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Friday, April 17, 2009

कसाब को किस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है?

अजमल कसाब जब पहले-पहल पकड़ा गया तो रो-रोकर उसने मांग की कि उसको मार दिया जाये, लेकिन थोड़ी ही देर बाद रोना अस्पताल में इलाज करवाने के लिये था. जेल गया तो पहले सारा कच्चा चिट्ठा उगल मारा. बाप-भाई, बहनोई सबके पते दे दिये, लेकिन हिन्दुस्तानी मेहमाननवाजी तो पूरे जग में प्रसिद्ध है, थोड़े दिन सरकारी मुर्ग खाये तो मुटिया गया, हिन्दुस्तानी कानून का हाल-बेहाल भी पता चल गया, इसलिए आजकल वो अपराधी नहीं नेताओं की तरह मांगे कर रहा है.

मुझे यह दो, मुझे वह दो, यह कैदी भी सुविधापरस्त हो चला है. जब ऐसी टोटल ऐश हो तो क्या डर कानून का, इसलिये अदालत में मजे से अपने बयान से मुकर गया. उसने कहा कि बयान तो दबाव में दिया था मैंने.

अगर इसकी जगह कोई और देश होता (जैसे चीन या रूस) तो पट से ट्रायल, और फटाक से फांसी तक पहुंच चुका होता कसाब. कसाब के अपराध को साबित करने के लिये भी लंबा मुकदमा चाहिये?

चलिये अब मुद्दे की बात पर आते हैं. आखिर कौन से कानून हैं वो जिनका उल्लंघन कसाब ने किया जब वो मुम्बई में लोगों की जानें लेने निकला (पूरे 166 लोगों को मारा इन इस्लामिक आतंकवादियों ने).

1. किसी व्यक्ति की जान लेना.
2. देश के खिलाफ युद्ध
3. लूट
4. खूब सारे और छोटे-मोटे कानून...

कानूनों कि लिस्ट लंबी है, और कसाब पर फाइल की गई चार्जशीट भी.... दिल थाम के सुनिये .... 1000, 2000, 3000.... नहीं, पूरे 11,000 पेज की है (पाकिस्तान के बाबा आजम के भी दद्दु गजनी के ताऊ से शुरु की होगी गपड़चौथ)

इस चार्जशीट को पढ़ने और समझने में लगेंगे जज को 20 साल, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाते-जाते और फैसला होते-होते कसाब भी अपनी हूरें कब्जाने जन्नतनशीन हो चुका होगा (बुढ़ापे से मरेगा)

अच्छा वो कानूनों की सूची पढ़ ली थी न आपने? सही सूची है न? कुछ कमीबेशी?.... नहीं है?

भाई आपको बता दें कि महाराष्ट्र (कांग्रेस का शासन है जी इधर) में एक धांसू कानून और है जिसे कहते हैं मकोका (MCOCA). नाम याद रखना. इस धांसू कानून के अंतर्गत कुछ और आतंकवादी बंद हैं जिन पर फौरन कांग्रेस के सेक्युलर सरकार ने मकोका चिपका दिया था और वो जेल में सड़ रहें हैं. वो थे 'हिन्दू आतंकवादी' प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित. कांग्रेस को भरोसा है कि प्रज्ञा और पुरोहित कसाब से ज्यादा खतरनाक हैं जिन पर ज्यादा कठोर कानून लगना चाहिये.

वैसे ये भी पता होना चाहिये कि अगर कसाब पर मकोका लगा होता तो वह आज अदालत में मुकर नहीं पाता क्योंकि मकोका के अंतर्गत उच्च पुलिस अधिकारी के आगे दिया बयान मान्य होता है. अब जब कसाब अपने हल्फिया बयान से मुकर गया तो पुलिस की सारी कार्यवाही नये सिरे से होगी (मतलब अफजल को नया हमसाया मिल गया).

और भी जबर्दस्त खबर सुनेंगे?

कसाब के वकील (वही जो दाउद के गुर्गों के मुकदमे लड़ता रहा है) ने कहा कि भैया कसाब तो एकदम बच्चा है. उस पर मुकदमा बच्चों के कोर्ट में चलाया जाये, इस कोर्ट को कोई हक नहीं सुनवाई की. अब समझे वाघमारे को हटाने का राज? जैसे-जैसे केस पुराना होगा, कसाब के खिलाफ तथ्य हल्के होंगे और उसके पक्ष में मजबूत.

अब तो यह सोचता हूं कि क्यों तुकाराम ओंबले ने जान देकर इस हरामखोर को जिंदा पकड़ा, ठोक देना था वहीं.

क्या आप में से कोई मुम्बई की चुनी हुई सरकार से पूछेगा कि उसे कसाब मकोका के लायक क्यों नहीं लगा?

Sunday, November 30, 2008

विलासराव देशमुख देखने गये थे कि आतंकवादियों ने 200 लोगों को कैसे मारा... और साथ ले गये थे राम गोपाल वर्मा को

vilasrao_deshmukh
यही रोकेंगे आतंकियों का अगला हमला.
हमारे महान मुख्यमंत्री

विलासराव देशमुख महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री है, आतंक के जिन 59 घंटो को आपने और मैंने जिया. मौत और खून की जिन तस्वीरों को देखकर हमारी आंखें पानी नहीं खून से भर उठी थीं उस दर्द को विलासराव देशमुख के दिल ने भी महसूस किया था? अपने राष्ट्र और अपने महाराष्ट्र की यह दुर्गति देखकर उसका खून भी खौला था? 200 लोग मरे, 14 जवान मरे, और कितने ही लोग घायल हुये, मुम्बई वीटी का प्लेटफार्म खून से लाल हो गया, यह देखकर विलासराव का खून गरम हुआ होगा?

घटनाक्रम के खत्म होने के एक दिन बाद विलासराव को मृतकों कि याद आई, तो आया वो अपने जिम्मेदारी निभाने. देखने कि किस तरह अपने देश के दुश्मनों ने देशवासियों की हत्या की... और साथ लेकर आया अपने एडवाइज़रों की टीम? वो लोग जो यह देखते और विलासराव कि मदद करते यह सब रोकने में?

यह है विलासराव की संवेदना देश और मृतकों के प्रति

विलासराव देशमुख लेकर आया रामगोपाल वर्मा को
विलासराव देशमुख लेकर आया रितेश देशमुख को

तो अब सुनिये विलासराव की कृपा से रामू की अगली फिल्म के बारे में

रामगोपाल की छब्बीस-ग्यारह!

रितेश देशमुख - संदीप उन्नीकृष्णन के रोल में.

विलासराव देशमुख के पीछे सुरक्षा सलाहकार नहीं राम गोपाल चल रहा था.

विलासराव देशमुख को देश की नहीं, राम गोपाल की अगली फिल्म की चिंता थी

विलासराव देशमुख को देश को नहीं, रितेश देशमुख को आगे बढ़ाना है?

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क्यों रोये हम और आप वो तीन दिन. क्यों हम तड़पे देश के लिये. विलासराव देशमुख को तो यह चिंता थी कि रामगोपाल वर्मा की अगली फिल्म की गोटी फिट हो सके और रितेश देशमुख के लिये धंधा बना पायें.

यह है महाराष्ट्र के मुखिया.
यह है वो आदमी जिसे हमने चुन के भेजा था कि हमारा भला करो, हमारा ख्याल रखो.

अब मत करो इस देश की चिंता, क्योंकि उसका कोई फायदा नहीं. देश को हमने पहले ही कुत्तों के हवाले कर दिया.

Thursday, November 20, 2008

मकोका लगाया इसलिये कि अब पुख्ता सबूत हैं,या सबूत हैं ही नहीं,

कहते हैं कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है, कि वो गुनहगारों के बीच फर्क न कर सके. उसके सामने चाहे अमीर आये चाहे गरीब, चाहे हिन्दू या मुसलमान वो उन्हें पहचान न सके. पहचाने तो सिर्फ गुनहगार और बेगुनाह के बीच का फर्क. लेकिन अब इस देश के नागरिकों का इस छलावे भरी बातों पर विश्वास करना नामुमकिन है. हमें पता है कि यह पट्टी तो इसलिये बांधी गई है ताकि इस अंधे कानून को बेवकूफ बनाना आसान हो.

एटीएस ने भी कानून की आंखों पर बंधी इस पट्टी का फायदा उठाया, क्या खूब उठाया. आखिरकार मालेगांव के कथित अपराधियों पर मकोका लगा दिया गया, इसलिये नहीं की एटीएस के पास अब पुख्ता सबूत हैं, बल्कि इसलिये की सबूत हैं ही नहीं, और मकोका का इस्तेमाल कर एटीएस और वक्त खरीद रही है, और इस साजिश में हमारा तीसरा खंबा, हमारा सूचना तंत्र भी शामिल दिखता है. ऐसे माहौल में उम्मीद किसके दम पर की जाये. तो कुछ बेहद नाउम्मीदी भरी बातें ही करते हैं.

1. पुलिस और कानून सत्ताधारीयों के कब्जे में कुछ भी कर सकता है
राजनेता
तो हर पांच साल में बदल जाते हैं, लेकिन पुलिस और अफसरशाही बनी रहती है, पर फिर भी पुलिस और सारा सरकारी तंत्र उन पांच सालों के लिये राजनेताओं का बंधक बन जाता है. मालेगांव धमाकों के मामले में पूरी तरह यह देखने को मिला. पुलिस ने पहले बिना सबूतों के प्रज्ञा ठाकुर को हिरासत में रखा, बार-बार नारको टेस्ट किये, और फिर भी सबूत न मिलने के बावजूद मकोका लगा दिया ताकि रिहाई आसान न रहे.

यह सब एक राजनैतिक दल कांग्रेस के इशारे पर हुआ, क्योंकि उसे एक दूसरे राजनैतिक दल समाजवादी पार्टी से अपने वोट बैंक को छीनना था. इससे कांग्रेस को सचमुच समाजवादी को करारी चोट पहुंचाने में सफलता मिली है.

क्या देश की सेवा की कसम खाकर ड्यूटी ज्वाइन करने वाले हमारे यह जवान इतनी जल्दी अपनी कसम भूलकर नेताओं की सेवा में ऐसे ही लगते रहेंगे?

2. प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी अपने देश नहीं, राजनैतिक दल के हित के प्रति है
सुना है की देश के प्रधानमंत्री ने विपक्ष प्रमुख आडवाणी को फोन करके पूछा की वह प्रज्ञा ठाकुर की हिरासत के विरुद्ध क्यों है. सही है, प्रधानमंत्री आतंकवाद से लड़ने की प्रतिज्ञा ले चुके हैं. लेकिन फोन लगता है तो आडवाणी को, वो भी प्रज्ञा के विरुद्ध, एक ऐसी साध्वी जिसके खिलाफ अब तक तो सबूत भी नहीं मिले.
क्या प्रधानमंत्री ने अपने ही मंत्रीमंडल के सदस्य अर्जुन सिंह जो फोन लगाया था जिसने दिल्ली के बम विस्फोट के आरोपियों को बचाने के लिये खुले कदम उठाये.
इस फोन की खबर से यकीनक एक खास वर्ग के कुछ लोगों को सुकूं पहुंचा होगा. ये तो अपनी पार्टी को फायदा पहुंचाने की कवायद से ज्यादा और कुछ नहीं. क्या एक संवैधानिक पद का जाती फायदे के लिये इस्तेमाल ऐसे ही होता रहेगा?

3. पत्रकार सत्य नहीं खबर और अपने संस्थान के मालिकों के झुकाव के लिए समर्पित है
2 दिन पहले अभिनव भारत की एक सार्वजनिक सभा को एक चैनल पर बार-बार यह कहकर दिखाया गया यह वही सभा है जहां विस्फोटों का षडयंत्र हुआ. पता नहीं वो पत्रकार क्या स्थापित करना चाहते थे, लेकिन वो चिल्ला इस तरह रहे थे जैसे कि उन्होंने उन लोगों को षडयंत्र करते सुना हो.

उससे एक दिन पहले दयानंद पांडेय का एक विडियो दिखाया गया जिसमें वह देश के उन मुद्दों के बारे में वही चिंतायें जाहिर कर रहा था जो हम सभी की हैं. चाहे वो कश्मीर में पनपता अलगाव-वाद हो, देश के बहुसंख्यक नागरिकों के खिलाफ पक्षपात, या एक खास धर्म के आतंकवादियों को आश्रय. यह वही कुछ था जो हमने आपने रोजाना कहा लिखा, लेकिन ऐसा करने के लिये दयानंद पांडेय को बार-बार आतंकवादी ठहराया गया.

क्या देशभक्ती की बातें करना जुर्म है?

4. सत्ताधारी वही कानून देंगे जिसका वह इस्तेमाल कर सकें
यूपी में मायावती, और गुजरात में मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून की मांग की, लेकिन केन्द्र ने उनकी मांग को नकार दिया कि उस कानून का गलत इस्तेमाल होगा. बल्कि उस तरह के कानून को ही मानवता विरुद्ध ठहराया गया. लेकिन फिर भी उसी सत्ताधारी दल का एक हिस्सा वैसे ही कानून का इस्तेमाल लगातार कर रहा है. क्या गुजरात में जो जानें जाती हैं उनकी कीमत महाराष्ट्र में गई जानों से कम है?

5. देश को वर्गों में बांटकर और उनमें दुश्मनी बढ़ाकर राजनैतिज्ञ अपना राज बचाते रहेंगे
जब रहेंगेजब स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि कितने भी अच्छे विदेशी राज से स्वराज हमेशा बेहतर है, तो उन्होंने यह कल्पना नहीं की होगी कि हमारे राजनेताओं के समान निकृष्ट व्यक्ति सत्ता में होंगे. पिछले 60 सालों में हमारे बहुत पीछे से शुरुआत करने वाले देश हमसे बरसों आगे निकल गये, और हम भी देश से ऊपर अपनी जात-धर्म को रखे बैठें है.

असल में यह साजिश राजनेताओं की ही है, जो भूलने ही नहीं देती की कोई भी व्यक्ति किस जाती, किस धर्म का है. अगर वह भूलना भी चाहे तो बार-बार उसे याद दिलाया जाता है, टीवी पर, अखबार में, चुनाव पर, भाषणों में. लोगों को बताया जाता है कि तुम्हारी जाति, तुम्हारा धर्म खतरें में है. उनकी पहचान देशवासी नहीं, जाति और धर्म वालों के तौर पर गहरी की जाती है. फिर क्यों आश्वर्य होता है जब देश के लोग देश पर ही घात करते हैं?

क्या जिस जन्मभूमी को स्वर्ग से भी अधिक महान कहा जाता है, उस पर लगातार वही लोग प्रहार करते रहेंगे जिन्हें उसका पोषक बनाया गया?