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Monday, December 1, 2008

धन्यवाद ओंबळे, कम से कम एक आतंकवादी तो जिन्दा पकड़ा गया!

दो आतंकवादी एके 47 और हैंड ग्रेनेड से लैस थे और इस पुलिसवाले के पास बस एक वाकी टाकी था. कोई भी रास्ता नहीं था जिससे यह 48 साल का दारोगा तुकाराम ओंबळे इस मुठभेड़ से बच पाता. लेकिन मुम्बई पोलिस का ये बहादुर एएसआई भारत पर 26/11 के आतंकवादी हमले का कम से कम आतंकवादी जिन्दा पकड़ा जाना तय करके मरा .


बुधवार की रात तुकाराम ओंबळे को ताज होटल की फायरिंग पता लगने पर मैरीन ड्राइव पर तैनात कर दिया गया. आधी रात 12.45 का समय था. तुकाराम ओंबळे को अपने वाकी टाकी पर अलर्ट मिला कि दो आतंकवादी स्कोडा कार को हाइजैक करके गिरगांव चौपाटी की ओर बढ़ रहे हैं. कुछ मिनट बाद ही वह स्कोडा तुकाराम ओंबळे के पास से सर्राती हुई गुजर गई.


तुकाराम ओंबळे तुरन्त अपनी मोटरसाइकिल पर कूद कर स्कोडा के पीछे दौड गया. डीबीमार्ग पोलिस थाने की एक टीम ने पहले से ही चौपाटी सिगनल पर नाका बन्दी की हुई थी. आतंकवादियों ने एके 47 से गोलियों चलायीं लेकिन बैरिकैड्स की वजह से इन आतंकवादियों को कार की स्पीड कम करनी पड़ी.


तुकाराम ओंबळे ने अपनी मोटरसाइकिल ओवरटेक करके कार के आगे अड़ा दी जिससे कार के आतंकवादियों को अपनी दांयी ओर डिवाइडर पर चढ़ा देनी पड़ी और इससे उन आतंकवादियों का ध्यान कुछ ही सैकंडो के लिये बंट गया.


तुकाराम ओंबळे ने मोटरसाइकिल से छलांग लगायी और आतंकवादी आमिर कासिब की एके 47 के राइफल की नाल दोनों हाथों से पकड़ कर एके47 छीनने की कोशिश की. राइफल की नाल तुकाराम ओंबळे की ओर गई. आमिर कासिब ने राइफल का ट्रिगर दबा दिया और उस राइफल से निकली गोलियों की बौछार ने तुकाराम ओंबळे के पेट को छलनी कर दिया. तुकाराम ओंबळे बेहोश होकर गिर गया लेकिन उसके हाथों की पकड़ आतंकवादी की राइफल पर मजबूती से जमी थी. अपनी आखरी सांस तक तुकाराम ओंबळे ने आतंकवादी आमिर कासब को किसी और पर गोली चलाने का मौका नहीं दिया.

तब तक दूसरे पुलिसवालों ने दूसरे आतंकवादी इस्माइल को मार डाला और पुलिस के हाथों तुकाराम ओंबळे की कुर्बानी के कारण आमिर कासिब जैसा खूंखार आतंकवादी जिन्दा हाथ आया और अब हमारी जांच एजेन्सियों के हाथ लगेंगी महत्व पूर्ण जानकारियां.

तुकाराम ओंबळे अपनी पत्नी और बिलखती चार बेटियां छोड़ गया है. यही है हमारा असली हीरो, आईये इसे सलाम करें
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उपसंहार

  • मुझे नहीं मालूम कि आप तुकाराम ओंबले की इस शहादत के बारे में जानते हैं.
  • मुझे नहीं मालूम कि इसे तिरंगे में लपेटा गया या नहीं.
  • मुझे नहीं मालूम कि इसकी शवयात्रा किसी चैनल पर दिखायी गई या नहीं.
  • मुझे नहीं मालूम कि किसी देश के प्रधानमंत्री ने इसका नाम राष्ट्र के नाम दिये गये संदेश में लिया,
  • पता नहीं कि इसे 21 तोपों की सलामी दी गयी या नहीं,
  • इसके दरवाजे पर देशमुख, मोदी या पाटिल एक करोड़ रुपये देने गये या नहीं.
  • मुझे यह भी नहीं मालूम कि इसे आतंकवाद से लड़ने का उच्च प्रशिक्षण मिला होगा

और मैं यह सब जानना भी नहीं चाहता.
मुझे इतना मालूम है कि ये मेरे देश का सच्चा शहीद है.