 24 घन्टों में ही कर दिखाया.

shamim
लाल घेरे में हैं शमीम मोदी, इन्होंने ही अपहरण वगैरा को अंजाम दिया है. देख कर ही डर गया ऐसी दबंग महिला को मैं. आप डरे...?

तो एक सालों पुराने झूठे अपहरण के केस को खोद निकाला गया और शमीम मोदी को गिरफ्तार कर लिया गया. मजे कि बात तो देखिये, जिस व्यक्ति का अपहरण का यह केस था, वह उसी समय अदालत में मौजूद था, और उसने जज से कहा कि ऐसी कोई भी बात नहीं. फिर भी शमीम को गिरफ्तार किया गया.

असल में बात सिर्फ इतनी सी है कि हर्दा जैसी छोटी जगह में इन मोटी आसामियों का राज नहीं चलेगा, तो किसका चलेगा? गरीब आदिवासियों को तो अपने हक का पता भी नहीं. जो लोग जंगलों का बेलाग दोहन कर रहे हैं वो नहीं चाहते कि कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति जंगल वासियों को उनका हक समझाये, या उनके लिये आवाज उठाये. इसलिये शमीम मोदी जैसे लोगो को तुरत-फुरत डराने और निकालने की इन्हें सख्त जरुरत महसूस हो रही है.

दरअसल शमीम मोदी के संगठन का नाम है श्रमिक आदिवासी संगठन और इसके काम के चलते जब आदिवासी श्रमिकों को पता लगने लगा कि उन्हें किस कदर दुहा जा रहा है तो उन्होंने अपने मालिकों से शिकायतें कीं. और जब ऐसा हुआ तो मालिक साहबों को बुरा लगा, उनका आरोप है कि 'अपने कर्मचारियों की बढ़ती शिकायतों से वो परेशान हैं' ('they feel harassed by the growing complaints raised by their employees') और समाधान क्या निकाला? शिकायतों का कारण दूर करने के बजाय शमीम को दूर कर दीजिये!

शमीम को 10 फरवरी को गिरफ्तार किया गया और इस समय यह होशन्गाबाद जेल में बंद हैं. और लगता है कि समाज के पुरजोर विरोध के बावजूद राजनीतिज्ञ-उद्योगों के मिलिभगत से यह अभी वहीं रहेंगी.

शमीम कोई नकसली महिला नहीं हैं. वो कोई डॉन-शॉन भी नहीं हैं. शायद उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि उनमें संवेदना है. इसका फल तो वो भुगत रहीं हैं. इस समाज में गुंडो और भ्रष्टों की बन आई है, और इन सबका ख्याल रख रहे हैं अपने मुख्यमंत्री.

जो पत्रकार हर बात-बेबात के मुद्दे को हवा में उछाल रहे हैं, क्या वो इस तरफ ध्यान देंगे?

और हां, अगर आपको लगता है कि जिस तरह म.प्र. में इंसानियत को सूली पर चढाया गया वह गलत है, तो जरा शिवराज जी के बॉस को बता देना. lkadavani.in पर आडवाणी जी का दर खुला है. क्या उन तक यह खबर आप पहुंचायेंगे?

और शिवराज भैया, लोकसभा चुनाव तो होने हैं. जनता के ऊपर मूंग दलेंगे तो वहां क्या मुंह दिखाइयेगा?


यहां भी पढ़े


शमीम मोदी की रिहाई के लिये पिटीशन पर हस्ताक्षर करे

Thursday, February 12, 2009

किसी भी घटिया हरकत का जवाब, वैसी ही घटिया हरकत से दिया जाये, तो अच्छा है. है न?

मुतालिक ने एक घटिया काम किया तो फिर इसका जायज जवाब तो वैसा ही घटिया काम करके दिया जा सकता है न? और कोई तरीका तो हमारे लोकतांत्रिक देश में है ही नहीं. तो चलिये मुतालिक को अंतर्वस्त्र ही भेज दें. यकीनन इससे मुतालिक को शर्म आयेगी और जिस तरह का घटिया काम उसने किया, वो आगे नहीं करेगा. है न?

indian womenDo they support the cause?
sari2
Do they?

ये भी सही समाधान है. चड्डियां भेज कर विश्व की कुछ और समस्याओं का भी लगे हाथों समाधान कर लें तो सही रहेगा. तो निशा सुजन से पूछना चाहिये कि तालिबान को किस पते पर चड्डियां भेजें (जो स्कूल जाने पर लड़कियों को पीट रहे हैं). पोप को किस पते पर चड्डियां भेजें (जो अभी भी ननों को थोथी शुचिता और विर्जिनिटी के नियमों में बांध के रख रहा है), और किस पते पर भेजें चड्डियां उन सबको जिनकी वजह से स्त्रियां त्रस्त हैं. या इन पर चड्डियों का असर नहीं होगा? सूजन, तुम्हारी indignation इतनी partial क्यों है.

मुतालिक और आगे का घटनाक्रम उस प्रकार है जैसे कि एक सुअर ने कूड़े का डब्बा फैलाकर गंद मचाया, और पीछे-पीछे चार सुअर और आये उसमें लोट लगाने.

न तो मुतालिक हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, और न निशा सूजन किसी भी प्रोग्रेसिव औरत का. मैंने अपनी बीवी से पूछा (जो अच्छी खासी प्रोग्रेसिव है, महानगर की पैदाइश भी है, और पढ़ी-लिखी भी) तो उसने यही कहा कि निशा सूजन की हरकत घटिया है और इस बहाने उसने उन बहुत सारी स्त्रियों को शर्मसार किया है, जिन्हें वो रिप्रेसेन्ट बिलकुल नहीं करती.

एक लेख में लिखा था कि अंतर्वस्त्र प्राइवेट स्पेस है, तो फिर मुतालिक ने जिस तरह अपनी घटिया-लोगों की सेना   का औरतों के खिलाफ जिस तरह इस्तेमाल किया उसी तरह निशा सूजन ने भी यकीनन अपना घटिया एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिये प्राइवेट स्पेस को पब्लिक स्पेस बना डाला.

और यह गांधीगिरी भी नहीं. गांधीगिरी सिखाती है फूल देना जो कि सिम्बल है नेचर, ब्यूटी, प्योरिटी, और इनोसेंस के. यह तो गंदगिरी है, गंदगिरी और इसका सिंबल भी कुछ और ही रिप्रेसेंट करता है.

यह सिबल क्या रिप्रेसेंट करता है इसे जानना कुछ मुश्किल नहीं. कुछ ही दिन अगर अमेरिकी चैनल और फिल्में अगर देख ली जायें तो चड्डियों के reference और significance आपको समझ आयेगी.

असल में यह भी एक कारनामा है हमारे पोस्ट-मोर्डन और स्यूडो मोर्डन समाज के उस हिस्से का जिसने घटियापन  का ओवरडोज़ लेकर उसे आधुनिकता समझ लिया है. और इसलिये यह निंदा योग्य है.

और हां इसकी निंदा का तरीका कंडोम भेजना नहीं है, यह तो सब रिएक्शनरी कार्य होगा. इसका सही तरीका क्या है, थोड़ा सोचिए. और मुझे भी बताइये!

Sunday, November 30, 2008

विलासराव देशमुख देखने गये थे कि आतंकवादियों ने 200 लोगों को कैसे मारा... और साथ ले गये थे राम गोपाल वर्मा को

vilasrao_deshmukh
यही रोकेंगे आतंकियों का अगला हमला.
हमारे महान मुख्यमंत्री

विलासराव देशमुख महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री है, आतंक के जिन 59 घंटो को आपने और मैंने जिया. मौत और खून की जिन तस्वीरों को देखकर हमारी आंखें पानी नहीं खून से भर उठी थीं उस दर्द को विलासराव देशमुख के दिल ने भी महसूस किया था? अपने राष्ट्र और अपने महाराष्ट्र की यह दुर्गति देखकर उसका खून भी खौला था? 200 लोग मरे, 14 जवान मरे, और कितने ही लोग घायल हुये, मुम्बई वीटी का प्लेटफार्म खून से लाल हो गया, यह देखकर विलासराव का खून गरम हुआ होगा?

घटनाक्रम के खत्म होने के एक दिन बाद विलासराव को मृतकों कि याद आई, तो आया वो अपने जिम्मेदारी निभाने. देखने कि किस तरह अपने देश के दुश्मनों ने देशवासियों की हत्या की... और साथ लेकर आया अपने एडवाइज़रों की टीम? वो लोग जो यह देखते और विलासराव कि मदद करते यह सब रोकने में?

यह है विलासराव की संवेदना देश और मृतकों के प्रति

विलासराव देशमुख लेकर आया रामगोपाल वर्मा को
विलासराव देशमुख लेकर आया रितेश देशमुख को

तो अब सुनिये विलासराव की कृपा से रामू की अगली फिल्म के बारे में

रामगोपाल की छब्बीस-ग्यारह!

रितेश देशमुख - संदीप उन्नीकृष्णन के रोल में.

विलासराव देशमुख के पीछे सुरक्षा सलाहकार नहीं राम गोपाल चल रहा था.

विलासराव देशमुख को देश की नहीं, राम गोपाल की अगली फिल्म की चिंता थी

विलासराव देशमुख को देश को नहीं, रितेश देशमुख को आगे बढ़ाना है?

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क्यों रोये हम और आप वो तीन दिन. क्यों हम तड़पे देश के लिये. विलासराव देशमुख को तो यह चिंता थी कि रामगोपाल वर्मा की अगली फिल्म की गोटी फिट हो सके और रितेश देशमुख के लिये धंधा बना पायें.

यह है महाराष्ट्र के मुखिया.
यह है वो आदमी जिसे हमने चुन के भेजा था कि हमारा भला करो, हमारा ख्याल रखो.

अब मत करो इस देश की चिंता, क्योंकि उसका कोई फायदा नहीं. देश को हमने पहले ही कुत्तों के हवाले कर दिया.

Saturday, November 22, 2008

शिवराज पाटिल ने कहा, "पुलिस सवालों के जवाब न दे, और चुप रहे, तो समस्या कम हो जायेगी"

आज एक चैनल पर शिवराज पाटिल का बयान सुना, वो बात कर रहे थे हाल के पुलिसिया घटनाक्रम के बारे में. बयान तो अंग्रेजी में था, लेकिन सार यह है.

"अगर पुलिस कोई बात कोर्ट को बताये, और वह कोर्ट से मीडिया तक पहुंचे तो यह जायज है. लेकिन अगर पुलिस मीडिया से लगातार सीधे लीक कर रही है तो नहीं. वो बहुत सवाल पूछेंगे, लेकिन पुलिस सवालों के जवाब न दे, और चुप रहे तो समस्या कम हो जायेगी."

सही नब्ज पकड़ी है समस्या की शिवराज पाटिल ने. समस्या यह नहीं है कि आतंकवाद है. समस्या यह नहीं है कि अत्याचार है, समस्या यह नहीं है कि देश में विभेद हैं. समस्या है जानकारी. समस्या हैं सवाल. अगर लोगों तक जानकारी नहीं पहुंचे तो समस्या ही नहीं रहेगी. क्योंकि जो समस्या इतने ढंग से छुपी हो जिसके बारे में किसी को पता ही न चले तो वह इन राजनेताओं के लिये समस्या है ही नहीं. सोचिये अगर गुजरात में विस्फोट हो, और आपको दिल्ली में पता ही न चले, तो आप बेखबर मजे में समय बिताते रहेंगे. इस खबर की वजह से ही तो आपका दिन खराब होता है. इस खबर की वजह से ही तो आप सोचने पर मजबूर होते हैं.

तो पुलिस को सही बात कही है पाटिल ने. सवालों के जवाब मत दो. यह नहीं कहा कि अत्याचार मत करो. यह नहीं कहा की निर्दोषों को सताओ मत. यह नहीं कहा की मजबूरों की रपटें दर्ज करो. यह नहीं कहा कि जिन्हें मदद की जरुरत है उनकी मदद करो. यह नहीं कहा की अपराधिओं को बचाना बंद करो. कहा की सवालों का जवाब मत दो. जब-जब तुम्हारी जवाबदेही मांगी जाये, जब-जब तुमसे पूछा जाये की बताओ,ऐसा क्यों हुआ तो चुप साध के बैठ जाओ. आखिर जवाबों के अभाव में सवाल भी तो मर जाते हैं. सारे सवाल मर जायेंगे, और तुम बच जाओगे.

पाटिल चाहे कितना ही अकर्मण्य प्रशासनिक हो, राजनीतिज्ञ कुशल है. तभी तो पिछले पांच सालों में उनकी कुर्सी अडिग रही, देश की अखंडता चाहे कितनी ही डिगी हो.

तो जिनके मन में सवाल मंडरा रहे हों, उनके सभी से गुजारिश है कि मर जाने दो हर सवाल को बिना जवाब के और मूक बन के देखो इस नंगे विद्रुप को.

और कुछ सवाल जिनके जवाब नहीं दिये जाने चाहिये.

1. क्यों सरकार नहीं पूछती स्विस बैंको से हिन्दुस्तानी खातेदारे के ब्यौरे? (जिनके बारे में कहा है कि सरकार पूछे तो वे देंगे)
2. जिन बिल्डरों ने पिछले पांच साल में करोड़ों का फायदा बनाया (sez, और उठते भू-दामों के कारण) उन्हें मंदी के आते ही दनादन छूटें क्यों दी गईं, जबकी विदर्भ के मरते किसानों के लिये कुछ नहीं किया?
3. क्यों किसी भी विस्फोट की जांच निष्कर्ष निकालने में हमेशा निष्फल रहती है और अपराधी खुले घूमते हैं, और चैन से जिंदगी काट रहे हैं?
4. सरकारी तंत्र दिन-ब-दिन, और, और क्यों सड़ रहा है?
5. बड़े उद्योगों के पैरों पर लोट लगाने वाला वित्त मंत्रालय छोटे उद्योंगो पर लगातार प्रहार क्यों कर रहा है?
6. जिन सड़कों पर करोड़ों हर साल खर्च किया जाता है, वो बार-बार टूट जाती हैं?
7. सांसद अपनी निधी किस बिना पर खर्च करते हैं? और उसका हिसाब कौन जांचता है?
8. क्यों हर नेता लगातार अमीर, और अमीर होता जा रहा है? इनकी स्कोर्पियो, फोर्ड इन्डीवरों से सड़कें भर गयी है, और पार्टियों के झंडे हर गाड़ी पर लगे हैं. कहां से आ रहा है यह पैसा?

क्यों...
क्यों...

नहीं, इनके भी जवाब मत देना.

Tuesday, September 30, 2008

अरे! ये महान वाम-पथ के चैंपियन

कम्युनिस्टों की बातें सुनकर एक अजीब सी उत्तेजना होती है. हां, वो दुनिया भी क्या होगी जहां सब बराबर हों. न कोई अमीर हो, न गरीब, हर साधन पर हर व्यक्ति का समान हक हो. कितनी प्यारी होगी वह दुनिया? और किसकी जिम्मेदारी है ऐसी दुनिया बनाना? आइये उनसे मिलें:

Fidel Castro1

1. फिडेल कास्ट्रो
अमेरिकी छाती पर 1959 से मूंग दल रहे हैं यह. अमेरिकी जमीन से कुछ ही दूर इनका देश है क्यूबा, जहां हर बच्चे को पैदा होते ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से नफरत, और अपने नेता फिडेल कास्ट्रो से प्यार सिखाया जाता है.

आये तो थे जिन्दगी पर सभी को बराबर का हक दिलाने. लेकिन 1959 से कुर्सी पर ऐसे बैठे कि उठने का मन फिर नहीं बना. महंगे सिगार पीते हुये सोचते रहे कि किस तरह गरीबों को उनका हक दिलाया जाये. समाधान ढूढंते-ढुंढ़ते बुढ़ा गये तो सत्ता अपने छोटे भाई को दे दी. बिल्कुल लालू यादव की तरह आखिर और कौन होगा उनके जितना जिम्मेदार?

अब शायद कुछ साल इनके भाई रॉल ये कठिन जिम्मेदारी संभालें. जब थक जायेंगे तो यकीनन उनके बाल-बेटे होंगे जिसे यह कठिन जिम्मेदारी वो सौंप पायें.

Robert Mugabe

2. रॉबर्ट मुगाबे
वो महान नेता जिसने गोरों के खिलाफ जिम्बाब्वे में हल्ला बोलकर तहलका मचा दिया, गोरों को खदेड़ दिया तो खुशी के मारे जनता ने इन्हें राष्ट्रपति बना दिया. काम इनको पसंद आ गया. 1980 से शौक फर्मा रहे हैं. बीच में तीन-चार बार नाम के चुनाव भी करवा चुके हैं. अपने दुश्मनों पर बहुत मेहरबान रहे हैं, कहते हैं कि कइयों को उनके बनाने वालों से मिलवा चुके हैं.

अब ये भी बूढ़े हो गये, आखिर बहुत सालों तक जनता को साम्यवाद बांटा है, थक भी गये. पुराने दोस्त अब उतारू हैं कि साहब को आराम करायें, और आगे समानता का अलख खुद जगायें.

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3. ह्यूगो चावेज
बड़े मुखर वक्ता है. पूंजीवाद की हर बुराई का भरपूर ज्ञान है जिसे वक्त-बेवक्त बांटते रहते हैं. 1998 से वेनेजुयेला के राष्ट्रपति हैं. 1992 में सशस्त्र सत्ता-पलट में असफल रहे थे. पार्टी बनाकर चुनावी पलटी मार दी. साम्यवाद पर इतना भरोसा है कि मजदूर युनियनों के चुनाव भी राज्य के देख-रेख में कराते रहे हैं.

अभी जवान हैं, सिर्फ 10 साल हुये हैं सत्ता में. आगे इनमें बहुत संभावनायें हैं, कम-से-कम 30-35 साल और सत्ता में रहकर पूरी दुनिया के मजदूरों को एक करेंगे.

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4. माओ जेडोंग
वाम मार्गियों के लिये परम-पिता परमेश्वर से थोड़ा ही उपर रहे. इन्होंने चीन जैसे बड़े देश से पूंजीवाद का इस कदर नाश किया कि बाद में चीन अमेरिका के लिये most preferred investment destination बन गया. इन्होंने गांव के लोगों को गांव में, और शहर के लोगों को शहर में ही रखने का फरमान जारी किया. सभी की भलाई चाहते थे, इसलिये पूछने की जरुरत भी नहीं समझी कि कौन कहां रहना चाहता है.

बाद में इन्होंनें अपने देश को 'बड़ी ऊंची छलांग' (Great Leap Forward) लगवाई, जिसमें लोगों को अपनी खेती-बाड़ी छोड़कर सरकारी बेगार के लिये मजबूर करके पूंजीवादियों द्वारा मजबूर होने से बचा लिया. आज भी आधुनिक चीन तक में उनके सिखाये पाठ पढ़े चीनी नेता मजदूरों को खुद शोषित करके साम्राज्यवादियों द्वारा शोषित होने से बचाते हैं.

Thursday, September 25, 2008

'नरेन्दर मोदी को अगर सजा मिल गया होता, तो आज टरेरिस्ट बने हैं जो नौजवान... वो नहीं होता'

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सरकार किनकी धर-पकड़ कर रही है? काहे का पोटा, और काहे का सुरक्षा बल, इस पूरी समस्या का हल तो लालू प्रसाद यादव ने बता दिया है. सीधे नरेन्द्र मोदी को पकड़ कर फांसी पर चढ़ा दो, आतंकवाद की समस्या हल है जी!

शीर्षक के उद्गार लालू प्रसाद ने जी-टीवी को दी गई अपनी बाइट में कहे हैं. मौका था जस्टिस नानावटी के छ: साली जांच की शुरुआती रपट का. जिसमें बताया गया है कि उस घटना के लिये नरेन्द्र मोदी नहीं, गोधरा का ही एक मौलवी जिम्मेदार है. 140 लीटर पैट्रोल खरीदा गया था उन मर्दों, औरतों और बच्चों को जिंदा जलाने के लिये. क्या कूवत थी उस आग में. इतनी सही जगह लगी की पूरा गुजरात जल उठा.

बहरहाल बात करें लालू के 'नरेन्दर मोदी' की. क्या बात कही है बिहारी बाबू ने. नाहक मोहन चन्द्र शर्मा ने जान गवायीं आतंकवादियों को पकड़ने में. कह देते - नहीं भाई, आप तो नरेन्द्र मोदी को पकड़िये, सारे आतंकवादी खुद ही आत्म समर्पण कर देंगे.

लालू जैसे देशहित के चिंतक हैं हमारे देश में, जो मामले की तह तक जाते हैं. ये अदालतें, पुलिस, जांच एजेंसियां सब बेबात हैं. दुख है कि लालू रेल मंत्री हुये, गृह मंत्री न हुये. वरना अब तक करवा देते 'नरेन्दर मोदी' का एनकाउन्टर की लाओ, टंटा ही समेटें.

कृपा है लालू जी की इन 'नौजवानों' का इलाज उन्होंने बता दिया. अब आप सबसे पढ़ने वालों से विनती है कि जरा लालू जी से अपील करिये कि ये भी बता दें की कश्मीर में जो 'नौजवान' आतंकवाद में लगे हैं, उन्हें सही राह पर लाने के लिये किसको सजा 'मिलना' चाहिये. किसे चढ़ायें फांसी पर? अटल बिहारी को? आडवाणी को?

***

मन की कड़वाहट शब्दों से क्या बयां कर पाऊंगा. कौन से शब्द लाऊं, कहां से लाऊं जो उस घृणा, उस वितृष्णा, उस बेचारगी, उस कसक को बयां करें जो इस समय महसूस हो रही है.

***

पता नहीं नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में क्या किया. पता नहीं कितना दोषी है वह. बस यह पता है कि इस तरह आतंकवादियों के कृत्यों का औचित्य निकाल कर उन्हें शह देना दर्दनाक है.

Tuesday, September 23, 2008

सुनिये पुण्य प्रसून बाजपेयी से मुठभेड़ का आंखों देखा हाल

pp_bajpayee

"और उसने जिसे मोबाइल से फोन किया खून से लथपथ इंसपेक्टर शर्मा थे..जो सिग्नल का इंतजार कर रहे थे। जिन्होंने दरवाजा खुलते ही गोलियां दागी । और उन लडकों ने भी गोलिया दागीं ।" (लेख यहां है)

ये किसी बौराये हुये आतंकवाद समर्थक की कल्पना नहीं है, यह है एक बेहद जिम्मेदार कहे जाने वाले पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का चित्रण, उस घटना का जिसने दिल्ली को अंदर तक हिला दिया.

पुण्य प्रसून को दिल के किसी कोने में विश्वास है कि वो पुलिस वाला जो मारा गया दरवाजा खुलते ही गोलिया चला रहा था. लेकिन वो जिसने 35 आतंकवादियों को मारा, घुस गया गोलियां चलाते हुआ बिना बुलेटप्रूफ वेस्ट के (जिसका साथ शायद ही कोई एनकाउंटर के लिये जाने वाला आफिसर छोड़े), और कैसा कच्चा निशानेबाज निकला की हर वार चूका, और खुद ही गोलियों का शिकार हुआ.

उन भोले लड़कों की गोलियां का जो 'होनहार' विद्यार्थी थे, और जिनके साथियों के समर्थन में एक विश्वविद्यालय का वाइस-चांसलर खड़ा है.

पुण्य प्रसून को विश्वास है कि पुलिस का हर आदमी कमीना है, क्योंकि वो आने-जाने वाले लोगों को रोकते हैं. उनसे सवाल करते हैं.

उन्हें शौक है न सवाल करने का? घर में लेट के खटिया तोड़ने से बेहतर उन्हें बारिश-गर्मी-सर्दी-रात में राह किनारे खड़े होकर आने-जाने लोगों को परेशान करना लगता है. पुण्य प्रसून के लेख से साफ है कि वो चाहते हैं कि राहगीरों से सवाल न किये जायें. किसी को रोका न जाये.

क्यों इतने सारे पुलिस वाले खड़े हैं जामिया नगर में? सब घर जायें.  आराम करें. यकीनन वो पुलिस वाले भी यही चाहते होंगे.

उस घर का दरवाजा खटखटाते वक्त मोहन चन्द्र शर्मा शायद जानता होगा कि अन्दर से जो गोलियां बरसेगीं, वो लेमनचूस की नहीं होंगी, बंदूक की होंगी. फिर भी उसने खटखटाया वो दरवाजा, क्योंकि उसे शौक था गोलियां का सामना करने का. और उसे शौक था मरने के बाद अपनी फजीहत उन पत्रकारों से कराने का जिन्हें क्रिमिनल्स पास बिठाकर, कोला पिलाकर, फोटो खिंचाकर, इंटरव्यू देते हैं.

पुण्य प्रसून कश्मीर के शोपायां इलाके में हो आये, पूरी तरह सेना के प्रोटेक्शन में. और भी दस जगह हो आये होंगे. उन्हें क्या मुश्किल? आतंकवादी भी उन्हें कहवा पिलायेंगे, कि चलो अपना ये यार अपना नाम करेगा चैनल पर. मुश्किल है उस बाशिंदे की जो किसी बड़े चैनल से जुड़ा नहीं. जिसको रोजाना रिजक कमानी है उसी बाजार में जिस में बम फटा.

उसे तो अच्छे लगते होंगे वो पुलिस वाले जो खड़े हैं हर मुश्किल सह कर, कि आगे कोई बम न फूटे, आगे निर्दोष न मरें.

पुण्य प्रसून का क्या? उनका काम तो बम फटने के बाद शुरु होना है न?

Monday, September 22, 2008

जब सब कुछ साफ-साफ दिखे, तो अंधेरे में तीर चलाने की जिद क्यों?

terrorist

जब बात देश से जुड़े मुद्दों की आती है, तो कुछ लोग क्रियटेविटी (रचनाशीलता) की हर हद पार कर जाते हैं. अपने पूर्वाग्रह और छुपे एजेंडे को सही साबित करने के लिये वो किसी भी सच को झूठ बना सकते हैं.

सच बड़ा delicate होता है. एक खरोंच भी उसकी खूबसूरती नष्ट कर देती है. बहुत आसान है सच को नुक्सान पहुंचाना, बस थोड़े विश्वसनीय से सुनाई देने वाले बेवकूफी के प्रश्न उठा दिये जायें. साथ ही एकाध जुमला जोड़ दिया जाये मानवहित, या ऐसे ही किसी उंचे आदर्श का. बेशक आप उस आदर्श से कोसों दूर हों.

ऐसी कुत्सित बातें किसी की शहादत को भी धूमिल कर देती हैं.

जैसे मोहन चन्द्र शर्मा के साथ किया जा रहा है. जिन लोगों के गले आतंकवाद का सच नहीं उतर रहा, वो लगे हैं अपना कलुषित एजेंडा लागू करने. इसलिये मोहन चन्द्र शर्मा के लिये कहा जा रहा है कि उनकी हत्या आतंकवादियों ने नहीं, उन्हीं के साथियों ने की. इसलिये नहीं कि मोहन चन्द्र शर्मा को इन्साफ दिलाना है, बल्कि इसलिये की वो कैसे भी करके उन आतंकियों कि घिनौनेपन को भोलेपन की चादर से ढांप सकें.

इसलिये दरकिनार कर दिया जाता है उस गवाही को जिसके दम पर हत्यारे सैफ का स्केच बना. इन अंधो को वो असला, वो शूटिंग नहीं दिखी जो उस दिन वहां घटित हुई, उन्हें दिखे आतंकियों के मां-बाप जो कसमें ले रहे थे कि उनके बच्चे तो बछड़े थे, जो सिर्फ घास को ही नुक्सान पहुंचा सकते थे.

क्यों ये घृणित एजेंडे वाले घृ्णित लोग मानव व्यवहार के बारे में ऐसी नासमझी दिखाते हैं? कौन से ऐसे मां-बाप हैं जो कहेंगे कि हां, हमने भरा अपने बच्चों के दिल में धार्मिक पूर्वाग्रह, हमने बताया हर मोड़ पर उन्हें की दूसरे धर्म वालों से हम नफरत करते हैं, डरते हैं उनसे, और उनकी संस्कृति हेय लगती है हमें.

और अगर आपको लगता है कि मां-बाप ऐसा नहीं करते, तो आप मूढ़ होने का नाटक कर रहे हैं. क्योंकि कोई भी इतना मूढ़ नहीं हो सकता.

अगर इसी तरह हर शाहादत पर शक पैदा किया जाता रहा, आतंकवाद के खिलाफ हर कदम को धर्म से जोड़ा जाता रहा, और मजहब के नाम पर आतंकवादियों को शह देनें की कोशिश की जाती रही तो आतंकवाद इस समाज के ऐसे दो फाड़ करेगा जो आपस में कभी नहीं मिलेंगे, ठीक नदी के दो किनारों की तरह.

आप जो तीर अंधेरे में चला रहे हैं... आपको नहीं दिखता, लेकिन निशाने पर आप ही का सीना है.