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Tuesday, March 2, 2010

शिमोगा या यो कहें कि घुटन सिर्फ तस्लीमा के हिस्से में ही क्यों आती है?

तस्लीमा नसरीन ने बयान दिया कि कर्नाटक के अखबार में छपा लेख तो बहुत पुराना है, और छापा भी उनसे इजाज़त लिये बगैर है. तस्लीमा होकर जीना हिम्मत का काम है. तस्लीमा ने यह नहीं कहा कि लेख मैंने नहीं लिखा.

taslima Taslima, we apologize for those who didn’t understand.

वो अपनी बात कहना चाहती हैं. उनका लक्ष्य धर्म में पागल और अंधे हुये लोगों को इन्सानियत की कीमत समझाना है, इसलिये जब उनकी बात को ही बहाना बना जब बकवास, बेकार, घटिया और बेहद शर्मनाक बुर्के जैसी प्रथा की रक्षा के लिये जब इतने सारे पागल पैंट-शर्ट और अन्य आधुनिक पोशाकें पहन कर जान लेने-देने की तैयारी के साथ निकलते हैं तो तस्लीमा को महसूस हुये दर्द की व्याख्या मुश्किल है.

शिमोगा में मुस्लिम धर्मांधों के प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और बलवे में दो लोगो की हत्या कर दी गई. दंगे और हिंसक प्रदर्शन पूरे कर्नाटक में हुए. बुर्के के ऊपर उस लेख को छापने वाले अखबार के आफिस पर हमला किया गया जिसमें माल और व्यक्ति दोनों को ही क्षति पहुंचाई गई.

बुर्के के खिलाफ लिखने की कीमत दो लोगों की जान? और इसकी जिम्मेदारी. वो किसकी है?

मीडिया में उबाल है कि 'तस्लीमा के लिखे के कारण कर्नाटक में हिंसा भड़की'

तस्लीमा के लिखे लेख के कारण?

क्या इसकी ग्लानी तस्लीमा के हिस्से में है? यही नजर आता है हमारी पढ़े-लिखे लोगों से भरी समझदार मीडिया को? अगर हां तो क्यों न फैले धर्मांधता, क्यों न और भी बल मिले हत्यारों और आतंकियों और क्यों न अंधेरे, अवसाद और डर के और भी घने कोहरे में धंसते चले जायें हमारे चिंतक, विचारक और सुधारक.

कर्नाटक में भड़की हिंसा तस्लीमा के लिखे लेख के कारण नहीं भड़की,

  • वो भड़्की सदियों से चलती आ रही एक दमनशील रिवाज़ को थोपने वाले मानसिक रोगियों की असहिष्णुता से.
  • वो भड़की अपनी आजादी को भोगाने और दूसरों को उससे वंचित करने वाले विलासियों के कारण.
  • वो भड़की  दूसरों को जानवर की तरह कैद करने की मंशा रखने वालों की वजह से.

लेकिन मीडिया में क्या सुनते हैं हम? तस्लीमा नसरीन के लिखे लेख की वजह से हिंसा भड़की. क्योंकि तस्लीमा ने लिखा, और अखबार ने छापा.

कहीं भी मैंने नहीं देखा कि असहिष्णुता के कारण हिंसा भड़की.
कहीं भी मैंने नहीं देखा कि धर्मांधता के कारण हिंसा भड़की.
कहीं भी मैंने नहीं देखा की कुरीतियों के कारण हिंसा भड़की.

बुर्के का प्रतिवाद करो तो हिंसा भड़कती है कौन करता है हिंसा? बुरका पहने हुई महिलायें? या फिर बिना बुर्का पहने पुरुष जो महिलाओं को बुर्के में ही रखना चाहते हैं?

और क्या गलत लिखा तस्लीमा ने अगर उसने कहा कि यह मत करो. क्यों स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है उससे. क्यों नहीं स्पष्टीकरण मांगा जा रहा उन कठमुल्लों से जो कर्नाटक में बैठ कर लोगों को भड़का रहे हैं.

अगर सच बोलने पर हिंसा करने वालों की बजाय सच बोलने वालों पर सवाल उठाया जाता रहेगा तो कैसे जन्मेगा कोई दयानंद जिसने सति प्रथा पर सवाल उठाया, पर्दे पर सवाल उठाया, नारी अशिक्षा पर सवाल उठाया. और सवाल ही नहीं उठाया, समाधान किया.

सति प्रथा के खिलाफ अगर दयानंद और राममोहन रॉय की आवाज़ को भी इसी तरह भींचा जाता तो क्या हमारे देश की औरतें अब भी चिता पर होतीं? विधवायें आश्रमों में? और लड़कियां स्कूलों से बाहर?

क्या हमारा मीडिया इतना कायर है जो सच को जानते बूझते हुये भी सच नहीं कह सकता? या फिर इतना एक-पक्षीय? मैं समझ नहीं पा रहा हुं कि यह सब क्यों हो रहा है? किस तरह पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इतना अंधा हो गया.

बेहतर है अब कुछ दिन खबरें न देखूं.

Sunday, May 3, 2009

वो एक कमजोर कौम थी…

हिन्दू और यहूदी धर्म में वैसे तो कोइ समानता नहीं, लेकिन फिर भी आज दोनों धर्म समान धरातल पर खड़े दिखते हैं. यहूदी धर्म से जहां इस्लाम और इसाइयत दोनों का ही उद्भव हुआ, वहां हिन्दू धर्म तो खुद ही बहुत सारे धर्मों का समागम है, और भी कई दूसरे धर्मों का जन्म उससे हुआ.

दोनों ही धर्म पुराने हैं लेकिन जहां यहूदी धर्म अब धरातल से लगभग मिट चुका है (इसके सिर्फ 1 करोड़ बीस लाख मानने वाले ही दुनिया में हैं) वहां हिन्दू धर्म अब भी प्रबल रूप से जीवित है (लगभग 85 करोड़ मानने वाले). दोनों ही धर्म अब मुख्य रूप से एक राष्ट्र में सिमट चुके हैं और दोनों पर ही अब्रामिक धर्म (इस्लाम और इसाइयत) की टेढ़ी नजर है.

दोनों ही धर्मों का जोर प्रसार और लोगों को अपने धर्म में शामिल करने पर नहीं है.

किसी जमाने में यहूदी बेहद कमजोर कौम हुआ करती थी. यह कौम पूरे युरोप में बिखरी हुई थी और अमेरिका में अपना प्रभाव बनाना शुरु ही किया था. संख्या में कम, लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न और पढ़े-लिखे लोगों की यह कौम बहुत से इसाइयों की आंखों में खटकती थी. पूर्वाग्रह की हद क्या होगी यह इससे ही समझ सकते हैं कि शेक्सपीयर तक ने अपने नाटक मर्चेन्ट आफ वेनिस में यहूदी व्यापारीयों को खुल कर कोसा था. याद है आपको शाइलॉक? ये भी याद करिये कि जोर उसके उस खास वर्ग के होने पर बहुत था.

असल में इसाइयत का यहूदियों से पुराना बैर था, उनके नबी (जीसस) को भी आकर यहूदियों के कहने पर ही कत्ल किया गया था. बहुत दिनों तक इसाई यहूदियों द्वारा दमित भी रहे, लेकिन रोमन राजा के इसाई धर्म अपनाने के बाद इसाईयत का जोर युरोप में जो हुआ वह अब तक चालू है. धीरे-धीरे यहूदी और युरोप के बाकी धर्म हाशिये पर चले गये. यहूदी भी इस नई व्यवस्था में मिल गये. अब वह न शासक रहे न शोषक, वर्ण व्यवस्था में भी उनका स्थान दोयम था, लेकिन अपनी मेहनत लगन और अक्ल से वह समाज में आगे रहे.

लेकिन उनके पास न सामरिक शक्ति थी, ना राजनैतिक, और यह बात उन्हें बहुत महंगी पड़ी. द्वितीय विश्वयुद्ध में 30 लाख यहूदियों को हिटलर और दूसरे यहूदी विरोधियों ने मार दिया और यहूदी कुछ नहीं कर पाये. वह एक कमजोर कौम थी जिसपर जो चाहे, जैसा चाहे अत्याचार कर सकता था. हिटलर ने यह्युदियों को शहर से दूर अलग इलाकों में रहने पर मजबूर किया, और हर यहूदी को अपनी पहचान के लिये खास मार्क पहनना होता था (स्टार) जिस तरह आज तालिबानी पाकिस्तानी में इस्लाम को न मानने वालों को पहनना होता है.

यहूदियों ने बुरे दिन पहले भी देखे थे, लेकिन हर बार वो आगे बढ़ गये और पुराने दुख भूलते गये. लेकिन जिन्हें यह यहूदियों कि कमजोरी लगी, उन्होंने इसे कायरता सामझा. उस समाज में यह बात प्रचलित थी कि यहूदी में हिम्मत नहीं होती. वह डरपोक होता है. जबर मुस्लिम और इसाई दोनों ही इस कमजोर कौम को दबा-कुचल कर खुश थे.


यह मौसम्बी/संतरे नहीं यहूदियों को मारना चाहता है,
बेशक हिज्जे न आते हों, नफरत आती है


  1. यहूदियों ने एक भी युद्ध नहीं लड़ा.
  2. उनकी कोई सेना नहीं थी.
  3. वो सब के सब गैर सैनिक नागरिक थे जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध में पकड़-पकड़ कर मारा गया, उनके साथ कैम्पों में अमानवीय व्यवहार किया गया और गैस चैम्बरों में भर दिया गया.
बिना युद्ध लड़े एक कौम के 30 लाख लोगों की हत्या?
जो उस समय कुल यहूदी जनसंख्या की आधी थी!
मतलब एक कौम को आधा साफ कर दिया गया!

जिन कमजोर और बेबस यहूदियों को इतनी आसानी से मौत दी गई आज वह कहा हैं?
  • उनका प्रभुत्व अमेरिका की राजनीति पर है.
  • दुनिया का हर रैडिकल यहूदियों के नाम से कांप उठता है.
  • यहूदी लड़ाके दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक हैं.
  • यहूदीयों के अस्त्र-शस्त्र बहुत उन्नत हैं.
आज यहूदी ऐसी जगह रहते हैं जहां वो हर तरफ से दुश्मनों से घिरे हैं. फिर भी उनका वजूद प्रबल है. उनका हर दुश्मन उनसे घबराता है और उनके आगे पानी मांगता है.

क्यों?
क्योंकि 30 लाख लोगों को खोने के बाद यहूदियों ने फैसला किया –

Never again!

दोबारा कभी नहीं.

यही उनकी जीवनशैली है – दोबारा कभी नहीं!
आज के यहूदियों में मुझे कल के हिन्दुओं का चेहरा दिखाई देता है.
क्योंकि दुनिया में यह भी इतने ही अकेले हैं जितने की यहूदी. रैडिकल इस्लाम और इसाइयत का जितना दबाव हिन्दुओं पर पढ़ रहा है उसकी वजह से हिन्दू धर्म ने जो राह पकड़ी है वह शायद उसी मोड़ पर रुकेगी जिस पर आज यहूदी हैं.

Wednesday, April 22, 2009

धर्म ने दुनिया को क्या-क्या दिया

धर्म ने दुनिया को क्या-क्या नहीं दिया. आज जो भी कुछ है इस दुनिया में सब धर्म की ही वजह से है. धर्म न होता तो वह सब भी नहीं होता जो हमारी सभ्यता की निशानी है. फिर दुनिया शायद एक अलग ही जगह होती. लेकिन धर्म की वजह से वह सब है, जो ऐसे नहीं होता. क्या-क्या नहीं दिया धर्म ने दुनिया को.

दिया:

1. पुराने कबीलाई असभ्य अत्याचारी कानूनों को शरिया, या धार्मिकता के नाम पर लागू कर मानवों से आधारभूत स्वतंत्रता भी छीन लेने का हक.

2. जाति के नाम पर धर्म के बंटवारे से पूरे समाज में इतनी बड़ी खाईयां जिन्होंने इन्सान को इन्सान नहीं क्षत्रिय, ब्राह्मण, बनिया, शूद्र बना दिया, और इतने पूर्वाग्रह हर जाति के अंदर भर दिये कि उनसे बाहर निकल कर इन्सान को इन्सान समझना मुश्किल हो गया.

3. अपने धर्म के प्रसार के लिये हर जायज नाजायज तरीके का इस्तेमाल करना और उसे सही समझना.

विज्ञान ने दुनिया को उर्जावान किया और धर्म ने शक्तिहीन. विज्ञान की ऊर्जा का इस्तेमाल धर्म ने युद्ध के लिये किया. अब धर्म इस मोड़ पर मानव सभ्यता को पहुंचा चुका है कि इसी रास्ते पर आगे चलने की कीमत अपनी सभ्यता खोकर ही चुकानी होगी.

जिस धर्म में नये तौर-तरीकों के कपड़े पहनना मना है, नये मनोरंजन के साधन इस्तेमाल करना मना है, नये युग में जीना मना है, वो बड़ी आसानी से नये तरीके के हथियार, असले और युद्ध सामग्री इस्तेमाल कर लेता है, और उसमें उन्हें कोई कोन्ट्राडिक्शन नहीं दिखता.

क्या एटम बम का वजूद मात्र ही इस बात का सबूत नहीं है कि

खुदा नहीं है

भगवान नहीं है

ईसा नहीं है

और भगवान का हर वो रूप नहीं है जिसे हमने माना

तो कब तक इस झूठ के सहारे इन्सानों पर अत्याचार होगा?

allbornatheiststheistarcj1

Friday, March 27, 2009

क्या आपको 25 करोड़ रुपये चाहिये?

हां, सचमुच. 25 करोड़ रुपये आपकी गिरफ्त में बस आना ही चाहते हैं. आप तो बस सोचना शुरु कर दीजिये की इनका करना क्या है. कौन सा बंगला आप खरीदेंगे, अपनी मर्सिडीज़ कहां रखेंगे, या फिर आपको फैरारी चाहिये? तो अब आप जानना चाहते हैं कि 25 करोड़ के लिये क्या करना होगा? कौन सा क्विज शो दे रहा है यह इनाम?

gunmasterगनमास्टर को मिलेंगे करोड़ों

तो चलिये बता देते हैं. यह है ‘The great Maulana Taukeer sweepstakes’ और इस रकम को आपके देने के लिये बकौल मौलाना तौकीर रजा, हर सच्चा मुसलमान एक-एक रुपया मिलाने वाला है.

आत्मविश्वास से लबरेज मौलाना साहब ने काम दिया है जार्ज बुश का सर लाने का. वो कहते हैं सर लाने वाले को हिन्दुस्तान के सारे मुसलमान पैसे जोड़कर 25 करोड़ रुपया देंगे जो सच्चे मायनों में कोई छोटी रकम नहीं है यहां तक की खासी अमीर अमेरिकी सरकार भी ओसामा बिन लादेन पर सिर्फ 13 करोड़ रुपये (25 मिलियन डालर) का इनाम देने में ही खुद को समर्थ पा सकी.

तो अगर आप मौलाना तौकीर रजा की यह छोटी सी शर्त पूरी कर सकें तो यह मोटी से रकम आप कब्जा सकते हैं. वैसे जार्ज बुश अब अमेरिकी राष्ट्रपति भी नहीं रहे, अब तो सुरक्षा घेरा पहले जैसा नहीं होगा.

अच्छा अगर आप सोच रहे हों कि अगर काम निकाल के मौलाना तौकीर बात से मुकर गये तो? तो बिरादर चिंता न करें. मौलाना सच्चे मुसलमान कहते हैं खुद को जो कौल से नहीं फिरते.

इतने सच्चे हैं यह, और अपने समाज में इतने मशहूर कि इनके मुहल्ले में इनके ईमान की कसमें यहां-वहां छोटी-मोटी बातों पर लोग खाते मिल जायेंगे. इसलिये कांग्रेस (हां जी वही UPA की सबसे मोटी पार्टी) ने इन्हें लोकसभा चुनाव में साथी बना लिया.

क्या आप आश्चर्यचकित हैं? बुश के सर कटवाना गलत लगता है? तो भाई आपको लगे तो लगे, कांग्रेस को कोई शिकायत नहीं. उन्हें हिन्दुओं की सांप्रादायिकता से शिकायत हो तो हो, इस्लामिक सांप्रादायिकता तो वैलकम, वैलस्टे, वैलडन है.

तो जी हाथ कटवाने वाले वरुण गांधी को जेल भेज देते हैं, और गला कटवाने वाले तौकीर मिंया को लोकसभा चैंपियन बना देते हैं. और बिरादर अगर आप इस मुगालते में हो की कांग्रेस वाले जानते ही नहीं थे तो आज शाम को ही सिंघवी भैया बोल रहे थे टीवी पर की ऐसे (मौलाना के) ‘बयानों से हम सहमत नहीं.’ बयानों से सहमत नहीं. मौलाना से सहमत हैं. यह तो सही है. बाइबल में भी लिखा है पाप से नफरत करो, पापी से नहीं. तो कांग्रेस इधर के पापियों को भरपूर प्यार दे रही है.

और अगर आपका 25 करोड़ से दिल न भरे, तो कुछ और इनाम भी हैं जिन्हें आप कब्जा सकते हैं.

Lars Vilks – 100,0000 Dollars (5 करोड़ रुपये) और ये 5 करोड़ और
Ulf Johansson – 50,000 Dollars (2.5 करोड़ रुपये)
Salman Rushdie – Pound 80,0000 and $150000
Taslima Nasrin – 5 Lakh Rs
Ehud Barak, Amos Yadlin, Meir Dagan - $1 Million (5 करोड़ रुपये)
Rod Parsely - $50,000. (2.5 लाख रुपये)

मतलब इस धंधे में तो माल ही माल है. और हां साथ में जन्नत की stay फ्री. जन्नत कहां? वहीं जहां खूबसूरत कुंवारी हूरें मिलती हैं.

Saturday, March 21, 2009

क्योंकि प्रभू ईसा को मानने वाले हत्या कर ही नहीं सकते

यीशू ने अपना खून बहाकर सबको बचाया. उन सबको जो उनपर विश्वास करते हैं, जो कहते हैं कि हे मेरे आसमानी बाप तूने अपना बेटा भेजा कि वो हम पापियों को बचा सके. लेकिन यीशू के अनुयायी हमें बताते हैं कि बचाया सिर्फ उन्हीं पापीयों को है जिन्हें यीशू के बचाने पर यकीन है. बाकी पापी सड़ेंगे अनंत नर्क की आग में.

fire

सही है, दयावान यीशू ने हमें बचाया, और सिखाया कि हिंसा मत करो, दया करो, प्रेम करो, अपने दुश्मन से भी प्रेम करो.

तो यीशू के अनुयायियों ने यह सीख लिया. इसलिये उन्होंने कभी किसी की हत्या नहीं की (वैसे करते भी तो भी चलता क्योंकि प्रभु यीशू ने पहले ही सारे पाप माफ कर रखे हैं).

- न तो उन्होंने अफ्रीका में लाखों लोगों को गुलाम बनाने के लिये और कई लाखों का कत्ल किया,
- न उन्होंने मेक्सिको और पूरे साउथ अफ्रीका में फैले आज्टेक और माया प्रजाती के लोगों की हत्या सिर्फ इसलिये की क्योंकि उन्होंने ईसा पर विश्वास नहीं किया,
- उन्होंने लाखों मूल अमेरिकियों की भी हत्या नहीं की, और उनके मूल धर्म का समूल विनाश भी नहीं किया.
- उन्होंने मध्य एशिया के मुसलमानों के खिलाफ 'क्रूसेड' (धर्मयुद्ध/जेहाद) भी नहीं किया, और उसमें करोड़ों लोगों को मारा नहीं.
- आज भी कोई इसाई समुदाय धर्म के लिये कहीं कोई हत्या या हिंसा नहीं करता

इसलिए जब ओड़िसा की सरकार कहती है कि प्रभात पाणीग्रही की हत्या में इसाईयों का हाथ नहीं था तो दिल बिना किसी दिक्कत के स्वीकार कर लेता. इतने उज्ज्वल अतीत और उससे भी ज्यादा उज्ज्वल वर्तमान वाला यह धार्मिक समुदाय हत्या कर ही नहीं सकता.

इसलिये न तो लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या में इसाई हाथ था, और न इसी हफ्ते हुई संघ के प्रभात पाणीग्रही की हत्या में इनका हाथ होने की कोई संभावना है (इसलिये पुलिस से आशा भी मत करिये इस दिशा में जांच की, क्योंकि जब ऐसा हो ही नहीं सकता तो पुलिस वाले क्यों अपना समय वहां बरबाद करें). तो जांच हो रही है और कातिल भी इसाई धर्म से इतर कहीं न कहीं मिल जायेंगे.

लेकिन शायद हिन्दुओं को ईसा संदेश नहीं पहुंचा है. इसलिये यह बर्बर हिन्दू उतारू हैं इसाईयों की हत्या पर. इसाई कुछ नहीं करते, लेकिन फिर भी पगलाये हिन्दू उन्हें सता रहे हैं.

यकीनन इतनी बर्बरता असहनीय है और बीजद के नवीन पटनायक भी यह सह नहीं पाये. क्योंकि ये सारे बर्बर हिन्दू बीजेपी की पैदाइश हैं इसलिये बीजद ने बीजेपी से छुटकारा पाना बेहतर समझा. अब उन बेचारे इसाईयों को वह यह संदेश दे सकते हैं कि भाई तुम्हारे हिन्दुओं की हत्या न करने में हमारा पूरा सहयोग रहेगा.

वैसे यह भी बता दूं कि निरीह इसाई विरोध की यह अजब-गजब बीमारी ओड़िसा के हिन्दुओं को कैसे लगी. असल में हिन्दुओं में जो दो-चार इन्सान हैं वो कूद-कूद कर, बच-बचाकर, किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर इसाई बनना चाहते हैं, और हिन्दू उन्हें बनने नहीं दे रहे हैं.

घोर अधर्म है यह. न तो इसाई किसी तरह का प्रलोभन दे रहे हैं, न वो कुप्रचार का सहारा ले रहे हैं, न वो झूठे चमत्कार और नकली 'चंगाई' फैला रहे हैं, न वो पैसा बांट रहे हैं, न वो भोले आदिवासियों को बरगला रहे हैं, फिर भी पागल हिन्दू उनके खिलाफ चिल्ला रहे हैं.

वैसे ज्यादातर लोगों को शायद प्रभात पाणीग्रही की हत्या के बारे में पता भी न हो. प्रभात पाणीग्रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता थे जिन्हें दो दिन पहले 20 लोगों ने आ कर गोली मार दी वो लोग जो जो यकीनन इसाई नहीं थे.

अखबारों में बहुत पढ़ा होगा कि कंधमाल में इसाइयों को गांव में घुसने नहीं दे रहे, यह नहीं करने दे रहे, वह नहीं करने दे रहे. फीचर पर फीचर छपते हैं. लेकिन प्रभात पाणीग्रही की हत्या की बात किसी बड़े अखबार ने उस तरह नहीं उठाई जिस तरह वह एक निरीह इसाई के गांव बदर होने की बात करते हैं.

जाते-जाते कुछ लिंक दे चलूं, कि आप खबर तो जानें

और भी जाते-जाते एक खबर और – पोप ने कहा की अंगोला के लोग अपना धर्म छोड़ कर इसाई बनें

Friday, February 6, 2009

जय हिन्दू संस्कृती! हमने यही सीखा है कि मारें महिलाओं को

screamवाह रे गजब हिन्दू संस्कृति सनातन धर्म की सनातन प्रथा को ही पूज रहे हैं श्रीराम सेनी और बजरंगी. पहले श्री राम चन्द्र की सेना वालों ने जय श्री राम! के नारे लगाकर पब रूपी लंका पर आरोहण कर दिया और क्या तीर मारा? नारियों को रगेद-रगेद के मारा.. वाह रे श्रीरामियों खूब सेना बनाई रे तुमने... बहुत सही प्रेक्टिस रन है... पहले औरतों को पीट कर अभ्यास हो जाये तो पाकिस्तान पर भी हमला करेंगे... सही प्रोग्रेस है भाई.

राम की सेना ने कूच कर दिया तो बजरंगी कहां पीछे रहते वो भी निकल पड़े आखेट पर, एक लड़की को बस से उठा लिया और पीट लिया, अब अपन हिन्दू धर्म की रक्षा लड़कियों को पीट कर ही होगी?

क्या यही सीखा है श्रीराम सेना वालों ने राम कथा से?
राम से जिसने अपनी विमाता को दिये वचन को निभाने के लिये 14 साल वन में काटे?

क्या बजरंग का नाम लेने वाले उसी महाबली का धर्म निभा रहे हैं?
जिसने अकेले दुश्मन देश में घुसकर उनसे लोहा लिया और जिसने ताजिंदगी हर नारी को मां का दर्जा दिया?

यह श्रीराम और बजरंग का नाम बदनाम करने वाले यह गर्दभ-बुद्धी लोग तो उन से भी ज्यादा हिन्दू धर्म की मूल अवधारणा को नुक्सान पहुंचा रहे हैं जो इसे दिन-रात गरियाते हैं.

-- हिन्दू धर्म की अवधारणा में सबसे बड़ी बात है स्वतंत्रता. हम चाहे किसी देव, किसी रूप को पूजें-मानें, तब भी हिन्दू रहेंगे. मतलब चाहे हम मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के भक्त हों, या कापालिक काल-भैरव के, हम हिन्दु हैं और धर्म की हानी नहीं.

-- देवी चंडिका पर तो शराब की भेंट भी चढ़ती है, तो किस तरह किसी भी औरत के शराब पीने से हिन्दु धर्म या सभ्यता की हानि हुई?

असल में हिन्दू धर्म में नारी को पुरुष से कम दर्जा नहीं दिया गया. हमारे ग्रन्थों में नारियां हर वो काम करती हैं जो पुरुष करते हैं, और ससम्मान, बिना ग्लानी करती हैं. ऐसे धर्म को मानने की बात करने वाले यह गलीज़ हरकत किस तरह कर पाये?

असल में इसमें भी हिन्दुओं की कमजोरीयों का इतिहास छुपा है. आक्रांताओं से अपने घर-परिवार की रक्षा न कर पाने वाले कायरों ने वह सारे नियम बनाये जिनसे स्त्रियों को पर्दे में, छुपा कर, सबसे नजर बचाकर रखें, और उनकी कायरता का बोझ अब तक हम ढो रहे हैं.

अगर श्रीराम सेना और बजरंगी सत्य में राम व महाबली हनुमान के अनुयायी होते तो लोहा लेते शराब बनाने वालों से, उसके स्टाकिस्टों से, शराब बेचने वालों से, पब मालिकों से, व पब में पीने वाले मर्दों से (जिनका अनुपात नारियों कि तुलना में 1:100 है)

और जिन्होंने उन लड़कियों पर हमला किया, उनका क्या कहना... वो तो पुरुष ही नहीं... महा@#$% हैं...

(थोड़ा नहीं, बहुत नाराज़ हूं... यह देख कर शर्म आती है कि हमने किस पथ पर चलना शुरु कर दिया. किससे सीख रहे हैं हम? उनसे जिन्हें हम कहते हैं यह गलत है ऐसा मत करो?)

Sunday, December 14, 2008

पाकिस्तान से मिले कुछ ख़त जिन्हें पढ़ना बहुत ज़रूरी है

मुम्बई के बम विस्फोट के बाद बिना कुछ भी भूले अपने काम में लगा ही था कि कुछ अजीब से खत पकिस्तान से मिले. इन्हें पढ़ा तो बहुत बैचेनी महसूस हुई. समझ नहीं आता कि क्या निष्कर्ष निकालूं. जेहन की बात दिल नहीं मानना चाहता. लेकिन कहीं-न-कहीं एक छोटा शक सा घर कर गया है कि इस्लाम कठमुल्लों के चंगुल में इतना गहरा फंस गया है कि अब निकलना मुश्किल है.

असल में इनकी शुरुआत बहुत पहले हुई. कुछ महीनों पहले एक सामान पाकिस्तान के लोगों ने भी इन्टरनेट के द्वारा उस फर्म से खरीदा जिसमें मैं काम करता हूं. ये तो एक इन्टरनेशनल बिज़नेस ट्रांसेक्शन था जैसा अमेरिका और युरोप और विश्व के बाकि देशों के साथ हमारा होता ही रहता है. तो इसी दौरान मेरी उस खरीददार से ई-मेल पर काम के सिलसिले में बात हुई. और जैसा कि हमें पता है outlook express में जब भी हम किसी को जवाब देते हैं तो उस व्यक्ति का ई-मेल पता अपने-आप हमारी outlook एड्रेस बुक में आ जाता है. तो शायद मेरा पता भी पाकिस्तान के उस व्यक्ति की एड्रेस बुक में दर्ज होगा.

बम विस्फोटों के बाद उस लाहौर के इस सोफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी एड्रेस बुक में दर्ज सभी लोगों को एक ई-मेल भेजी जो शायद उसके इरादे के बिना मुझे भी मिली क्योंकि उस एड्रेस बुक में मैं भी था. उस ई-मेल का टाइटल यूं था...

*****************************************

"Muslim Students in Indian University... Plz see attachment"

M**** A*****

[सारे नाम छुपा दिये गये हैं.]

और साथ में एक विडियो attached था, उसे आप यहां से देख सकते हैं. (जो लोग आसानी से परेशान हो जाते हैं, वो न देखें)

http://esnips.com/web/noiwontshutupstuff

इस विडियो में भीड़ को कुछ लोगो को बुरी तरह मारते दिखाया है और पुलिस तमाशा देख रही है. सुझाव यह है कि भीड़ जिन्हें मार रही है वो लोग मुस्लिम हैं. और उनका गुनाह है कि वो लोग मुस्लिम हैं.

विडियो को देखकर बैचेनी से भर उठा, लेकिन इस तरह की कोई काम मुसलमानों के खिलाफ हुआ है, उसपर मुझे यकीन न था. शायद उस लिस्ट में बाकी 1-2 हज़ार लोगों में भी ऐसे कुछ लोग होंगे जो अभी तक rational हों. तो उनमें से एक ने सारी लिस्ट को एक ई-मेल भेजी.

A***, I dont think its related to muslims as  i have seen this video from some other source one month back and that source explains it as the clash between university groups which happens everywhere in the world. Please do confirm and update all of us.

regards,
I****** H*******

अनुवाद:
आ****, मुझे नहीं लगता कि इसका मुसलमानों से कोई वास्ता है क्योंकि एक महीने पहले मुझे यह कहीं और से मिली और वहां से पता लगा था कि इसमें युनिवर्सिटी के कुछ ग्रुपों कि लड़ाई है, जो सारी दुनिया में हो सकती है. कृपया बात को साफ करके हम सबको बतायें.

इस इन्सान कि मेल पढ़कर मुझे कुछ सुकून सा महसूस हुआ. मैंने नीचे दी गयी मेल उस लिस्ट के सभी लोगों को भेजी.

I have heard no reports of any violent incident against muslims in India after the bomb attacks. This could be negative propaganda. I think negative propaganda of any kind (against India, or against Pakistan) hurts both our countries.

Hopefully, we will be able to restrain ourselves and refrain from contributing in spreading any hate.

Peace to Earth.

Regards

अनुवाद:
मैंने मुम्बई बम धमाकों के बाद मुसलमानों के खिलाफ किसी भी हिंसक कार्यवाही की खबर नहीं सुनी. यह दुष्प्रचार लगता है. मुझे लगता है कि किसी भी प्रकार का दुष्प्रचार (हिन्दुस्तान, या पाकिस्तान के खिलाफ), हम दोनों के देशों को नुक्सान पहुंचाता है.

आशा है कि हम खुद पर काबू रख पायेंगे, और नफरत को फैलाने में मदद करने से बचेंगे.

धरती पर शांती हो.

मेरी मेल का जवाब कुछ यूं मिला.

Hi,
Yes we agreed that most of the people in both sides do a lot of negative propoganda but this is a fact that there are 39 separation groups fighting in INDIA and the only reason is indian hindu mentality

F***** I*****

अनुवाद:
हां हम मानते हैं कि दोनों तरफ के लोगों द्वारा बहुत सारा दुष्प्रचार किया जाता है, लेकिन यह सच्चाई है कि हिन्दुस्तान में 39 अलगाववादी संगठन काम कर रहे हैं और सिर्फ इसका एक कारण है -- हिन्दू मानसिकता.

मैंने इसका जवाब यूं दिया

Hello,
I wonder how many separatist groups are fighting in Pakistan? Is it any less hurt by terrorism than India? Sitting from the other side of the fence, you can't judge what kind of 'mentality' is the hindu mentality. That's just another term you can coin, like the americans have coined 'islamic terror'.
Think about that please.

अनुवाद:
और कितने अलगाववादी संगठन पाकिस्तान में कार्य कर रहे हैं? क्या पाकिस्तान को आतंकवाद ने हिन्दुस्तान से कम नुक्सान पहुंचाया है? दीवार के उस तरफ बैठकर आप कैसे जान सकते है कि किस प्रकार की 'मानसिकता' हिन्दू मानसिकता है. यह तो एक शब्द है जो आपने बना लिया, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अमेरिकीयों ने मुस्लिम आतंकवाद बनाया.

कृपया इस बारे में सोचिये.

इस मेल का कोई जवाब नहीं आया. लेकिन I**** H**** की मेल का जवाब एक कठमुल्ले ने कुछ यूं दिया.

Just like there is a Muslim for the sake of Allah, there is a new phenomenon of a Muslim for the sake of the disbelievers. And just like the Muslim for the sake of Allah does everything thinking what will Allah will think of me, the Muslim for the sake of the disbelievers does everything thinking what the disbelievers would think of him. So when a Muslim speaks out he does so to please Allah and when our other Muslim does not speak out he does so in order to please the disbelievers. When a Muslim fights he does so for the sake of Allah and when this other Muslim does not fight -even though he has every reason to do so- he does that in order not to displease the disbelievers. Obviously this is not expressed as such but is packaged in nice terms such as 'this is not good for dawa', or 'this would turn away the people from Islam'.
Allah says: "It is not your responsibility to guide people but it is Allah who guides whomever He wills"
This Muslim is obsessed with his image in front of the disbelievers. He is so obsessed with it that it becomes his standard for wala and bara. So he loves the Muslims who present the 'good boy' image to the disbelievers and he despises the Muslims who give Muslims a 'bad name'.
Rasulullah (saaws) says: One of you does not achieve full Imaan until he loves for Allah, dislikes for Allah, gives for Allah and holds back for Allah.
This Muslim is so aggressive and intolerant with his fellow Muslims but is tolerant and kind towards the disbelievers. He is an extremist with Muslims and a moderate with disbelievers.
Whenever the interests of the disbelievers are threatened or harmed by Muslims he is the first to jump to their defense. He would speak against his brothers and betray them. He may even advise Muslims to spy against one another and report to the authorities. For him fighting for Islam, and for the ummah is terrorism, but he manages to shop for a fatwa that would allow him to serve in the armies of the disbelievers and fight against his brothers. Being a Muslim for the sake of the disbelievers permeates his every action. If he meets a Muslim he frowns and if he meets a disbeliever his face beams with a smile.
Infact there are some Muslims who are so much Muslim for the sake of kuffar that they do not even like Muslims who call the kuffar kuffar!

A***** M*****

अनुवाद: (यह है कठमुल्लों के विचार)
जिस प्रकार कुछ मुसलमान अल्लाह के लिये होते हैं. आजकल एक मुसलमानों कि एक नई पैदावार काफिरों के लिये भी हो रही है. और जिस प्रकार अल्लाह का मुसलमान हर काम यह सोचकर करता है कि अल्लाह इसके बारे में क्या सोचेगा, काफिरों का मुसलमान हर काम यह सोच कर करता है कि काफिर उसके बारे में क्या सोचेंगे. अल्लाह का मुसलमान अल्लाह को खुश करने के लिये बोलता है, और दूसरा मुसलमान जब बोलता है तो काफिर को खुश करने के लिये. एक मुसलमान लड़ता है अल्लाह के लिये, और दूसरा लड़ता ही नहीं है, जब कि हर कारण है -- वो ऐसा करता है कि काफिर नाराज़ न हों. जाहिर है इस बात को अच्छे शब्दों में कहते हैं, जैसे कि यह इस्लाम के लिये अच्छा नहीं है, या यह लोगों को इस्लाम से विरत करेगा.

अल्लाह ने कहा है - "तुम्हारी जिम्मेदारी लोगों को रास्ता दिखाने की नहीं है, क्योंकि अल्लाह जिसको रास्ता दिखाना है, दिखा देता है."

यह मुस्लिम काफिरों के सामने अपनी इमेज के लिये परेशान रहता है. He is so obsessed with it that it becomes his standard for wala and bara. इसलिये वो उन मुसलमानों को प्यार करता है जो काफिरों के सामने 'अच्छे लड़के' की इमेज प्रस्तुत करते हैं, और उन्हें नफरत करता है जो मुसलमानो को 'बदनाम' करते हैं.

रसूल-अल्लाह ने कहा है: तुममें से एक भी पूरा ईमान तब तक नहीं प्राप्त कर सकता जब तक वो अल्लाह के लिये प्यार न करे, अल्लाह के लिये नफरत न करे, अल्लाह के लिये सर्वस्व न दे, और अल्लाह के लिये देने से इंकार न करे.

काफिरों का मुसलमान अपने साथी मुसलमानों के लिये हिंसक और intolerant होता है, लेकिन काफिरों के लिये tolerant और दिलदार. वो अतिवादी है मुसलमानों के साथ, और मोडरेट है काफिरों के साथ. जब भी काफिरों को मुसलमानों से कोई भी नुक्सान होने की संभावना हो तो वो उनके बचाव के लिये कूद पड़ता है. वो अपने भाई के खिलाफ बात करता है, और उसे धोखा देता है. वो मुसलमानों को मुसलमानों पर ही जासूसी करके प्रशासन को इत्तला देने के लिये उकसा भी सकता है. उसके लिये इस्लाम और उम्माह के लिये लड़ाई आतंकवाद है. लेकिन वो उस फतवे का इंतजाम कर लेता है जिसमें उसे काफिरों की फौज में भर्ती होकर अपने भाई के खिलाफ लड़ने की इजाजत मिल जाये. काफिरों का हित उसके हार कार्य में झलकता है. अगर वो किसी मुसलमान से मिले तो भौहों में बल पड़ जाते हैं, लेकिन काफिर से मिलने पर चेहरे पर खुशी आ जाती है.

यहां तक कुछ मुसलमान कुफ्र के इतने हिमायती हैं कि वह उन मुसलमानों को भी नापसंद करते हैं जो कुफ्र को कुफ्र कहते हैं.

मुझे तरस आता है I***** H***** पर. यह मेल A**** M**** ने लिस्ट के सभी आदमियों को CC की थी.

अब एक मेल इस सारी बातचीत की शुरुआत करने वाले, यानी वीडियो भेजने वाले लाहौरी सोफ्टवेयर इंजीनियर ने भेजी.

Dear All,
specially Ishfaq Bhai

Yeah I am not sure about the video I forward to you people. But, we all know that Indian Hindus are always being very extremist against Muslims. Indian media is representing inverse picture to the world. I believe India is involve in most of terrorist activities in Pakistan. They are using Innocent people for their purpose after brain washing them or cashing their situation. As most of them have lost their families during all this and they are blind out of mind out of religion. Thousands of people in Pakistan have lost their lives and people have proved the out of border intervention.

But Pakistanis needs very strong and confirmed evidence against India. Why, I said why. If Indian, American etc have negatively presented the Muslims all our the world without any proof [which has been found very effective].  Then why we need evidence, even we know that they are actually doing that. Why Pakistani govt and people always being ignorant and silent.

Then I want to say that even if it was some other issue. We have to present Hindus this way. I can go for propaganda even.

Regards,
M**** A*****

अनुवाद:
हां मुझे इस वीडियो पर पूरा यकीन नहीं है. लेकिन हम सभी को पता है कि हिन्दुस्तान के हिन्दू मुसलमानों के खिलाफ हमेशा अतिवादी रहे हैं. हिन्दुस्तानी मीडिया तस्वीर को उलट कर दुनिया को दिखा रही है. मुझे लगता है हिन्दुस्तान का पाकिस्तान में हुई ज्यादातर आतंकवादी कार्यवाहियों में हाथ है. वो लोग निर्दोषों का इस्तेमाल उन्हें ब्रेनवाश कर, या उनकी स्थिति का फायदा उठाकर कर रहे हैं, क्योंकि उनमें से ज्यादातर ने अपने परिवारों को इस के दौरान खो दिया है, और धर्मांधता में वो अंधे हो गये हैं. पाकिस्तान में हजारों लोगों ने अपनी जानें गंवा दी हैं, और बार्डर पार का हाथ होना लोगों ने साबित कर दिया है.

लेकिन पाकिस्तानियों को हिन्दुस्तान के खिलाफ बहुत मजबूत सबूतों की जरुरत है. क्यों? मैंने कहा क्यों? जब हिन्दुस्तानी, अमेरीकी, आदी मुसलमानों की गलत तस्वीर दुनिया को दिखा रहे हैं बिना सबूतों के [जो कि बहुत effective रहा है]. तो हमें सबूत क्यों चाहिये, जबकी हमें पता है वो ऐसा कर रहे हैं. पाकिस्तानी शासन और अवाम हमेशा अनजान और चुप क्यों है?

तो मैं यह कहना चाहता हूं कि चाहे बात कूछ और भी हो, हमें हिन्दुओं को इसी तरह से दिखना है. मैं दुष्प्रचार भी कर सकता हूं.

फिर एक मेल कुछ यों आई

aslam u alaikum A****
kindly try to avoid sending such conent emails, this can be harmful for heart patients ( young ppl can also be heart patients but not aware of it as they might not have consulted a doc for complete diagnosis).

i, myself, felt really bad the whole day after watching this video.

regards,
M***** M****

अनुवाद:
अस्सलाम उ आलेकुम A****
कृपया इस तरह की चीजें भेजने से बचो, यह दिल के मरीजों के लिये घातक हो सकता है (जवान लोग भी दिल के मरीज हो सकते हैं, और उन्हें डाक्टर से मिले बिना इसका पता भी नहीं हो)

खुद मुझे सारे दिन बुरा लगा इस वीडियो को देखकर

और इस बातचीत में आखिरी मेल जो दो दिन पहले मुझे मिली थी, वो यूं थी

AOA all,
Yes we should not post these kind of things, this will lead younger generation to wrong direction. My brother was sitting with me and I asked him to see what indians doing with muslims in india, after watching this video, he got disturbed and could not sleep all night and other day he asked me we should stop all this, and he said I want to do Jehad against them after watching this video.
So kindly dont post such things with the name of Islam as this will be harmfull for Younger generation.
Thanks
U*****

अनुवाद:
हां हमें ऐसी चीजें नहीं डालनी चाहिये, इससे नई पीढ़ी गलत दिशा में भटक सकती है. मेरा भाई मेरे साथ बैठा था, और मैंने उससे कहा कि देखो हिन्दुस्तानी मुसलमानों के साथ क्या कर रहे हैं. उस वीडियो को देखकर वो इतना परेशान हो गया की सारी रात सो नहीं पाया, और दूसरे दिन उसने मुझसे कहा कि हमें इस सब को रोकना चाहिये, और उसने कहा कि वो उन के खिलाफ इस वीडियो को देखने के बाद जेहाद करना चाहता है.

तो कृपया इस्लाम के नाम पर इस तरह की चीजें डालना बंद करो, क्योंकि यह नई पीढ़ी के लिये नुक्सान देह है.

********************************************************

यह बातचीत बेवकूफ आतंकवादियों के बीच नहीं, बेहद पढ़े-लिखे, जिम्मेदार, समाज के उच्च वर्ग के लोगों के बीच थी.

मैं इस सब को पढ़कर इतना परेशान हो जाता हूं कि सोचना बंद कर देता हूं. अब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूं... न ही लगता है पहुंच पाऊंगा. बस अब एक फैसला कर लिया है कि किसी पाकिस्तानी से कोई व्यापार में हिस्सा नहीं लूंगा ताकी इस तरह की चीजें फिर न देखने को मिले और मैं अपने मिथकों में जी सकूं.

Monday, October 6, 2008

विश्वास धर्म का आधार है, और शत्रु भी

कितनी विरोधाभासी बात है न. विश्वास (Faith) तो धर्म तो वो नींव है जिस पर धार्मिकता की कमजोर इमारत खड़ी है. यहां तो सब कुछ विश्वास भरोसे चल रहा है, तो फिर कैसे यह विश्वास ही धर्म का सबसे बड़ा दुश्मन हो सकता है?

धर्म कि कुछ बातें ऐसी हैं, जो सभी जानते हैं कि कोरी गप्प हैं
पुष्पक विमान के उड़ने की बात, मोसेस के समुद्र फाड़ने की बात, जीसस के पुनर्जीवन की बात, पुल सुरात, हूरें, जिन्नात. ये सारी बकवास अलग-अलग नामों के साथ हर धर्म का हिस्सा हैं. जब कोई पादरी, पंडा या मौलवी इन पर विश्वास करने को कहता है तो किसी समझदार आदमी का दिल कैसे न करे की थप्पड़ बजा दें? लेकिन फिर भी इन गप्पों को सुनना पड़ता है.

कुछ भोले-बकस इन बातों पर यकीं कर भी लेतें हैं, लेकिन उनको भी विश्वास डांवाडोल ही रहता है, वरना जिस तरह इब्राहिम ने खुदा पर विश्वास करके अपने बेटे की बलि दी, उस तरह सभी पूरे ईमान वाले लोग कर सकते थे. यहां राजा बलि भी डाल सकते हैं.

फिर भी इन गप्पों को सच मानने का स्वांग क्यों?
जो बेवकूफियां समाज में न सिर्फ स्वीकार्य हों, बल्कि प्रोत्साहित भी हों, उनको करने में कैसा डर. कुछ समाज में अपनी छवि के लिये, कुछ इस डर से कि 'कहीं ऐसा हो ही न' लोग धार्मिक कथाओं पर विश्वास दिखलाते हैं. यहां वो कहानी सटीक है जिसमें एक आदमी नाक कटने पर स्वांग करने लगता है कि उसे प्रभु दिख गये, और इस चक्कर में पूरे शहर की नाक कटवा डालता है.

धर्म की हानी इसी में है कि उसकी कोशिश हर सवाल का जवाब बनने की है
इन्सान को पहले नहीं मालूम था की पृथ्वी गोल है कि चौकोर, सृ्र्य के चारों और घूमती है, या सूर्य उसके चारों और, उत्पत्ति कैसे हुई. तो जब ये सारे गुनाहों का गुनाहगार कोई न मिला तो खुदा के सर मढ़ दिये. की ले हर बात का तू ही जवाबदेह.

इन सारे सवालों का जवाब ढूढ़ने जब चिलम सुलगाकर अपने धार्मिक मसीहा बैठे तो कल्पना की उड़ानें बहुत दूर तक निकल गईं. तो धर्म-ग्रंथों में पृथ्वी चौकोर हो कर हाथियों पर सवार हो गई, जो खुद एक बड़े कछुये पे सवार थे. फिर तो एक सवाल का जवाब क्या सुझा, गुरुजनों ने हर सवाल के लिये कछुये टाइप के explanation निकाल लिये.

आजकल पादरी, मौलवी, पंडे इन बातों का ज्यादा जिक्र नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि पब्लिक हंसेगी. लेकिन शान से कहते हैं कि भगवान बहुत बड़ा है. बेशक यह भी उन्होंने उसी किताब से सीखा है जहां लिखा है की सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगा रहा है.

जिस दिन लोग समझ जायेंगे की जिन अकाट्य धर्म-ग्रंथों की एक बात झूठ हो सकती है, उसकी सभी बातें झूठ हो सकती हैं, उस दिन इन पंडो-मौलवियों की दुकान उठ लेगी.

ज्यादातर लोगों को स्वीकार नहीं धर्म के हिसाब से जिंदगी चलाना
बड़ी अजीब बात है, जो लोग खुदा को मानते हैं वो शरियत को नकार देते हैं. मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने वाले जनेऊ नहीं पहनते और पंडिज्जी की पालागी भी नहीं करते. वो व्रत नहीं करते, जाति  में शादी नहीं करते, अपने वर्ण के अनुसार काम नहीं करते. ईश भक्त चर्च नहीं जाते, और भी न जाने-जाने किस-किस तरह से अपनी जिंदगी जीते हैं जो परमेश्वर को बिल्कुल पसंद नहीं.

ये सब इसलिये क्योंकि लोग समझने लगें हैं कि यह पसंद परमेश्वर की नहीं, धार्मिक गुरुओं की नौटंकी थी जो समाज को बांधे रखने के लिये बनाई गयी थी. अब खुदा के दलालों की वह इज्जत नहीं जो कभी होती थी. हां अब भी कुछ मूढ़ जरूर उनके हिसाब से चलकर अपनी जिंदगी दागदार कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते, और ये बात अब इन धर्म के ठेकेदारों को भी समझ आने लगी है.

इसलिये अब धर्म होता रहेगा अप्रासंगिक
राबर्ट हैनलिन अमेरिका के बहुत मशहूर और बेहद विवादास्पद उपन्यासकार रहे हैं, क्योंकि उन्होंने आज से कई साल पहले समाज की बहुत सारी रूढ़ियों को अपनी कहानियों में चुनौती दी थी. उनकी संकल्पनाओं में से एक है वो समाज जहां इश्वर के लिये कोई स्थान नहीं. लगभग हर मनुष्य नास्तिक है, और जो व्यक्ति ईश्वर उपासक है उसे उसी प्रकार विस्मय से देखा जाता है जिस प्रकार आज नास्तिक व्यक्ति को.

यह बात थोड़ी wishful thinking के समान लगेगी. लेकिन धर्म और धार्मिक लोगों ने जितनी मुश्किलें इस दुनिया के लिये पैदा की है, उनकी वजह से कोई आश्चर्य नहीं अगर सुधी-जनों का धर्म से विमोह जारी रहे और यह दिन भी आ जाये.

लेकिन चाहे ऐसा हो-न-हो, यह तो होना ही चाहिये कि धर्म के दलालों की सुनवाई बंद हो.

Friday, September 26, 2008

क्या क्रिश्चियन आतंकवाद भी कभी था

अमेरिकन लोगों में यह बात प्रचलित है कि उनकी सरकार को नये-नये terms गढ़ने का शौक है, जैसे collateral damage, ऐसी ही एक देन है islamic terror, मतलब आतंकवाद को धार्मिक जामा पहनाना.

यह बहुत सुविधाजनक उपाय है. किसी भी कौम के खिलाफ नफरत भरने का. लोगों की जबान पर शब्द चढ़ा दीजिये, और धीरे-धीरे उनकी सोच भी वही बन जायेगी. इसी बात के बारे में जार्ज आर्वेल ने अपनी किताब 1984 लिखी थी.

लेकिन अगर आतंकवाद धार्मिक हो, तो christian terror इस्लामिक आतंकवाद से कुछ कम टेरेराइज़िंग नहीं था. आइये शुरुआत करें बाइबिल की कुछ आयतों से.

1. Ezekiel 9:6 "Slay utterly old and young, both maids, and little children, and women . . ."

2. Isaiah 13:16 "Their children also shall be dashed to pieces before their eyes; their houses shall be spoiled, and their wives ravished."

3. They entered into a covenant to seek the Lord, the God of their fathers, with all their heart and soul; and everyone who would not seek the Lord, the God of Israel, was to be put to death, whether small or great, whether man or woman. (2 Chronicles 15:12-13 NAB)

4. Suppose a man or woman among you, in one of your towns that the LORD your God is giving you, has done evil in the sight of the LORD your God and has violated the covenant by serving other gods or by worshiping the sun, the moon, or any of the forces of heaven, which I have strictly forbidden. When you hear about it, investigate the matter thoroughly. If it is true that this detestable thing has been done in Israel, then that man or woman must be taken to the gates of the town and stoned to death. (Deuteronomy 17:2-5 NLT)


ये सारी लाइनें बाइबिल के संस्करणों से हैं. यह सिर्फ तीन या तीस नहीं हैं. अगर आप उन लाइनों की पूरी सूची देखना चाहते हैं जो इन्सानियत के खिलाफ हैं तो इस पन्ने पर जाइये - http://www.evilbible.com/

क्रिश्चियन धर्म के कुछ पोप धार्मिक क्रूरता के मामले में ओसामा से भी मीलों आगे रहे हैं. ओसामा तो सिर्फ एक घटना में 5 हजार लोगों की हत्या कर सका लेकिन क्रिश्चियनों के जेहाद की एक बानगी यह देखिये : -

अर्नाड ने पोप Innocent III (innocent मतलब निर्दोष?) को लिखा
"आज के दिन, ऐ पुण्यात्मा, बीस हजार काफिरों (heretics) को तलवार के घाट उतारा. बिना परवाह किये स्थिति, उम्र, या लिंग के."

रोम के कैथोलिक चर्च ने हर उस उपाय का उपयोग किया जिससे दूसरे धर्मों का नाश, और स्वधर्म का प्रसार हो सके. चाहे वह हों: -

1. धार्मिक जेहाद (Crusades)
2. दूसरे मत वालों की हत्या (Trials & burning of heretics en masse)
3. धर्म की रुढ़ीयों को न मानने वालों की हत्या (Death of Galileo & Socrates, and millions others)


कहते हैं कि हिटलर द्वारा यहूदियों के संहार को मिलाकर कई करोड़ लोग क्रिश्चियन चर्च की धार्मिक हिंसा का शिकार हुए. यह संख्या कोई छोटी-मोटी नहीं है. इन हत्याओं में चर्च की सहमति, उसका आदेश, और प्रोत्साहन था. धर्म के नाम पर कत्ल करना पोप के कथनानुसार सबाब दिलवाता था, जिससे निश्चित ही स्वर्ग में जगह मिलती.

उस समय चर्च की स्थिती राजा से भी शक्तिशाली थी. और धार्मिक सत्ताधारी पोप और उसके गुर्गे आज के कुछ इमामों और मौलवियों की तरह लोगों को भड़काकर कुछ भी करवा लेते थे.

यीसू ने अपना खून बहाकर हम सबको बचा लिया. यह कहता है क्रिश्चियन धर्म. एक ऐसा मसीह जो इस कदर दया से भरा थी कि खुद जान दी इन्सानों के लिये. ऐसे धर्म के मानने वाले सबका खून बहाने में लगे थे.

तो फिर जो चर्च पहले पूरे समाज को हत्या के लिये उकसा पाता था, आज ऐसा क्यों नहीं कर पाता?

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना.

क्रिश्चियन धर्म में बदलाव दूसरे धर्म के लोगों की समझाइश, या जोर आजमाइश से नहीं, उसी धर्म के भीतर पैदा होने वाले समझदार लोगों की वजह से हुआ.

कैथोलिक चर्च के खूनी खेल की वजह से बहुत सारे क्रिश्चियन वहां से अलग होने लगे, और नये समुदाय गठित होते रहे. इनमें से कूछ का तो कैथोलिक चर्च के द्वारा समूल नाश भी किया गया. लेकिन प्रोटेस्टेंट मजबूत हो गये, साथ ही राज्य जब समझ गया की चर्च के रहते राजा के पास पृर्णाधिकार नहीं है, तो उसने चर्च को राज्य से अलग करने की मुहिम चलाई.

परिणाम स्वरूप आज चर्च दया और प्रेम की बात करता है. जब साइंसदां कहते हैं कि सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य के चारों और घूमती है, तो उनके जलाने के बजाय बाइबिल में सुधार की बाते करता है.

यह कैसा बदलाव, कैसा अबाउट टर्न आया?

***

आज जो लोग 'इस्लामिक आतंकवाद' डर रहे हैं उन्हें भी पता चले की इतिहास खुद को दोहरा रहा है.

जो कट्टरपंथी हैं इस्लाम के, उनका इलाज इस्लाम के ही बुद्धजीवी, इस्लाम के moderates, इस्लाम के heroes के पास ही है.

अगर christian terrorism काबू में आ सकता है, तो islamic terrorism भी.

आप सड़ें चाहे गलें, लेकिन अगर हमारा साथ छोड़ा, तो मिटा देंगे

हिन्दू धर्म की रक्षा हेतू निकल पड़े हैं तेजोमय वीर. ओत-प्रोत है वो भग्वद-भक्ती के भाव में. माने बैठें है खुद को श्रीकृष्णावतार जो संकल्पित है धर्म की ग्लानी और अधर्म के अभ्युत्थान को रोकने के लिये. निकल पड़े है ले-ले लट्ठ, पेट्रोल, तमंचा, चाकू धर्मांतरण के खिलाफ.

बांके वीर, जिनकी छवि देखते ही बने.

धर्मांतरण के खिलाफ इस हिंसक घटनाओं को सिर्फ हालिया घटनाओं का प्रतिफल समझ लेना गलती होगी. यह परिणाम है धर्म के ठेकेदारों की लंबी मुहिम का जिसमें बेकार बैठें हुये नौजवानों को brain-wash करके इस्तेमाल किया जा रहा है. (यही कुछ मौलवी भी कर रहे हैं, और पादरी भी). क्रिस्तानी नक्सलियों द्वारा हिंदू साधू का कत्ल तो बहाना मात्र था इस योजना पर अमली जामा पहनाने का.

बहुत सही खेल है यह. हर धर्म का ठेकेदार जुटा है इसमें कि कहीं लोग धार्मिक रूढ़ियां तोड़ कर आजाद न हो जायें.

***

किस भी व्यक्ति को अगवा करना गलत है. उसे अपनी मर्जी के बिना आचरण के लिये मजबूर करना गलत है. यह सरकारी नहीं, इन्सानी कानून की बात है. तो फिर किस बिना पर किसी भी व्यक्ति को कोई भी धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपनाने से रोका जा सकता है?

ये बांके वीर जो धर्मांतरण के खिलाफ चर्च फूंकने में लगे है, क्या आपके उसी परम-पिता परमेश्वर के आदेश पर ऐसा कर रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हर मानव का कल्याण चाहता है?

***

किसी भी चर्च को जलाने से पहले.
किसी भी नव-क्रिस्तानी को सताने से पहले.
किसी भी किस्तानी पादरी को धार्मिक प्रचार से रोकने से पहले.

हम ये क्यों नहीं सोचते कि क्यों धर्म परिवर्तन करते हैं लोग.

क्या देते हैं यह पादरी उस परिवार को जो चला जाता है 'येसू मसीह' की शरण में?
क्यों धुंधले पड़ जाते है आपके पीढ़ीयों के संस्कार?
क्यों लोग छोड़ने को तैयार हो जाते हैं अपने उस समाज, और परिवार को जिसमें से निकाला जाना बहुत बड़ी सजा है?

जवाब है -
एक बेहतर कल.

इस देश में सारी प्रशासनिक सेवाओं, व्यापार, व नौकरियों में हिन्दू ही भरे हैं. देश के बड़े अमीरों में भी अधिसंख्य हिन्दू हैं. फिर भी हिन्दुओं को 'पैसे, और शिक्षा' के द्वारा अपने धर्म के प्रसार करने वाले क्रिस्तानी संगठनों से खतरा महसूस होता है?

क्या हिन्दू धार्मिक संगठन सिर्फ मंदिर और मूर्ति ही बना सकते हैं?
क्या पुजारी-पंडे सिर्फ भजन, श्लोक और दक्षिणा ही जानते हैं?

जिन्हें चर्च के स्कूलों से डर लगता है, उन्होंने गुरुकुलों को क्यों नष्ट होने दिया?
क्या इस्तेमाल होता है उन करोंड़ो अरबों रुपयों का जो हर साल छोटे बड़े मंदिरों में दान के स्वरूप आते हैं?
क्या यह रकम चर्च के हिन्दुस्तान के सलाना बजट से कम है?

तो फिर क्यों चर्च के स्कूल ज्यादा हैं?
क्यों उनकी कल्याणकारी संस्थान ज्यादा हैं?
क्यों वो बेहतर तरीके से खुद को प्रचारित प्रसारित कर पाते हैं?


जो हिंदू 200 करोड़ का मंदिर बनवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं, वो देखें की उसके बगल में दो कमरों का स्कूल भी नहीं. लेकिन हर दो-कमरे के चर्च के साथ दस कमरों का स्कूल बनाया जाता है.

कैसे करेंगे आप उनसे मुकाबला?

***

धार्मिक कदाचारी वह नहीं हैं जो धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं, या वह जो कर रहे हैं.

धार्मिक कदाचारी वह हैं जो अपने धर्म की कमजोरियों (जो नींव है इस समस्या का) की जगह सतही समाधान में जुटे हैं.

ये अपने मकसद में तो क्या सफल होंगे, बस इस देश के देशवासियों को थोड़ा और अलग-थलग कर देंगे.

Tuesday, September 23, 2008

तो फिर धर्मांतरण भी जायज है

क्या इन्सान के जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने मजहब को मौलवीयों और पंडो के बनाये हुये standards पर चला कर दिखाने की है? नहीं, बिला शक नहीं. किसी भी मानव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी खुद को, अपने परिवार को, और अपने देश के प्रति है. उसकी जिम्मेदारी है खुद को अपने परिवार को, और देश को इज्जत की existence देना. उनके लिये बेहतर भविष्य का निर्माण करना.

लेकिन आज के समाज में धर्म को इतना ऊंचा दर्जा दे दिया गया है कि इस पर सब कुछ कुर्बान है. ऐसे समाज में जब धर्मांतरण का मुद्दा उठता है तो कुछ लोगों का खून खौल उठता है, और वो सब होने लगता है जिसकी इजाजत किसी धर्म में नहीं.

आइये, इस बाबत कुछ सवाल पूछें जायें.

1 - कोई भी व्यक्ति धर्म न बदले यह उसका चुनाव है. इसी तरह जो व्यक्ति धर्म बदले वह उसका चुनाव है, तो उसे किस बिना पर रोका जाये?
2 - उसे रोकने से पहले इस बात की खोज क्यों न की जाये की धर्मांतरण क्यों चुना?
3 - जो लोग प्रलोभन के चलते धर्म बदलने को तैयार हो, निश्चित ही उन्हें अपने खुदा पर यकीन नहीं. तो ऐसे लोगों कि इस धर्म को क्या जरुरत है?
4 - क्या उस धर्म में ऐसा कुछ होगा जिसकी वजह से किसी व्यक्ति को लगे की धर्म बदल लेना चाहिये?

हां, चौथा सवाल सबसे सामयिक है. क्या है उस धर्म की कमजोरियां जिनकी वजह से कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन चुनेगा.

अ. अगर उस धर्म में जाती प्रथा हो जिसकी वजह से किसी तबके को लगातार हेय समझा जाये तो क्या वह तबका धर्म नहीं छोड़ना चाहेगा?
आ. अगर वह धर्म व्यक्ति को वह सब न दे जिसकी उसे जरुरत है (शिक्षा, अच्छी जिन्दगी, संतोष), और सिर्फ ढकोसले में ही डूबा रहे तो क्यों वह धर्म नहीं बदले?
इ. अगर उस धर्म में अतंर्कलह हो, जो उस धर्म को कमजोर करे, तो कैसे रोका जाये धर्मांतरण?

जब कभी धर्मांतरण होता दिखे तो क्यों न हम दूसरे तरीके से सोचें -- क्यों न हम सोचें की ऐसा क्या था जो उस व्यक्ति को हमारा या आपका धर्म खराब दिखा जो वह दूसरे धर्म में गया. क्यों न हम सोचें की हम धर्म में जनकल्याण कैसे सम्मिलित करें जिससे दूसरे धर्मों के व्यक्तियों को लगे कि इस धर्म में जाना है?

अगर इस धर्म के लोगों को धर्मांतरण रोकना है तो पहले कुछ संकल्प करें

-- जाती छोड़िये (यह जाती प्रथा में विश्वास न करने से बड़ा कदम है)
-- धर्म का उद्देश्य पंडा-मौलवी कल्य़ाण नहीं, जन कल्याण को बनाइये
-- हर धार्मिक स्थल के साथ स्कूल का निर्माण करिये
-- यह अपेक्षा न करिये की जिनका आपका समाज शोषण कर रहा है, वह आपका साथ दे.
-- धर्म को जीवन का लक्ष्य नहीं, हिस्सा बनाइये.

या इससे भी अच्छा रहेगा:

इन्सान बनें, धार्मिक नहीं. धर्म छोड़िये.

Saturday, September 20, 2008

भुला दो ये बाइबल, ये कुरान, ये गीता, ये पुराण #2

Img11

ये भी भूलने की बात नहीं कि ज्यादातर धर्म जिनकी आज बड़ी हैसियत है, पिछले तीन-चार हजार सालों के अंदर बनाये गये. हिन्दू धर्म भी इसका अपवाद नहीं, चाहे इसके मानने वाले इसे कितना ही पुराना मानें, किंतु पिछले चार हजार सालों में ही इसने वह संगठित (organized) स्वरूप प्राप्त किया जिसमें यह आज है.

यह वक्त इन्सानी सभ्यता में एक महत्वपूर्ण बदलाव का था. इस समय तक इन्सान खेती की कला अच्छी तरह सीख चुका था, और उसका बसेरा जंगलो की जगह गांवो में होने लगा था.

लगता है कि जो फुर्सत इन्सान को काम-काज और अपने बचाव से मिली, उसका इस्तेमाल नई-नई इजादों को लाने में किया, और शायद इन्हीं सब इजादों के बीच उसने खुदा के नये स्वरूप की भी इजाद कर डाली.

अब गौर करें की खुदा का जन्म कैसे हुआ

1. खुदा डर के समय अनजान सहारे की ख्वाहिश थी
बहुत उम्दा ख्याल है. जब आप मुसीबत में हो तब कोई सुपरमैन आपको बचा लेगा. खुदा का जन्म ऐसे ही हुआ होगा. एक तूफानी रात को अपना घर बचाने किसी बशर ने किसी अनजान खुदा से अर्ज की होगी की बारिश रोक दे. फिर तो ये परिपाटी चल निकली होगी, और हर मर्ज की दवा दुआ बन गई होगी.

2. खुदा डर भी था
उस समय शायद वक्त को भी खुदा की ख्वाहिश थी. कमजोर लोगों की लाठी था खुदा, और मजबूतों के लिये डर. एक ऐसी हस्ती जो सबसे जोरदार हो, जिसकी निगाह सब पर हो, जिससे कोई गुनाह छिपा न हो, जो सबका फैसला करे.

जब कानून का सहारा न हो, तो खुदा का डर ही जालिमों को फिक्रमन्द करता होगा.

3. और ईनाम भी
वह वक्त ऐसा था जब मानव कुदरत से ज्यादा ताकतवतर साबित हो रहा था. कुदरत उस समय अपनी दुश्मन नहीं, अपने लिये ईनाम लगने लगी, और इस ईनाम को अता करने का श्रेय भी खुदा को दे दिया गया.

यह तो जायज ही है, आखिरकार सजा की जिम्मेदारी भी खुदा की थी तो गिजा भी वह ही क्यों न दे.

क्रमश: (अगली किश्त में जारी)

नोट: आप सबके कमेन्ट्स का शुक्रिया. आपका रिसपोन्स उम्मीद से ज्यादा सकारात्मक रहा. क्योंकि यहां तो यह हालत है कि धर्म में अगर पांखड के भी खिलाफ कुछ कहा जाये तो मोर्चा खुल जाता है.

बहरहाल, यह मुहिम जारी रहेगी.

Friday, September 19, 2008

भुला दो ये बाइबल, ये कुरान, ये गीता, ये पुराण #1

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अपने मनोहारी अतीत के मुगालते में हम उन बुर्जुआ विचारकों की लीद ढो रहे हैं जो बर्बरता से सिर्फ दो सीढ़ी ऊपर थे. उनकी याद में हम जाति, सम्प्रदाय, रंग, धर्म और न जाने किस-किस पर भेद कर लेते हैं.

फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी परेशानी धर्म है. दुनिया भर का हर धार्मिक व्यक्ति को पूरी तरह विश्वास है कि उसका धर्म ही आखिरी सत्य है और विश्व के बाकी 500-करोड़ बाशिंदे सीधे दोजख/नर्क/Hell/Your version में जाने वाले हैं.

सभी को विश्चास है कि दुनिया को परमात्मा के उनके संस्करण ने बनाया, और सभी मनुष्यों का रचेयता वो शक्तिशाली खुदा सभी मनुष्यों का फैसला करेगा.

लेकिन कोई धर्म हो, दुनिया के अधिसंख्य लोग उसके विधर्मी होंगे. फिर क्या मजाक है वह परमात्मा जिसपर दुनिया के ज्यादातर लोगों को यकीन नहीं?

कोई साधारण बुद्धी रखने वाला मनुष्य भी थोड़ा सोच-विचार कर इस असलियत को समझ सकता है. फिर क्या कारण है इस अंध-विश्वास का?

1. हम हैं खुदा की भेड़ें/गैयां
हर धर्म का जोर है निश्शंक भरोसे (unquestioning faith) पर. आपको आदेश है ईश्वर की भेड़े बनने का, जिन्हें जहां मर्जी हो धर्म के ठेकेदार हांक ले जायें. जहां आपने सवाल किया आप काफिर, हेरेटिक, धर्मच्युत, और न जाने क्या-क्या हो जायेंगे. जब-जब सवाल पैदा होता है, तब-तब धार्मिक ठेकेदार धर्मांध मूढ़ों द्वारा दमन करवाते हैं (आगे के लेखों में जानेंगे इसके उदाहरण).

सबसे पहले तो धर्म पर शंका करो, खुदा पर शंका करो, पूज्य किताबों पर शंका करो.

2. बचपन से ब्रेनवाश
हर बच्चा खुला (या खाली) दिमाग लेकर पैदा होता है. उसमें आप जो रंग भर दें वही खिल उठेगा. किसी को यीशू पर यकीन दिलाया, तो किसी को मुहम्मद पर, बाकी जो बचे राम, कृष्ण, शिव और न जाने कितनों में बंट गये. सबको बचपन से सिखाया कि खुदा है, बैठा है आपके सरों पर, इनसे डर के रहना! तो सब ने कर लिया विश्वास. बड़े होकर अपने बच्चों के सामने भी दोहरा दिया.

बचपन से चूहा दिखाकर किसी को कहा जाये कि बेटा यह हाथी है, तो वह बच्चा उसे हाथी ही कहेगा, चूहा नहीं. और जब बड़ा होकर कोई अनजाना उसे कहेगा कि ये तो चूहा है तो बच्चा चौंक उठेगा, सहसा विश्वास नहीं करेगा. जब 10-15 लोग यही बात दोहरायेंगे तब समझेगा कि परिवार वालों ने उसका पप्पु बना दिया.

यही हाल धर्म का है. फर्क इतना है कि आस-पास के सभी लोगों का पप्पु बन चुका है, और कोई यह बताने वाला नहीं कि जिसे तुम हाथी समझे बैठे हो, वह तो चूहा है. एकाध जो आवाजें उठतीं हैं वो 'हाथी! हाथी!' चिल्लाने वालों में दब जातीं हैं.

पप्पा ने बताया इसलिये पप्पु मत बनो. शक करो, क्योंकि वो भी इन्सान हैं, उनसे गलती हो सकती है.

क्रमश : (आगे कि किश्त में जारी)

Wednesday, September 17, 2008

एक सच्चा मुसलमान ऐसा नहीं लिख सकता

आल इंडिया शिया काउंसिल के प्रमुख मौलाना जहीर अब्बास रिजवी ने कहा कि ब्लास्ट वाली जो ई-मेल चैनलों को भेजी गयी वो नकली है, क्योंकि उसमेम लिखा है - 'बिस्मिल्ला रहेमान रहीम', और एक सच्चा मुसलमान इस पवित्र वाक्य को लिखते समय गलती नहीं. कर सकता.

बहुत माकूल दलील दी है मौलाना साहिब ने. एक सच्चा मुसलमान 'बिस्मिल्लाह-अर-रहमान-अर-रहीम' को लिखने में गलती नहीं कर सकता. लेकिन क्या एक अध-पढ़, धर्मांध, मूढ़, जिसे खुदा नहीं समझाया गया, सिर्फ दहशत समझाई गयी है यह गलती कर सकता है?

कातिब की भूलों पर भी माजरत की तलब 
उनकी इंसानियत के क्या कहने

आसिम की हिमायत, खुदा का लेके नाम  
वो भोली हिकमतों के क्या कहने
(विश्व)

अच्छा लगता अगर जहीर साहिब ने इसकी जगह यह कहा होता कि एक 'सच्चा मुसलमान' बम विस्फोट जैसा अपवित्र काम नहीं कर सकता.

अगर उन्होंने आह्वान किया होता कौम का, और फतवा दिया होता कौम से उन खूनियों को निकालने का, ठीक उसी तरह जिस तरह फतवा दिया गया सलमान के अब्बा सलीम के खिलाफ, क्योंकि उनके यहां गणेश पूजा हुई.

किसी भी दुर्घटना के बाद धर्म के हाकिम (चाहे हिन्दू हों, या मुसलमान) हमेशा गलत संदेश ही क्यों भेजते हैं ?

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कातिब - लेखक
माजरत - मुआफी
आसिम - पापी
हिकमत - तरकीब

दीनो-धरम कुछ और नहीं, एक बुरी आदत हैं

अगर किसी बच्चे का खुदा से तआरुफ न कराया जाये, तो उसके लिये परमात्मा नाम की किसी चीज का वजूद भी नहीं रहेगा. वो जियेगा अपनी जिन्दगी, आजाद, बिना जाने की दोजख क्या होती है, और स्वर्ग क्या. पुल-सिरात के नाम से भी उसका दिल नहीं दहलेगा.

दीन-धरम कुछ और नहीं एक बुरी आदत है जो हमारा परिवार हमें विरासत में दे जाता है, कि लो बेट्टे, अब झेलो खुदा की खुदाई. रोजाना सुबह उठकर जनेऊ डालकर घंटा बजाओ, दिन में पांच बार अपने घुटनों पर जोर आजमाइश करो, और अगर फिर भी सेहत बांकी न हो तो खुदा के नाम पर महीने भर का व्रत करो. और होना क्या हासिल है? पंडिज्जी का कहना है कलजुग में वैसे भी सभीने नर्क में जाना है.

एक बात याद रखने वाली है, धर्म और खुदा के अस्तित्व कर किसी को यकीं नहीं. सभी दिल ही दिल में इस झूठ की असलियत समझ रहे हैं, वह भी जो हाजी बने बैठें हैं, और वह भी जिन्होंने 12 तीरथ कर रखे हैं. वरना सच मानिये, अगर परमात्मा पर जिसे जरा सा भी यकीन है, क्या वो कोई भी ऐसा काम कर सकता है जिससे खुदा नाराज हो?

अगर आप झूठ बोल सकते हैं, छोटी-मोटी बेईमानी कर सकते हैं तो समझ जाईये की आप भी इस enlightened समाज का हिस्सा हैं जो भगवान की सच्चाई जान चुके हैं.

लेकिन फिर भी हमारे समाज में लोग धार्मिक होने का ऐसा भीषण स्वांग क्यों रचे बैठे हैं?

जवाब है - आदत.

-- बचपन में देखा की मम्मी-डैडी दो पैरों पर चल रहे हैं. मम्मी ने कहा, बेट्टा घुटनों पर नहीं पैरों पर चलो. बस चलना सीखा और तब से दो पैरों पर ही चल रहे हैं, और सही मान बैठे हैं.

-- थोड़ा बड़ा हुये तो स्कूल जाने लगे. पप्पाजी ने रस्ते में हनुमान मंदिर के सामने से गुजरते हुये कहा, मुन्ना हनुमान जी को नमस्कार करो, हमने कर दिया. इसी तरह अब्बाजी के साथ में मज्जिद में जाकर दुआ भी मांग आये. करत-करत अभ्यास यकीन हो गया की खुदा बैठा है कहीं ऊपर, ले तराजू बांट अपने इंतजार में, कि ये आये तो बेट्टाजी का हिसाब करुं.

असलियत में इन्सान की बेसिक फितरत धार्मिक होने की नहीं. लेकिन जिन भाई लोगों ने धर्म और भगवान का आविष्कार किया, उन्होंने कुछ को पटाकर, और बाकियों को डराकर खुदा का नाम बढ़ा दिया, और बस सदियों के लिये अपना उल्लू चला लिया.

और हां, ये भाई लोग बड़े चंट चिलाक हैं. इन्हें खूब समझ है कि परमात्मा के विचार भर से काम नहीं चलने का, अगर लोगों को गुलाम बनाना है तो इस विचार को जीवन का उतना ही अभिन्न अंग बनाना होगा जितना की पोट्टी जाना. इसलिये दुनिया भर के कर्मकाण्ड रच डाले, जिसको लोगों ने बिना सोचे समझे इतनी बार किया की बन गये आदत.

अगर आप तस्बीह या माला फेर-फेर कर बौरा गये हैं, और सोच रहे हैं कि अब तो मेरी सीट पक्की सुरग में, क्योंकि मैं लिये बैठा हूं 1000348 बार श्री राधेकिशन जी का नाम, तो भैया आप वही माल हो जिसके भरोसे मौलवी और पंडत अपनी-अपनी दुकानें खोले बैठें हैं.

एक बार भगवान से की तहे-दिल से शिकायत
या खुदा, तुझे दिन-रात मैंने पूजा
तेरी शान में कसीदे पढ़े, तेरे नाम जपता रहा
लेकिन तूने कभी पलट के खबर न ली
तकते-तकते तेरी बांट अब मेरा समय गुजर गया
अब आने को हूं तेरे पास, पूछूंगा तुझसे खुद
खुदा, तू इतना संग-दिल क्यों निकला

पता नहीं वो खुदा था, ये मेरी पिनक-ए-अफीम
लेकिन जो सुना वो बयां करता हूं
खुदा ने कहा, बेटा रामपरसाद, तू सही कहे है
तू बड़ा भकत है मेरा, ये ले टोकन, लाईन में आजा
तेरे जैसे और भी लगे हैं यहां आगे तुझसे
बारी-बारी से सभी को निपटा रहा हूं

मैंने टोकन पर लिखा नम्बर देखा - 1354853489
सच ही कहा है किसी ने, मैं बुदबुदाया
खुदा के घर देर है, अंधेर नहीं

दूसरे दिन पड़ोसी ने कहा
चच्चच... बड़ा धार्मिक बंदा था बेचारा