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Tuesday, March 2, 2010

शिमोगा या यो कहें कि घुटन सिर्फ तस्लीमा के हिस्से में ही क्यों आती है?

तस्लीमा नसरीन ने बयान दिया कि कर्नाटक के अखबार में छपा लेख तो बहुत पुराना है, और छापा भी उनसे इजाज़त लिये बगैर है. तस्लीमा होकर जीना हिम्मत का काम है. तस्लीमा ने यह नहीं कहा कि लेख मैंने नहीं लिखा.

taslima Taslima, we apologize for those who didn’t understand.

वो अपनी बात कहना चाहती हैं. उनका लक्ष्य धर्म में पागल और अंधे हुये लोगों को इन्सानियत की कीमत समझाना है, इसलिये जब उनकी बात को ही बहाना बना जब बकवास, बेकार, घटिया और बेहद शर्मनाक बुर्के जैसी प्रथा की रक्षा के लिये जब इतने सारे पागल पैंट-शर्ट और अन्य आधुनिक पोशाकें पहन कर जान लेने-देने की तैयारी के साथ निकलते हैं तो तस्लीमा को महसूस हुये दर्द की व्याख्या मुश्किल है.

शिमोगा में मुस्लिम धर्मांधों के प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और बलवे में दो लोगो की हत्या कर दी गई. दंगे और हिंसक प्रदर्शन पूरे कर्नाटक में हुए. बुर्के के ऊपर उस लेख को छापने वाले अखबार के आफिस पर हमला किया गया जिसमें माल और व्यक्ति दोनों को ही क्षति पहुंचाई गई.

बुर्के के खिलाफ लिखने की कीमत दो लोगों की जान? और इसकी जिम्मेदारी. वो किसकी है?

मीडिया में उबाल है कि 'तस्लीमा के लिखे के कारण कर्नाटक में हिंसा भड़की'

तस्लीमा के लिखे लेख के कारण?

क्या इसकी ग्लानी तस्लीमा के हिस्से में है? यही नजर आता है हमारी पढ़े-लिखे लोगों से भरी समझदार मीडिया को? अगर हां तो क्यों न फैले धर्मांधता, क्यों न और भी बल मिले हत्यारों और आतंकियों और क्यों न अंधेरे, अवसाद और डर के और भी घने कोहरे में धंसते चले जायें हमारे चिंतक, विचारक और सुधारक.

कर्नाटक में भड़की हिंसा तस्लीमा के लिखे लेख के कारण नहीं भड़की,

  • वो भड़्की सदियों से चलती आ रही एक दमनशील रिवाज़ को थोपने वाले मानसिक रोगियों की असहिष्णुता से.
  • वो भड़की अपनी आजादी को भोगाने और दूसरों को उससे वंचित करने वाले विलासियों के कारण.
  • वो भड़की  दूसरों को जानवर की तरह कैद करने की मंशा रखने वालों की वजह से.

लेकिन मीडिया में क्या सुनते हैं हम? तस्लीमा नसरीन के लिखे लेख की वजह से हिंसा भड़की. क्योंकि तस्लीमा ने लिखा, और अखबार ने छापा.

कहीं भी मैंने नहीं देखा कि असहिष्णुता के कारण हिंसा भड़की.
कहीं भी मैंने नहीं देखा कि धर्मांधता के कारण हिंसा भड़की.
कहीं भी मैंने नहीं देखा की कुरीतियों के कारण हिंसा भड़की.

बुर्के का प्रतिवाद करो तो हिंसा भड़कती है कौन करता है हिंसा? बुरका पहने हुई महिलायें? या फिर बिना बुर्का पहने पुरुष जो महिलाओं को बुर्के में ही रखना चाहते हैं?

और क्या गलत लिखा तस्लीमा ने अगर उसने कहा कि यह मत करो. क्यों स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है उससे. क्यों नहीं स्पष्टीकरण मांगा जा रहा उन कठमुल्लों से जो कर्नाटक में बैठ कर लोगों को भड़का रहे हैं.

अगर सच बोलने पर हिंसा करने वालों की बजाय सच बोलने वालों पर सवाल उठाया जाता रहेगा तो कैसे जन्मेगा कोई दयानंद जिसने सति प्रथा पर सवाल उठाया, पर्दे पर सवाल उठाया, नारी अशिक्षा पर सवाल उठाया. और सवाल ही नहीं उठाया, समाधान किया.

सति प्रथा के खिलाफ अगर दयानंद और राममोहन रॉय की आवाज़ को भी इसी तरह भींचा जाता तो क्या हमारे देश की औरतें अब भी चिता पर होतीं? विधवायें आश्रमों में? और लड़कियां स्कूलों से बाहर?

क्या हमारा मीडिया इतना कायर है जो सच को जानते बूझते हुये भी सच नहीं कह सकता? या फिर इतना एक-पक्षीय? मैं समझ नहीं पा रहा हुं कि यह सब क्यों हो रहा है? किस तरह पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इतना अंधा हो गया.

बेहतर है अब कुछ दिन खबरें न देखूं.

Tuesday, October 27, 2009

बिकोज़ छत्रधर महतो इस ए गुड मैन

अपनी एक ट्रेन माओवादी आतंकवादियों के कब्जे में है. कई सौ यात्री हैं उस ट्रेन में उन सब की जिंदगी दांव पर है, और सौदा करने वाले हैं हमारे देश के नेता. माओवादी भी तैयार है सौदे के लिये, 1 के बदले 400. बोलो क्या कहती हो दिल्ली सरकार? छत्रधर महतो को छोड़ेंगे?

कंधार के नाम पर भाजपा सरकार को पानी पी-पीकर कोसने वाले यतींद्रनाथ के बदले एक सौदा पहले भी कर चुके हैं. माओवादी इमानदार साबित हुए. POW को छोड़ दिया. दोनों तरफ से अच्छी डील हुई, दोनों सौदागर इत्मीनान में है, पार्टी रिलायबल है, डील चलती रहे.

इसलिये माओवादियों की तरफ से ताजी आफर इतनी जल्दी आ गई, पहले 1 के बदले 10 थे, अब 500 के बदले सिर्फ एक – छत्रधर महतो. क्या अपनी सरकार को सौदा बुरा लगेगा?

{कंधार-कंधार-कंधार} बार-बार मुझे याद आता है कंधार. अब सरकार उन्हीं की है जिन्होंने कंधार का इतना गहन विश्लेषण किया. लेकिन फैसला दूसरा होगा इसकी अपेक्षा व्यर्थ है क्योंकि यतीन्द्रनाथ के मामले में एक उत्साहवर्धक precedent दिया जा चुका है.

मीडिया का गेम भी चालू हो चुका है. ट्रेन तक पुलिस/आर्मी पहुंचे न पहुंचे, कुछ चुनिंदा चैनलों के नुमाईंदे पहुंच गये. ऐसा लगता है जैसे तैयार बैठे थे.

कंधार में देश का हाथ मरोड़ा जा रहा था अजहर मसूद को छुड़ाने के लिये. वो तो एक आतंकवादी था. अब जो सामने है उसके गुट को कोई आतंकवादी नहीं कहता. देश का एक खास  कुबुद्धिजीवी वर्ग तो सिर्फ इनके दर्द में जीता, दर्द में मरता है. ये लोग गरीबों के मसीहा, सर्वहारा वर्ग को जिताने वाले, व दुखियों के हमदर्द हैं. तो भाई जब अजहर मसूद जैसे शैतान को छोड़ सकते हैं तो फिर छत्रधर महतो को क्यों नहीं, खासकर तब जब ‘ही इज़ ए गुड मैन’ जैसा कि एनडीटीवी में लगातार दिखाया जा रहा है.

थू ! थू sss

ताजा समाचार है कि छ्त्रधर के लोगों ने ट्रेन छोड़ दी. मतलब डील जमी नहीं, या यह सब एक जबर्दस्त पब्लिसिटी स्टंट था?

माओवादियों के पीछे आखिर बुद्धीजीवी दिमाग है न.

Monday, April 13, 2009

हिमाकत देखिये… गलत वक्त पर सही बात!

चुनाव का समय है, आजकल नेतादर्शन कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं. नेतागण टीवी पर भारी डिबेटें कर रही हैं और उसमें लचर-लचर दलीलें आंय-बांय बक रहे हैं, हम मुंह फाड़े झेल रहे हैं.

ऐसी ही एक दलील का पोस्टमार्टम करते हैं

दलील है – गलत वक्त पर सही बात

बानगी पेश है : आडवाणी ने देश का पैसा वापस मंगाने की बात अब ही क्यों उठाई… क्यों उठाई अब? बोलो? जवाब दो… अब ही क्यों?

chup karटेप लगा दो मुंह पर, फिर नहीं बोलेगा. 

क्यों भैया कोई खास मुहुर्त चल रहा है इस समय जिसमें देश कि भलाई की बात करना मना है? भाई मेरे तुम ये न पूछ रहे कि बाकियों ने अब भी क्यों नहीं उठाई, तुम ये पूछ रहा हो कि जिसने उठाई उसने भी क्यों उठाई?

घसियारा लाजिक है. बल्कि घास चरके लीद किया हुआ लाजिक है.

देश हित की बात है. देश का पैसा है. टैक्स दिये बिना, घूस-वूस में कमा के देश के बाहर भेज दिया. कोई लाख-दो लाख नहीं 25 हजार करोड़ है. अगर कोई आदमी चुनाव के समय ही सही, अगर यह कहे की भैया देशचोरों से पैसा वापस लाना है तो इन्हें ऐतराज है?

खबर तो पिछले साल से है कि जर्मन सरकार नाम बतलाने के लिये तैयार थी. यहां तक की नवंबर में मैंने भी इसका जिक्र किया था (http://wohchupnahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html, नीचे जा के पहला पाइंट देखिये) अपने पत्रकार भाई लोग तो बिना बात की बकवास करके नोट जुटाने में चिपे थे… तो भैया तब तो न उन्होंने, न तुमने इस बात का जिक्र किया. तकिये के नीचे दबाकर बैठे थे. अब अगर बात उठी है तो इसे उड़ाने की बजाय बिठाकर गौरवान्वित कर रहे हो़? नेता लोग तो पहले ही अजब-गजब थे, और अब अपने देश के पत्रकार गजब-अजब हो रहे हैं.

इधर कोई चिल्ल मचा रहा है ‘ऐं क्यों बोला अब..’ उधर कोई बिलबिला रहा है ‘ओये.. अब क्यों बोला..’

सच्ची-सच्ची बोलूं?

बात यह नहीं है कि अब ही क्यों बोला.. बात यह है कि भैया -- क्यों बोला!… बोला ही क्यों! --  क्यों ही बोला!…

अब नहीं भी बोलता तो जब भी बोलता तब भी ‘अब बोला?’ कर देते अपने गुणीजन.

अबे थोड़ी तो शर्म करो… क्या इसी दिन के लिये देश का नमक खा कर बड़े हुये हो?

Sunday, March 29, 2009

हम क्या कहते हैं, वो क्या सुनते हैं, वो जो सुनते हैं, हम कब कहते हैं

आडवाणी की प्रेस कांफ्रेंस का लाइव टेलेकॉस्ट देख के हटा हूं, अच्छा हुआ की लाइव देख ली वरना इन  पत्रकारों की ताजी बदतमीजी को समझ नहीं पाता. पता नहीं ये किस आटे का पिसा खाते हैं. क्या ये उसी समाज की उपज हैं जहां उन लोगों का जन्म हुआ जो अपने कर्तव्य और देश के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी दे गये.

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आज आडवाणी ने प्रेस कांफ्रेस बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे के लिये बुलवाई थी मुद्दा था देश का 25 लाख करोड़ रुपया जो कि काला धन बनकर स्विस बैंको में चला गया है.

कुछ समय पहले जर्मन गर्वनमेंट के हाथ उन लोगों की जानकारी लगी जिनका पैसा स्विस बैंकों में जमा है, उन्हें यह भी पता लगा कि किसका कितना पैसा है वहां. तो उन्होंने सारी दुनिया में ऐलान किया कि जो-जो देश हमसे पूछेगा, हम उन्हें बतायेंगे कि वहां पर किस आदमी का कितना-कितना धन इन बैंकों में है.

इस बात को कई महीने हो गये, एक दो अखबारों में खबरें भी छपी (लेकिन सत्ता के गुलाम पत्रकारों को देशहित नहीं दिखता, इसलिये यह खबरें उतनी तक नहीं दिखाई गयी जितना ये लोग बार गर्लों को दिखा देतें हैं). बिरादर, देश का 25 लाख करोड़ रुपया बाहर भेज दिया गया, और यह भी जानिये कि हम महान हिन्दुस्तानीयों को एक और रुतबा हासिल है, सारे देशों में पैसे जमा करने में हमारा नंबर 1 है, मतलब भारतियों का सबसे ज्यादा पैसा जमा है वहां. वाह रे देश की सरकारों, बहुत रुकवाया करप्शन तुमने पिछले 60 सालों में.

जिस समय यह खबर आई उस समय आडवाणी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर जर्मनी से उन हिन्दुस्तानियों के नाम पूछने का सुझाव दिया जिनका पैसा वहां जमा है, तो बिरादर अपने महाशक्तिशाली प्रधानमंत्री तो नहीं, लेकिन वित्त मंत्रालय की तरफ से टालू जवाब आ गया.

तो आडवाणी ने प्रेस कांफ्रेस बुलाई थी इसलिये कि वो कहें कि है बलशाली प्रधानमंत्री मनमोहन जी, आप जी-20 सम्मेलन में जा रहे हैं वहां मिलेंगे आप जर्मनी के चांसलर से भी, तो हे मनमोहन जी वहां इस बात को उठायियेगा, वहां कहियेगा कि बिरादर दे दो हमें उन लोगों की सूची जिन्होंने देश का पैसा बाहर जमा कर रखा है. और यह बात पब्लिक फोरम पर आडवाणी ने इसलिये कही कि पिछले पत्र की तरह यह भी दबा न दी जाये.

पूरी प्रेस कांफ्रेंस में आडवाणी ने बताया की किस तरह इस पैसे का इस्तेमाल देश की बेहतरी के लिये होना चाहिये, और उन्होंने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया, और यह भी कहा कि वो जरूर पूछेंगे जर्मनी से कि बताओ उन लोगों के नाम जिन्होंने देश को चूना लगा लगा कर पैसा स्विस बैंकों में भेज दिया.

एक पत्रकार ने उनसे कहा कि अगर उन लोगों के नाम पता चल गये जिनका इतना पैसा जमा है तो भूचाल आ जायेगा. तो आडवाणी ने उससे कहा कि मैं चाहता हुं कि ऐसा हो, उन लोगों के नाम खुलें जिससे देश का पैसा देश में वापस आ पाये.

उन्होंने इस प्रेस कांफ्रेंस में यह भी बताया कि बीजेपी की सरकार बनने पर वो देश में शिक्षा के लिये काम करने के लिये प्रतिबद्ध हैं, और देश में उच्च कम्प्युटर शिक्षा लाने के लिये प्रतिबद्ध हैं.

लगभग 45 मिनिट चली यह प्रेस कांफ्रेस, और बातें सारी यहीं हुईं, लेकिन अंत होते-होते एक सयाने पत्रकार ने पूछ लिया कि वरुण गांधी पर क्या खयाल हैं, तो आडवाणी ने वही कहा जो वह कहते हैं आ रहे हैं, कि वरुण ने कहा है कि बयान मेरा नहीं है.

और भाई मेरे, इन महान पत्रकारों की जमात ने 45 मिनिट की कांफ्रेंस में से क्या निष्कर्ष निकाला सिर्फ आखिरी पांच मिनट? इन्होंने निकाला

'आडवाणी ने वरुण का बचाव किया'

  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने कहा कि देश का 285 करोड़ रुपया काला धन बन चुका है
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने मनमोहन से उन लोगों का नाम पूछने को कहा जिनका पैसा है यह
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि इस पैसे को देश में वापस लाना है
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने कहा कि भूचाल आये तो भी उन लोगों के नाम जगजाहिर होने चाहिये
  • इन्होंने बस वही सुना जिसे सुनने की परमिशन इनके आकाओं ने दी.
  • इन्होंने सुना बस वरुण, देश को यह भूल गये

जिस-जिसने यह प्रेस कांफ्रेस देखी हो, और बाद में इसके बारे में पत्रकारों की कवरेज देखी हो, उसका खून आज खौल उठा होगा.

जय चौथा खंभा...

और बीजेपी, वक्त आ गया है कि तुम भी whitehouse की तरह से Youtube पर अपना चैनल लगाओ और अपने भाषण, वक्तव्य और प्रेस कांफ्रेसों के विडियो वहां डालो. कम से कम देश अगर कोई रेफ्रेंस चाहे, तो वह तो मिले.

Thursday, February 12, 2009

किसी भी घटिया हरकत का जवाब, वैसी ही घटिया हरकत से दिया जाये, तो अच्छा है. है न?

मुतालिक ने एक घटिया काम किया तो फिर इसका जायज जवाब तो वैसा ही घटिया काम करके दिया जा सकता है न? और कोई तरीका तो हमारे लोकतांत्रिक देश में है ही नहीं. तो चलिये मुतालिक को अंतर्वस्त्र ही भेज दें. यकीनन इससे मुतालिक को शर्म आयेगी और जिस तरह का घटिया काम उसने किया, वो आगे नहीं करेगा. है न?

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Do they?

ये भी सही समाधान है. चड्डियां भेज कर विश्व की कुछ और समस्याओं का भी लगे हाथों समाधान कर लें तो सही रहेगा. तो निशा सुजन से पूछना चाहिये कि तालिबान को किस पते पर चड्डियां भेजें (जो स्कूल जाने पर लड़कियों को पीट रहे हैं). पोप को किस पते पर चड्डियां भेजें (जो अभी भी ननों को थोथी शुचिता और विर्जिनिटी के नियमों में बांध के रख रहा है), और किस पते पर भेजें चड्डियां उन सबको जिनकी वजह से स्त्रियां त्रस्त हैं. या इन पर चड्डियों का असर नहीं होगा? सूजन, तुम्हारी indignation इतनी partial क्यों है.

मुतालिक और आगे का घटनाक्रम उस प्रकार है जैसे कि एक सुअर ने कूड़े का डब्बा फैलाकर गंद मचाया, और पीछे-पीछे चार सुअर और आये उसमें लोट लगाने.

न तो मुतालिक हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, और न निशा सूजन किसी भी प्रोग्रेसिव औरत का. मैंने अपनी बीवी से पूछा (जो अच्छी खासी प्रोग्रेसिव है, महानगर की पैदाइश भी है, और पढ़ी-लिखी भी) तो उसने यही कहा कि निशा सूजन की हरकत घटिया है और इस बहाने उसने उन बहुत सारी स्त्रियों को शर्मसार किया है, जिन्हें वो रिप्रेसेन्ट बिलकुल नहीं करती.

एक लेख में लिखा था कि अंतर्वस्त्र प्राइवेट स्पेस है, तो फिर मुतालिक ने जिस तरह अपनी घटिया-लोगों की सेना   का औरतों के खिलाफ जिस तरह इस्तेमाल किया उसी तरह निशा सूजन ने भी यकीनन अपना घटिया एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिये प्राइवेट स्पेस को पब्लिक स्पेस बना डाला.

और यह गांधीगिरी भी नहीं. गांधीगिरी सिखाती है फूल देना जो कि सिम्बल है नेचर, ब्यूटी, प्योरिटी, और इनोसेंस के. यह तो गंदगिरी है, गंदगिरी और इसका सिंबल भी कुछ और ही रिप्रेसेंट करता है.

यह सिबल क्या रिप्रेसेंट करता है इसे जानना कुछ मुश्किल नहीं. कुछ ही दिन अगर अमेरिकी चैनल और फिल्में अगर देख ली जायें तो चड्डियों के reference और significance आपको समझ आयेगी.

असल में यह भी एक कारनामा है हमारे पोस्ट-मोर्डन और स्यूडो मोर्डन समाज के उस हिस्से का जिसने घटियापन  का ओवरडोज़ लेकर उसे आधुनिकता समझ लिया है. और इसलिये यह निंदा योग्य है.

और हां इसकी निंदा का तरीका कंडोम भेजना नहीं है, यह तो सब रिएक्शनरी कार्य होगा. इसका सही तरीका क्या है, थोड़ा सोचिए. और मुझे भी बताइये!

Monday, February 2, 2009

तो अब बरखा दत्त को देना होगा कोर्ट में जवाब

अगर आप बरखा दत्त से सहानुभूति रखते हैं, तो उसे दर्ज कराने का एक मौका और आपको मिलने वाला है. आयें और उनकी तरफदारी में अपनी थोथी दलीलें पेश करें, क्योंकि अब शायद बरखा दत्त को उनकी ज्यादा जरुरत हो.

चेतन कुंटे को कोर्ट केस की धमकी देने वाली बरखा दत्त को अब शायद खुद ही कोर्ट को जवाब देना पड़े. आत्ममोहित मीडिया ने जिस तरह से मुम्बई आतंकी हमले के दौरान shoddy journalism का परिचय दिया, उससे हर देश की चिंता करने वाले समझदार आदमी को तकलीफ पहुंची. कुछ लोगों ने कहा, और कुछ ने किया.

मुंबई में रहने वाले संगीतकार विशाल दादलानी मीडिया कवरेज से इतना परेशान हुये कि उन्होंने फौरन इसके खिलाफ कोर्ट में जाने का फैसला किया. इसके लिये उन्होंने एक वेबसाइट का निर्माण किया - smallchange.in - जहां उन्होंने इस कवरेज के खिलाफ एक पेटिशन को आकार दिया.

इस पेटिशन को 25,000 से ज्यादा लोगों ने लिखित समर्थन दिया (जिसमें मैं भी हूं). आपको खुशी होगी यह जानकर की इस पेटिशन को मुम्बई हाइ-कोर्ट ने सुनवाई के लिये मंजूर कर लिया है, और पहली सुनवाई 5 फरवरी को है.

अब मुम्बई हाइकोर्ट चैनलों से उनकी घटिया (shoddy) कवरेज के बारे में सवाल करेगा, और उन्हें जवाब भी देने होंगे. याद रहे की कुंटे कि बोलती बन्द करने वाली बरखा दत्त भी ऐसे ही एक चैनल और ऐसी ही घटिया कवरेज से जुड़ी हुईं हैं, और इस बात की प्रबल संभावनायें हैं कि जब सब चैनल न्यौते जायें तो उनके पास भी न्यौता पहुंचे.

तो अब हम इंतजार करे कि कुंटे को कोर्ट की धमकी देने वालीं बरखा दत्त, कोर्ट को क्या जवाब देतीं हैं.

इस बारे में ज्यादा जानकारी आप smallchange.in से प्राप्त कर सकते हैं. और हां, अगर आप को भी बरखा दत्त - एनडीटीवी और बाकी चैनलों के shoddy journalism पर एतराज हो, तो उस पेटिशन को जरूर लिखित समर्थन दें, और दूसरों को भी बतायें.

Monday, November 10, 2008

'हिन्दू' शब्द बोलते वक्त दीपक चौरसिया के मुंह में गोबर का सा स्वाद आता है क्या?

स्टार टीवी के दीपक चौरसिया स्टार बन चुके हैं, जिस फार्मूले का उपयोग कर उनके सामने ही सामने कितने लोग बड़े-बड़े पुरुस्कृत पत्रकार बन गये, उसका उपयोग करके अगर वो एक-दो अवार्ड अपने कन्ने कर लें तो क्या बुरा?

तो आज स्टार पर धमाल मचा रखा है, जुबान अटक गई है - 'हिन्दूवादी नेता', 'हिन्दूवादी नेता'. ऐसा घमासान मचा रहे हैं कि लगता है कि जब बचपन में जब बोलन सीखा तो क-ख की जगह हिन्दूवादी नेताओं से निपटने का ककहरा सीख लिया.

deepakc1 सुदूर क्षितिज की ताक में.
वहीं से अगली खबर निकलेगी जिससे अपने आकाओं को खुश करने का मसाला निकालेंगे.

और ये स्टार (Fox News वाले, अरे वही जो जार्ज बुश के सबसे बड़े चमचे रहे हैं) के सुपर-स्टार जब 'हिन्दू' बोलते हैं तो चेहरे पर भाव बदल-बदल कर, कभी ऐसे जैसे गोबर चख रहे हैं, लेकिन जब साथ में जब 'वादी नेता' बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि अभी किसी बिल्ले को दो सेर मलाई चटा दी. बड़ा घणा मौका मिला है इन्हें, सारे रात हिन्दूवादी नेता का भजन करें, तो भी संतुष्टी को प्राप्त नहीं होंगे.

ये वहीं पत्रकार हैं जो 'इस्लामिक अतिवादी' पर अलग ही प्रतिक्रिया देते हैं. जोर देते हैं कि जिन मुस्लिम आतंकवादियों को गिरफ्तार किया जाये उन्हें धर्म से न जोड़ा जाये. लेकिन खुदा-न-खास्ता अगर हिन्दूवादी नेता के हाथ होने का अंदेशा भी मिले तो हिन्दूवाद शब्द बड़े जोर दे-देकर, बड़े अंदाजों-खम के साथ बोला जाता है.

घटिया पत्रकारिता के झंडाबरदार ये बेशर्म लोग चाहे कितनी भी शर्मनाक नौटंकी न करें, इनके लिये ताली पीटने वाले चमचों की भी कमीं नहीं. इसलिये इनकी दुकान चलती रहेगी, चाहे इनके पाखंड पर कितना ही गुस्सा न आये.