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Wednesday, March 10, 2010

अबु आजमी ने कितने आतंकवादियों को बचाया? शहजाद, जुनैद… या कुछ और भी हैं?

अभी-अभी टीवी पर खुलासा हो रहा है कि मुम्बई के सपा नेता अबु आजमी बाटला हाउस के आतंकी शहजाद और जुनैद से मिला और उन्हें पैसा दिया कि वो छुप के रहें. चौरसिया और अजमानी मिलकर अबु आजमी से फोन पर बात कर रहे हैं, और कम से कम पहली बार चौरसिया के मुंह से कठिन सवाल सुनने को मिल रहे हैं

1. अबु आजमी दाउद की महफिल में शामिल रह चुका है.
2. अबु आजमी 1993 के विस्फोट के मामले में गिरफ्तार होकर जेल में रह चुका है.
3. अबु आजमी बार-बार आतंकवादी मामलों में संदिग्ध रहा है.
4. अबु आजमी ने खुद स्वीकार किया की शहजाद के बाप से उसके संबंध रहे और शहजाद का बाप उसके यहां आता जाता रहता है.

abuazmideshdrohi

बाटला हाउस में शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के कातिलों में शामिल शहजाद को पैसे दिये और छुपने में मदद की... ठीक है.

लेकिन अभी-अभी मुझे याद आ रहा है कि मुंबई में ताज पर हमले में अबु आजमी गोलियों और हमलों के बीच में घुस कर कार लेकर आता है, और दो-तीन लोगों को बचाकर ले जाता है. बाद में बयान देता है कि वो सऊदी अरब के कुछ सम्माननीय लोग थे.

शहजाद का तो पता चला.. लेकिन अबु आजमी, कौन थे वो लोग जिन्हें तूने ताज होटल से निकाला था.

चौरसिया ने अभी अभी अबु आजमी से कहा
"आप इतने भोले भी नहीं है अबु आजमी की दाउद के घर में शादी में शामिल हों और आपका पता नहीं हो किसके घर में हैं"

अबु आजमी कह रहा है कि मैं भोला हूं... बिल्कुल भोला हूं.

"मैं मुसलमान हूं, मैं भगवान की नहीं अल्ला की कसम खा कर कहता हूं कि मैंने शहजाद को पैसे नहीं दिये और मैं उससे मिला भी नहीं हूं."

चौरसिया, क्या इस सवाल का जवाब निकलवा सकते हो कि इसने ताज होटल में किसको बचाया था.. कहीं कुछ और आतंकवादियों को तो नहीं निकाल ले गया? पुरानी फुटेज होगी न तुम्हारे पास?

लंदन भाग गया है अबु आजमी 5 तारीख को. ठीक उसी दिन जिस दिन दिल्ली पुलिस ने उससे पूछताछ की.

मनसे वालों तुमने हिंदी के नाम पर इसको झापड़ लगाया, क्या इस बात के लिये खुदा कसम इसको एक जबर्दस्त नहीं लगाना चाहिये?

और इधर कांग्रेस का एक पूर्व विधायक कांग्रेस की सरकार में हुये दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर जिसमें एक बहादुर पुलिस इंस्पेक्टर शहीद हुआ के बारे में कह रहा है कि ‘सारी दुनिया जानती है कि बाटला एनकाउंटर झूठ था’…

इस अब्दुस सलाम को लाफा कौन लगायेगा?

Thursday, September 25, 2008

'नरेन्दर मोदी को अगर सजा मिल गया होता, तो आज टरेरिस्ट बने हैं जो नौजवान... वो नहीं होता'

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सरकार किनकी धर-पकड़ कर रही है? काहे का पोटा, और काहे का सुरक्षा बल, इस पूरी समस्या का हल तो लालू प्रसाद यादव ने बता दिया है. सीधे नरेन्द्र मोदी को पकड़ कर फांसी पर चढ़ा दो, आतंकवाद की समस्या हल है जी!

शीर्षक के उद्गार लालू प्रसाद ने जी-टीवी को दी गई अपनी बाइट में कहे हैं. मौका था जस्टिस नानावटी के छ: साली जांच की शुरुआती रपट का. जिसमें बताया गया है कि उस घटना के लिये नरेन्द्र मोदी नहीं, गोधरा का ही एक मौलवी जिम्मेदार है. 140 लीटर पैट्रोल खरीदा गया था उन मर्दों, औरतों और बच्चों को जिंदा जलाने के लिये. क्या कूवत थी उस आग में. इतनी सही जगह लगी की पूरा गुजरात जल उठा.

बहरहाल बात करें लालू के 'नरेन्दर मोदी' की. क्या बात कही है बिहारी बाबू ने. नाहक मोहन चन्द्र शर्मा ने जान गवायीं आतंकवादियों को पकड़ने में. कह देते - नहीं भाई, आप तो नरेन्द्र मोदी को पकड़िये, सारे आतंकवादी खुद ही आत्म समर्पण कर देंगे.

लालू जैसे देशहित के चिंतक हैं हमारे देश में, जो मामले की तह तक जाते हैं. ये अदालतें, पुलिस, जांच एजेंसियां सब बेबात हैं. दुख है कि लालू रेल मंत्री हुये, गृह मंत्री न हुये. वरना अब तक करवा देते 'नरेन्दर मोदी' का एनकाउन्टर की लाओ, टंटा ही समेटें.

कृपा है लालू जी की इन 'नौजवानों' का इलाज उन्होंने बता दिया. अब आप सबसे पढ़ने वालों से विनती है कि जरा लालू जी से अपील करिये कि ये भी बता दें की कश्मीर में जो 'नौजवान' आतंकवाद में लगे हैं, उन्हें सही राह पर लाने के लिये किसको सजा 'मिलना' चाहिये. किसे चढ़ायें फांसी पर? अटल बिहारी को? आडवाणी को?

***

मन की कड़वाहट शब्दों से क्या बयां कर पाऊंगा. कौन से शब्द लाऊं, कहां से लाऊं जो उस घृणा, उस वितृष्णा, उस बेचारगी, उस कसक को बयां करें जो इस समय महसूस हो रही है.

***

पता नहीं नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में क्या किया. पता नहीं कितना दोषी है वह. बस यह पता है कि इस तरह आतंकवादियों के कृत्यों का औचित्य निकाल कर उन्हें शह देना दर्दनाक है.

Tuesday, September 23, 2008

सुनिये पुण्य प्रसून बाजपेयी से मुठभेड़ का आंखों देखा हाल

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"और उसने जिसे मोबाइल से फोन किया खून से लथपथ इंसपेक्टर शर्मा थे..जो सिग्नल का इंतजार कर रहे थे। जिन्होंने दरवाजा खुलते ही गोलियां दागी । और उन लडकों ने भी गोलिया दागीं ।" (लेख यहां है)

ये किसी बौराये हुये आतंकवाद समर्थक की कल्पना नहीं है, यह है एक बेहद जिम्मेदार कहे जाने वाले पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का चित्रण, उस घटना का जिसने दिल्ली को अंदर तक हिला दिया.

पुण्य प्रसून को दिल के किसी कोने में विश्वास है कि वो पुलिस वाला जो मारा गया दरवाजा खुलते ही गोलिया चला रहा था. लेकिन वो जिसने 35 आतंकवादियों को मारा, घुस गया गोलियां चलाते हुआ बिना बुलेटप्रूफ वेस्ट के (जिसका साथ शायद ही कोई एनकाउंटर के लिये जाने वाला आफिसर छोड़े), और कैसा कच्चा निशानेबाज निकला की हर वार चूका, और खुद ही गोलियों का शिकार हुआ.

उन भोले लड़कों की गोलियां का जो 'होनहार' विद्यार्थी थे, और जिनके साथियों के समर्थन में एक विश्वविद्यालय का वाइस-चांसलर खड़ा है.

पुण्य प्रसून को विश्वास है कि पुलिस का हर आदमी कमीना है, क्योंकि वो आने-जाने वाले लोगों को रोकते हैं. उनसे सवाल करते हैं.

उन्हें शौक है न सवाल करने का? घर में लेट के खटिया तोड़ने से बेहतर उन्हें बारिश-गर्मी-सर्दी-रात में राह किनारे खड़े होकर आने-जाने लोगों को परेशान करना लगता है. पुण्य प्रसून के लेख से साफ है कि वो चाहते हैं कि राहगीरों से सवाल न किये जायें. किसी को रोका न जाये.

क्यों इतने सारे पुलिस वाले खड़े हैं जामिया नगर में? सब घर जायें.  आराम करें. यकीनन वो पुलिस वाले भी यही चाहते होंगे.

उस घर का दरवाजा खटखटाते वक्त मोहन चन्द्र शर्मा शायद जानता होगा कि अन्दर से जो गोलियां बरसेगीं, वो लेमनचूस की नहीं होंगी, बंदूक की होंगी. फिर भी उसने खटखटाया वो दरवाजा, क्योंकि उसे शौक था गोलियां का सामना करने का. और उसे शौक था मरने के बाद अपनी फजीहत उन पत्रकारों से कराने का जिन्हें क्रिमिनल्स पास बिठाकर, कोला पिलाकर, फोटो खिंचाकर, इंटरव्यू देते हैं.

पुण्य प्रसून कश्मीर के शोपायां इलाके में हो आये, पूरी तरह सेना के प्रोटेक्शन में. और भी दस जगह हो आये होंगे. उन्हें क्या मुश्किल? आतंकवादी भी उन्हें कहवा पिलायेंगे, कि चलो अपना ये यार अपना नाम करेगा चैनल पर. मुश्किल है उस बाशिंदे की जो किसी बड़े चैनल से जुड़ा नहीं. जिसको रोजाना रिजक कमानी है उसी बाजार में जिस में बम फटा.

उसे तो अच्छे लगते होंगे वो पुलिस वाले जो खड़े हैं हर मुश्किल सह कर, कि आगे कोई बम न फूटे, आगे निर्दोष न मरें.

पुण्य प्रसून का क्या? उनका काम तो बम फटने के बाद शुरु होना है न?

Friday, September 19, 2008

शहीदों की उम्र कम होती है पर जिंदगी बड़ी

दिल्ली पुलिस के इन्सपेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा आज आतंकवादियों से मुकाबला करते हुये शहीद हो गये. वो इस एनकाउन्टर को आगे से लीड कर रहे थे, आतंकियों की संख्या और असले की फिक्र करे बिना भिड़ गये, और चार गोलियों झेलीं.

इस जाबांज सिपाही ने अब तक 35 आतंकवादियों को ढेर किया, और 85 आतंकियों को कानून के हाथों तक पहुंचाया. इनके बारे में कहते थे कि इन्हें आतंकियों को पकड़ने में महारत है.

ऐसे शानदार आफिसर का जाना दिल्ली और देश के लिये बड़ा दुख है.

हमीं जांनिसार हैं हिन्द के, हमीं दिलफिगार हैं हिन्द के
हमें पास महरो-वफा का है, उन्हें जान दे के दिखा दिया
(खलीक)

इन्हें नमन.

कुछ ज्यादा कह नहीं पा रहा. शब्द नहीं मिलते.

Sunday, September 14, 2008

हमने पोटा हटाया, मकोका नहीं क्योंकि वो पुराना था. और हां गुजरात के लिये मकोका जैसा नया कानून नहीं देंगे.

terror

अभिषेक मनु सिंघवी सावधान राजनेता हैं, वो चाहते हैं कि लोग उनका वही मतलब समझें जो वो कहना चाहते हैं. वो टेलिव्हिजन पर कहते हैं - "मुझे पूरा मौका दीजिये अपनी बात कहने का, क्योंकि बहुत सारे लोग देख रहे हैं, और वो भी अपना दिमाग इस्तेमाल करेंगे."

लेकिन लगता है कि अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ही बात पर भरोसा नहीं. नहीं तो वो समझ जाते की जो दलीलें उन्होंने दीं वो कितनी थोथी थीं.

राजनीति मुद्दे से ध्यान भटकाकर अमुद्दे पर ले जाने की कला है, और अरुण जेटली भी इसमें कम माहिर नहीं. दोनों शातिर खिलाड़ी लगे हैं सबको बेवकूफ बनाने.

- कांग्रेस आतंकवादी विरोधी कानून बनाने को तैयार नहीं.
- बीजेपी केन्द्र संचालित आतंकवाद निरोधक विभाग के लिये तैयार नहीं.

क्यों? क्यों? क्यों? क्यों?!!!!

कांग्रेस कहती है

- पोटा कानून के अंतर्गत मानवाधिकार उल्लंघन का रिकार्ड है.
1. आतंकवाद के अंतर्गत मानवाधिकार उल्लंघन नहीं होता? कुल कितनी जानें गईं  - अहमदाबाद विस्फोट, मुम्बई, बैंगलोर, दिल्ली. क्या पोटा में उससे ज्यादा लोगों के मानवाधिकार का उल्लंघन हुआ?

क्या देश के नागरिक मानव नहीं हैं?

2. मानवाधिकार का उल्लंघन कानून नहीं करता, कानून के कारिंदे करते हैं. मानवाधिकार का उल्लंघन दफा 300, 302, 320, 351, (आगे)... में भी किया जा सकता है, तो क्यों न आप देश के सारे कानून निरस्त करें?

देश में हर साल कितने लोगों की पुलिस कस्टडी में जान जाती है? क्या वो सब पोटा के अंतर्गत मरते हैं? या उनके मानवाधिकार पोटा बंदी के मानवाधिकारों से कम थे?

क्या जरुरत कानून से बचने की है या उसका सही इस्तेमाल पक्का करने की.

हां ? नहीं ?

- पोटा से क्या आतंकवादी घटनायें रुक गईं ? संसद पर फिर भी हमला हुआ.

कांग्रेस की इस दलील पर कुर्बान हो जाने का दिल करता है.

इतने सारे कानून हैं इस देश में. कत्ल के खिलाफ, चोरी के खिलाफ, ब्लात्कार के खिलाफ, फिर भी क्या यह सब अपराध रुके?

हटा दो! हर कानून मिटा दो! विनती है तुमसे.

अपराध का निर्मूलन कानून बनाने से कब हुआ है? अपराध का निर्मूलन कानून को सही लागू करने से होता है. लेकिन लागू करने वालों के हाथों में सही कानून होना चाहिये. क्या खाली हाथ हमारी सुरक्षा एजेंसियां बदकार आतंकवादियों से लड़ पायेंगी?

- पोटा के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया.

लेकिन कानून तो बनाया गया था आतंकवादियों को निशाना बनाने के लिये. तो क्यों न यह निश्चित किया गया कि जो निर्दोष हो (बहुसंख्यक समुदाय से, या अल्पसंख्यक समुदाय से) उसे बचाया जा सके.

दूसरी बात. लगभग सभी आतंकवादी अल्पसंख्यक समुदाय के ही हैं. उन्हें बड़े स्तर पर प्रोपोगेन्डा का इस्तेमाल कर देश व समाज के विरुद्ध ब्रेनवाश किया जा रहा है. जब लगभग हर आतंकवादी इसी समाज का हो, तो यह दलील देना बहुत आसान है कि इस अल्पसंख्यक समाज को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि जो आतंकवादी मिलेगा, ज्यादातर मामलों में इसी समुदाय का होगा. तब क्या उसको गिरफ्तार न किया जाये?

क्या जो बचे-खुचे कानून हैं, उनमें अल्पसंख्यकों को गिरफ्तार न करने का प्रावाधान है, आरोप चाहे जो हो?

- गुजरात को मकोका जैसा कानून नहीं देंगे, क्योंकि गुजरात में उसका बेजा इस्तेमाल हो सकता है. महाराष्ट्र से मकोका नहीं हटायेंगे, क्योंकि वो पुराना है.

क्या हम सब देशवासी निर्बुद्धी हैं जिन्हें इस दलील के छेद दिखाई नहीं देंगे़?

गुजरात क्या देश का हिस्सा नहीं? या आतंकवाद गुजरात की समस्या नहीं? क्या केन्द्र सरकार को अहमदाबाद, अक्षरधाम, सूरत दिखाई नहीं देते? या फिर गुजराती मरें तो केन्द्र को फर्क नहीं पड़ता? तो क्यों न गुजरात को महाराष्ट्र की बराबरी का दर्जा देकर मकोका जैसा कानून दिया जाये?

या अगर ये ही मान लें कि मकोका इसलिये नहीं देना चाहिये क्योंकि उसका बेजा इस्तेमाल होगा तो फिर महाराष्ट्र में क्यों इस तरह का कानून है? वहां क्या इल्जाम नहीं लगे कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल हो रहा है?  या क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है तो वहां इसका बेजा इस्तेमाल इजाजत योग्य है?

अगर किसी कानून के गलत इस्तेमाल की संभावनायें हैं, इतनी कि उसे दूसरे राज्य में लागू करना सहीं नहीं माना जा रहा, तो क्या सिर्फ इस आधार पर उसे निरस्त न करना उचित है कि वह पुराना है?

अगर इस तर्क को उचित माना जाये तो फिर उन सारे कानूनों को निरस्त कैसे करा जा सकता था जिनका निर्माण अंग्रेजों ने देशवासियों का दमन करने के लिये किया था?

बीजेपी कहती है

- केन्द्रीय जांच एजेंसी से पहले पोटा जैसा कानून लाइये.

कांग्रेस आतंकवाद की जांच के लिये केन्द्रीय एजेन्सी बनाना चाहती है, लेकिन बीजेपी का कहना है कि समर्थन के लिये पोटा जैसा कानून लाइये.

एक तरफ तो अरुण जेटली का कहना है कि केन्द्रीय जांच बल की सोच आडवाणी की थी और उसके लिये तब कांग्रेस शासित प्रदेश तैयार नहीं थे. अब उसके शासित प्रदेश इसके निर्माण के लिये तैयार नहीं? निरी धांधली है यह.

क्या केन्द्रीय जांच ऐजेंसी का निर्माण सिर्फ इसलिये टलता रहे कि दोनों पार्टियां अपनी छिछली सौदेबाजी और बदला लेने की कार्यवाही में लगी हैं. क्या देशवासियों की जान इतनी सस्ती है?

बीजेपी को क्यों दिखाई नहीं देता की हर छोटा-से-छोटा कदम जिससे आतंकवादी कमजोर हो, देशहित में हैं, और इसको रोकने के बदले प्रोत्साहित करना चाहिये. क्या इस मुद्दे यह ओछापन देशद्रोह से कम है?

मैं कहता हूं

टूट जायेगी गुलामी की कड़ी दम भर में आप
हिन्दु-ओ-मुस्लिम के बस कंधा सटा देने के बाद
(माहिर)

ऐ हिन्दू, ऐ मुसलमान. उठ जाओ दीनो-धर्म से ऊपर.

सबसे बड़ा धर्म है इंसानियत, क्योंकि खुदा तक ने तुम्हें अकेला छोड़ दिया पाप-पुण्य के नाम पर मरने को और साथ दिया तो बस दूसरे इन्सानों ने.

आतंकवाद का उन्मूलन करने के लिये बात हो लिबर्टी की, फ्रीडम की, उम्मीद की, दीन की बिलकुल नहीं, धर्म की बिलकुल नहीं.

सबसे पहले तो हर देशवासी निश्चय करे की देश के खिलाफ किसी प्रकार का प्रोपोगेन्डा सुना न जाये, और इसके प्रसार को रोका जाये.

-- मुद्दआ जारी रहेगा.

Saturday, September 13, 2008

अब गुस्सा भी नहीं आता

Scream

जो एक चिंगारी से जल उठता था अब राख बन चुका. सिर्फ एक मूक गवाह बचा हूं, जो देखता है सब चुपचाप लेकिन बस देख ही सकता है.

मेरी दिल्ली में आग भड़क रही है आज.

कल के आबाद घरों में बर्बादी का मातम है, और जो कसूरवार हैं इस बर्बादी के, वो छिपे हैं कहीं अपने अड्डों में, और मना रहे हैं जश्न कामयाबी का.

ऐसा पिछली बार जब देखा तो खून खौला था मेरा. लेकिन आज सिर्फ अवसाद है. पिछली बार जो आंखें लाल हो उठीं थी रोष से, आज उनमें ताब नहीं निगाह मिलाने कि इन तस्वीरों से.

कहीं खुद को ही दोषी समझ रहा हूं कुछ. मेरी भी थोड़ी भागीदारी रही होगी इस सब में. क्योंकि चुप तो मैं भी था.

चुप हूं अब भी, और ये चुप्पी आसान है पिछली बार से भी.  जब-जब यह मंजर दोहरायेगा खुद को, तब-तब और भी आसान होती जायेगी चुप्पी.

पर बढ़ेगा अपराध बोध.

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जहर पीने की तो आदत है जमाने वालों
अब कोई और दवा दो, कि मैं जिंदा हूं अभी
(मेरा नहीं है)

हुआ गुस्से में यूं बेबस की बेहिस हो गया
मुझे शर्मिन्दा बना दो, कि मैं जिंदा हूं अभी
(विश्व)