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Friday, May 28, 2010

सुन्नी मुसलमानों ने किया पाकिस्तान में अहमदियों का कत्लेआम – मुस्लिम देशों में मुसलमान माइनोरिटी असुरक्षित

जुमे की नमाज़ के दिन लाहौर के अहमदिया मुसलमान (जिन्हें पाकिस्तान में कुत्ते से भी बदतर औकात नसीब है) खुदा में भरोसा रखने वाले हर मुसलमान की तरह मस्ज़िद गये, लेकिन उन्हें इल्म नही था कि वह दिन खुदा की इबादत का नहीं, अजाब का होगा. इस्लामाबाद कि दो मस्ज़िदों पर गोली-बारूद, आधुनिक रायफलों, मशीनगनों व ग्रेनेडों से लैस सुन्नी आतंकियों पर हमला बोल दिया और न जाने कितने ही बेकसूर अहमदिया मुसलमानों को हलाक किया.

एक वक्त तो यह था कि इन सुन्नी आतंकियों के कब्जे में 2000 से ज्यादा अहमदिया मुसलमान थे जिनकी जान की कीमत उन आतंकियों के लिये कुर्बानी के बकरों से भी कम होगी. बहुत सारे बेकसूर अहमदियों के हलाक हो जाने के बाद पाकिस्तानी मशीनरी हरकत में आई और आतंकियों को रोका, लेकिन तब तक कितने ही घर बरबाद हो चुके थे.

असल में पूरी दुनिया में जो सुन्नी मुसलमान हैं उनकी अंध धार्मिकता ने ज़हर फैला रखा है. ज्यादातर आतंकी घटनायें सुन्नियों के गुट करवाते रहे हैं चाहे वो हिन्दुस्तान पर हमले हों या अमेरिका में. ये लोग न तो शियाओं को मुसलमान मानते हैं, और अहमदियों को तो इन्सान भी नहीं मानते. इनके मुल्क पाकिस्तान में अहमदियों को कागज़ी तौर पर इस्लाम से अलग किया जा चुका है. ये लोग सूफी मुसलमानों को भी दिन रात बेइज़्ज़त करते हैं और उनके गीत-संगीत पर जोर देने के कारण हिकारत की दृष्टी से देखते है.

अपने भारत देश में अहमदिया मुसलमान इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं और उन्हें मुसलमान होने का पूरा दर्जा हासिल है.

अपने देश में भी चाहे वंदे-मातरम हो, या आतंकियों की तरफदारी भरी बातें, या बेवकूफी भरे फतवे, यह सब करने वाले सुन्नी मुसलमान ही हैं. इस्लाम के सारे अवगुण जैसे ज्यादा बच्चे पैदा करना, औरतों पर अत्याचार की ज़िद यह सब भी सुन्नियों में ज्यादा मिलेगी.

वैसे तो शिया भी निर्दोष नहीं हैं. शियाओं के सबसे बड़े मुल्क ईरान में वहीं पैदा हुये बहाई धर्म का जिस निर्ममता से गला घोंटा गया वह दिल कंपकंपा देता है. बहाइयों के गुरुओं को कैद किया गया, उनपे अत्याचार किये और बहाइयों को मारा गय. कुछ जान बचा कर भागे और उन्हें हिन्दुस्तान ने ही आश्रय दिया, और अपना पूजा स्थल बनाने की जगह भी – दिल्ली में लोटस टैंपल बहाई पूजा स्थल ही है.

यह सब बताने का सार यह है कि सुन्नी मुसलमानों में असहिष्णुता हिंसा का जो रूप ले रही है वह हर मुसलमान देश की माइनोरिटी के लिये दर्दनाक है, फिर चाहे वो अरब देश हों, इराक हो, मलेशिया हो, इंडोनेशिया हो, बांग्लादेश हो या और कोई भी मुसलमान देश, हर देश में माइनोरिटी पर अत्याचार के इतने किस्से खून से लिखे गये हैं कि दुनिया का कागज़ खत्म हो जाये पर कहानियां खत्म न हों.

शिया, अहमदिया, सूफी व अन्य मुसलमान वर्गों को सुन्नियों का पुरजोर विरोध शुरु करना चाहिये जो पूरी मुस्लिम कौम को अतिवादी का तमगा दिला चुके हैं.

फिर भी यह हिन्दुस्तान है जहां इस देश की माइनोरिटी मुसलमान सुरक्षित हैं, और हमारे देश के प्रधानमंत्री ने जैसा कहा कि देश के संसाधनों पर हक भी रखते है, तो भी उन्हें एक बार नारा देकर यह कहने में हिचक क्यों होती है कि जय हिंद!

क्या दूसरों के कत्ल को प्रेरित करने वाले धर्मों से नास्तिक होना बेहतर नहीं है?

आज ही नास्तिक बनिये, धर्म से अपना पिंड छुड़ायें, इन्सानियत अपनायें.

Wednesday, April 22, 2009

धर्म ने दुनिया को क्या-क्या दिया

धर्म ने दुनिया को क्या-क्या नहीं दिया. आज जो भी कुछ है इस दुनिया में सब धर्म की ही वजह से है. धर्म न होता तो वह सब भी नहीं होता जो हमारी सभ्यता की निशानी है. फिर दुनिया शायद एक अलग ही जगह होती. लेकिन धर्म की वजह से वह सब है, जो ऐसे नहीं होता. क्या-क्या नहीं दिया धर्म ने दुनिया को.

दिया:

1. पुराने कबीलाई असभ्य अत्याचारी कानूनों को शरिया, या धार्मिकता के नाम पर लागू कर मानवों से आधारभूत स्वतंत्रता भी छीन लेने का हक.

2. जाति के नाम पर धर्म के बंटवारे से पूरे समाज में इतनी बड़ी खाईयां जिन्होंने इन्सान को इन्सान नहीं क्षत्रिय, ब्राह्मण, बनिया, शूद्र बना दिया, और इतने पूर्वाग्रह हर जाति के अंदर भर दिये कि उनसे बाहर निकल कर इन्सान को इन्सान समझना मुश्किल हो गया.

3. अपने धर्म के प्रसार के लिये हर जायज नाजायज तरीके का इस्तेमाल करना और उसे सही समझना.

विज्ञान ने दुनिया को उर्जावान किया और धर्म ने शक्तिहीन. विज्ञान की ऊर्जा का इस्तेमाल धर्म ने युद्ध के लिये किया. अब धर्म इस मोड़ पर मानव सभ्यता को पहुंचा चुका है कि इसी रास्ते पर आगे चलने की कीमत अपनी सभ्यता खोकर ही चुकानी होगी.

जिस धर्म में नये तौर-तरीकों के कपड़े पहनना मना है, नये मनोरंजन के साधन इस्तेमाल करना मना है, नये युग में जीना मना है, वो बड़ी आसानी से नये तरीके के हथियार, असले और युद्ध सामग्री इस्तेमाल कर लेता है, और उसमें उन्हें कोई कोन्ट्राडिक्शन नहीं दिखता.

क्या एटम बम का वजूद मात्र ही इस बात का सबूत नहीं है कि

खुदा नहीं है

भगवान नहीं है

ईसा नहीं है

और भगवान का हर वो रूप नहीं है जिसे हमने माना

तो कब तक इस झूठ के सहारे इन्सानों पर अत्याचार होगा?

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Friday, September 26, 2008

क्या क्रिश्चियन आतंकवाद भी कभी था

अमेरिकन लोगों में यह बात प्रचलित है कि उनकी सरकार को नये-नये terms गढ़ने का शौक है, जैसे collateral damage, ऐसी ही एक देन है islamic terror, मतलब आतंकवाद को धार्मिक जामा पहनाना.

यह बहुत सुविधाजनक उपाय है. किसी भी कौम के खिलाफ नफरत भरने का. लोगों की जबान पर शब्द चढ़ा दीजिये, और धीरे-धीरे उनकी सोच भी वही बन जायेगी. इसी बात के बारे में जार्ज आर्वेल ने अपनी किताब 1984 लिखी थी.

लेकिन अगर आतंकवाद धार्मिक हो, तो christian terror इस्लामिक आतंकवाद से कुछ कम टेरेराइज़िंग नहीं था. आइये शुरुआत करें बाइबिल की कुछ आयतों से.

1. Ezekiel 9:6 "Slay utterly old and young, both maids, and little children, and women . . ."

2. Isaiah 13:16 "Their children also shall be dashed to pieces before their eyes; their houses shall be spoiled, and their wives ravished."

3. They entered into a covenant to seek the Lord, the God of their fathers, with all their heart and soul; and everyone who would not seek the Lord, the God of Israel, was to be put to death, whether small or great, whether man or woman. (2 Chronicles 15:12-13 NAB)

4. Suppose a man or woman among you, in one of your towns that the LORD your God is giving you, has done evil in the sight of the LORD your God and has violated the covenant by serving other gods or by worshiping the sun, the moon, or any of the forces of heaven, which I have strictly forbidden. When you hear about it, investigate the matter thoroughly. If it is true that this detestable thing has been done in Israel, then that man or woman must be taken to the gates of the town and stoned to death. (Deuteronomy 17:2-5 NLT)


ये सारी लाइनें बाइबिल के संस्करणों से हैं. यह सिर्फ तीन या तीस नहीं हैं. अगर आप उन लाइनों की पूरी सूची देखना चाहते हैं जो इन्सानियत के खिलाफ हैं तो इस पन्ने पर जाइये - http://www.evilbible.com/

क्रिश्चियन धर्म के कुछ पोप धार्मिक क्रूरता के मामले में ओसामा से भी मीलों आगे रहे हैं. ओसामा तो सिर्फ एक घटना में 5 हजार लोगों की हत्या कर सका लेकिन क्रिश्चियनों के जेहाद की एक बानगी यह देखिये : -

अर्नाड ने पोप Innocent III (innocent मतलब निर्दोष?) को लिखा
"आज के दिन, ऐ पुण्यात्मा, बीस हजार काफिरों (heretics) को तलवार के घाट उतारा. बिना परवाह किये स्थिति, उम्र, या लिंग के."

रोम के कैथोलिक चर्च ने हर उस उपाय का उपयोग किया जिससे दूसरे धर्मों का नाश, और स्वधर्म का प्रसार हो सके. चाहे वह हों: -

1. धार्मिक जेहाद (Crusades)
2. दूसरे मत वालों की हत्या (Trials & burning of heretics en masse)
3. धर्म की रुढ़ीयों को न मानने वालों की हत्या (Death of Galileo & Socrates, and millions others)


कहते हैं कि हिटलर द्वारा यहूदियों के संहार को मिलाकर कई करोड़ लोग क्रिश्चियन चर्च की धार्मिक हिंसा का शिकार हुए. यह संख्या कोई छोटी-मोटी नहीं है. इन हत्याओं में चर्च की सहमति, उसका आदेश, और प्रोत्साहन था. धर्म के नाम पर कत्ल करना पोप के कथनानुसार सबाब दिलवाता था, जिससे निश्चित ही स्वर्ग में जगह मिलती.

उस समय चर्च की स्थिती राजा से भी शक्तिशाली थी. और धार्मिक सत्ताधारी पोप और उसके गुर्गे आज के कुछ इमामों और मौलवियों की तरह लोगों को भड़काकर कुछ भी करवा लेते थे.

यीसू ने अपना खून बहाकर हम सबको बचा लिया. यह कहता है क्रिश्चियन धर्म. एक ऐसा मसीह जो इस कदर दया से भरा थी कि खुद जान दी इन्सानों के लिये. ऐसे धर्म के मानने वाले सबका खून बहाने में लगे थे.

तो फिर जो चर्च पहले पूरे समाज को हत्या के लिये उकसा पाता था, आज ऐसा क्यों नहीं कर पाता?

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना.

क्रिश्चियन धर्म में बदलाव दूसरे धर्म के लोगों की समझाइश, या जोर आजमाइश से नहीं, उसी धर्म के भीतर पैदा होने वाले समझदार लोगों की वजह से हुआ.

कैथोलिक चर्च के खूनी खेल की वजह से बहुत सारे क्रिश्चियन वहां से अलग होने लगे, और नये समुदाय गठित होते रहे. इनमें से कूछ का तो कैथोलिक चर्च के द्वारा समूल नाश भी किया गया. लेकिन प्रोटेस्टेंट मजबूत हो गये, साथ ही राज्य जब समझ गया की चर्च के रहते राजा के पास पृर्णाधिकार नहीं है, तो उसने चर्च को राज्य से अलग करने की मुहिम चलाई.

परिणाम स्वरूप आज चर्च दया और प्रेम की बात करता है. जब साइंसदां कहते हैं कि सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य के चारों और घूमती है, तो उनके जलाने के बजाय बाइबिल में सुधार की बाते करता है.

यह कैसा बदलाव, कैसा अबाउट टर्न आया?

***

आज जो लोग 'इस्लामिक आतंकवाद' डर रहे हैं उन्हें भी पता चले की इतिहास खुद को दोहरा रहा है.

जो कट्टरपंथी हैं इस्लाम के, उनका इलाज इस्लाम के ही बुद्धजीवी, इस्लाम के moderates, इस्लाम के heroes के पास ही है.

अगर christian terrorism काबू में आ सकता है, तो islamic terrorism भी.

Tuesday, September 23, 2008

तो फिर धर्मांतरण भी जायज है

क्या इन्सान के जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने मजहब को मौलवीयों और पंडो के बनाये हुये standards पर चला कर दिखाने की है? नहीं, बिला शक नहीं. किसी भी मानव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी खुद को, अपने परिवार को, और अपने देश के प्रति है. उसकी जिम्मेदारी है खुद को अपने परिवार को, और देश को इज्जत की existence देना. उनके लिये बेहतर भविष्य का निर्माण करना.

लेकिन आज के समाज में धर्म को इतना ऊंचा दर्जा दे दिया गया है कि इस पर सब कुछ कुर्बान है. ऐसे समाज में जब धर्मांतरण का मुद्दा उठता है तो कुछ लोगों का खून खौल उठता है, और वो सब होने लगता है जिसकी इजाजत किसी धर्म में नहीं.

आइये, इस बाबत कुछ सवाल पूछें जायें.

1 - कोई भी व्यक्ति धर्म न बदले यह उसका चुनाव है. इसी तरह जो व्यक्ति धर्म बदले वह उसका चुनाव है, तो उसे किस बिना पर रोका जाये?
2 - उसे रोकने से पहले इस बात की खोज क्यों न की जाये की धर्मांतरण क्यों चुना?
3 - जो लोग प्रलोभन के चलते धर्म बदलने को तैयार हो, निश्चित ही उन्हें अपने खुदा पर यकीन नहीं. तो ऐसे लोगों कि इस धर्म को क्या जरुरत है?
4 - क्या उस धर्म में ऐसा कुछ होगा जिसकी वजह से किसी व्यक्ति को लगे की धर्म बदल लेना चाहिये?

हां, चौथा सवाल सबसे सामयिक है. क्या है उस धर्म की कमजोरियां जिनकी वजह से कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन चुनेगा.

अ. अगर उस धर्म में जाती प्रथा हो जिसकी वजह से किसी तबके को लगातार हेय समझा जाये तो क्या वह तबका धर्म नहीं छोड़ना चाहेगा?
आ. अगर वह धर्म व्यक्ति को वह सब न दे जिसकी उसे जरुरत है (शिक्षा, अच्छी जिन्दगी, संतोष), और सिर्फ ढकोसले में ही डूबा रहे तो क्यों वह धर्म नहीं बदले?
इ. अगर उस धर्म में अतंर्कलह हो, जो उस धर्म को कमजोर करे, तो कैसे रोका जाये धर्मांतरण?

जब कभी धर्मांतरण होता दिखे तो क्यों न हम दूसरे तरीके से सोचें -- क्यों न हम सोचें की ऐसा क्या था जो उस व्यक्ति को हमारा या आपका धर्म खराब दिखा जो वह दूसरे धर्म में गया. क्यों न हम सोचें की हम धर्म में जनकल्याण कैसे सम्मिलित करें जिससे दूसरे धर्मों के व्यक्तियों को लगे कि इस धर्म में जाना है?

अगर इस धर्म के लोगों को धर्मांतरण रोकना है तो पहले कुछ संकल्प करें

-- जाती छोड़िये (यह जाती प्रथा में विश्वास न करने से बड़ा कदम है)
-- धर्म का उद्देश्य पंडा-मौलवी कल्य़ाण नहीं, जन कल्याण को बनाइये
-- हर धार्मिक स्थल के साथ स्कूल का निर्माण करिये
-- यह अपेक्षा न करिये की जिनका आपका समाज शोषण कर रहा है, वह आपका साथ दे.
-- धर्म को जीवन का लक्ष्य नहीं, हिस्सा बनाइये.

या इससे भी अच्छा रहेगा:

इन्सान बनें, धार्मिक नहीं. धर्म छोड़िये.

Saturday, September 20, 2008

भुला दो ये बाइबल, ये कुरान, ये गीता, ये पुराण #2

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ये भी भूलने की बात नहीं कि ज्यादातर धर्म जिनकी आज बड़ी हैसियत है, पिछले तीन-चार हजार सालों के अंदर बनाये गये. हिन्दू धर्म भी इसका अपवाद नहीं, चाहे इसके मानने वाले इसे कितना ही पुराना मानें, किंतु पिछले चार हजार सालों में ही इसने वह संगठित (organized) स्वरूप प्राप्त किया जिसमें यह आज है.

यह वक्त इन्सानी सभ्यता में एक महत्वपूर्ण बदलाव का था. इस समय तक इन्सान खेती की कला अच्छी तरह सीख चुका था, और उसका बसेरा जंगलो की जगह गांवो में होने लगा था.

लगता है कि जो फुर्सत इन्सान को काम-काज और अपने बचाव से मिली, उसका इस्तेमाल नई-नई इजादों को लाने में किया, और शायद इन्हीं सब इजादों के बीच उसने खुदा के नये स्वरूप की भी इजाद कर डाली.

अब गौर करें की खुदा का जन्म कैसे हुआ

1. खुदा डर के समय अनजान सहारे की ख्वाहिश थी
बहुत उम्दा ख्याल है. जब आप मुसीबत में हो तब कोई सुपरमैन आपको बचा लेगा. खुदा का जन्म ऐसे ही हुआ होगा. एक तूफानी रात को अपना घर बचाने किसी बशर ने किसी अनजान खुदा से अर्ज की होगी की बारिश रोक दे. फिर तो ये परिपाटी चल निकली होगी, और हर मर्ज की दवा दुआ बन गई होगी.

2. खुदा डर भी था
उस समय शायद वक्त को भी खुदा की ख्वाहिश थी. कमजोर लोगों की लाठी था खुदा, और मजबूतों के लिये डर. एक ऐसी हस्ती जो सबसे जोरदार हो, जिसकी निगाह सब पर हो, जिससे कोई गुनाह छिपा न हो, जो सबका फैसला करे.

जब कानून का सहारा न हो, तो खुदा का डर ही जालिमों को फिक्रमन्द करता होगा.

3. और ईनाम भी
वह वक्त ऐसा था जब मानव कुदरत से ज्यादा ताकतवतर साबित हो रहा था. कुदरत उस समय अपनी दुश्मन नहीं, अपने लिये ईनाम लगने लगी, और इस ईनाम को अता करने का श्रेय भी खुदा को दे दिया गया.

यह तो जायज ही है, आखिरकार सजा की जिम्मेदारी भी खुदा की थी तो गिजा भी वह ही क्यों न दे.

क्रमश: (अगली किश्त में जारी)

नोट: आप सबके कमेन्ट्स का शुक्रिया. आपका रिसपोन्स उम्मीद से ज्यादा सकारात्मक रहा. क्योंकि यहां तो यह हालत है कि धर्म में अगर पांखड के भी खिलाफ कुछ कहा जाये तो मोर्चा खुल जाता है.

बहरहाल, यह मुहिम जारी रहेगी.

Friday, September 19, 2008

भुला दो ये बाइबल, ये कुरान, ये गीता, ये पुराण #1

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अपने मनोहारी अतीत के मुगालते में हम उन बुर्जुआ विचारकों की लीद ढो रहे हैं जो बर्बरता से सिर्फ दो सीढ़ी ऊपर थे. उनकी याद में हम जाति, सम्प्रदाय, रंग, धर्म और न जाने किस-किस पर भेद कर लेते हैं.

फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी परेशानी धर्म है. दुनिया भर का हर धार्मिक व्यक्ति को पूरी तरह विश्वास है कि उसका धर्म ही आखिरी सत्य है और विश्व के बाकी 500-करोड़ बाशिंदे सीधे दोजख/नर्क/Hell/Your version में जाने वाले हैं.

सभी को विश्चास है कि दुनिया को परमात्मा के उनके संस्करण ने बनाया, और सभी मनुष्यों का रचेयता वो शक्तिशाली खुदा सभी मनुष्यों का फैसला करेगा.

लेकिन कोई धर्म हो, दुनिया के अधिसंख्य लोग उसके विधर्मी होंगे. फिर क्या मजाक है वह परमात्मा जिसपर दुनिया के ज्यादातर लोगों को यकीन नहीं?

कोई साधारण बुद्धी रखने वाला मनुष्य भी थोड़ा सोच-विचार कर इस असलियत को समझ सकता है. फिर क्या कारण है इस अंध-विश्वास का?

1. हम हैं खुदा की भेड़ें/गैयां
हर धर्म का जोर है निश्शंक भरोसे (unquestioning faith) पर. आपको आदेश है ईश्वर की भेड़े बनने का, जिन्हें जहां मर्जी हो धर्म के ठेकेदार हांक ले जायें. जहां आपने सवाल किया आप काफिर, हेरेटिक, धर्मच्युत, और न जाने क्या-क्या हो जायेंगे. जब-जब सवाल पैदा होता है, तब-तब धार्मिक ठेकेदार धर्मांध मूढ़ों द्वारा दमन करवाते हैं (आगे के लेखों में जानेंगे इसके उदाहरण).

सबसे पहले तो धर्म पर शंका करो, खुदा पर शंका करो, पूज्य किताबों पर शंका करो.

2. बचपन से ब्रेनवाश
हर बच्चा खुला (या खाली) दिमाग लेकर पैदा होता है. उसमें आप जो रंग भर दें वही खिल उठेगा. किसी को यीशू पर यकीन दिलाया, तो किसी को मुहम्मद पर, बाकी जो बचे राम, कृष्ण, शिव और न जाने कितनों में बंट गये. सबको बचपन से सिखाया कि खुदा है, बैठा है आपके सरों पर, इनसे डर के रहना! तो सब ने कर लिया विश्वास. बड़े होकर अपने बच्चों के सामने भी दोहरा दिया.

बचपन से चूहा दिखाकर किसी को कहा जाये कि बेटा यह हाथी है, तो वह बच्चा उसे हाथी ही कहेगा, चूहा नहीं. और जब बड़ा होकर कोई अनजाना उसे कहेगा कि ये तो चूहा है तो बच्चा चौंक उठेगा, सहसा विश्वास नहीं करेगा. जब 10-15 लोग यही बात दोहरायेंगे तब समझेगा कि परिवार वालों ने उसका पप्पु बना दिया.

यही हाल धर्म का है. फर्क इतना है कि आस-पास के सभी लोगों का पप्पु बन चुका है, और कोई यह बताने वाला नहीं कि जिसे तुम हाथी समझे बैठे हो, वह तो चूहा है. एकाध जो आवाजें उठतीं हैं वो 'हाथी! हाथी!' चिल्लाने वालों में दब जातीं हैं.

पप्पा ने बताया इसलिये पप्पु मत बनो. शक करो, क्योंकि वो भी इन्सान हैं, उनसे गलती हो सकती है.

क्रमश : (आगे कि किश्त में जारी)