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Friday, June 11, 2010

भारत की सरकार न्यौत चुकी है भोपाल से भी बड़ा जीनोसाइड... भारत क्या तुम इसके लिये तैयार हो?

भोपाल की टीस फैसले के बाद उभर चुकी है. मुनाफे के वहशी भेड़ियों के द्वारा किया गया वह कत्ले-आम बाहर वालों के लिये सिर्फ चंद तस्वीरें बन कर रह गया है लेकिन भोपाल वालों के सीने में अब भी धधक रहा है.

20,000 लोगों की मौत पर मारा गया $470 मिलियन का तमाचा, आज़ाद घूमते वो बड़े पद वाले जिन्होंने भोपाल में हर नियम की धज्जियां उड़ाईं और सस्ते में छूट चुके छोटे अफसर भारत के शर्मनाक हद तक गिर चुकी न्याय व्यवस्था की कहानी बयां कर रही हैं.

भारत कभी उस दर्दनाक हादसे को भूले न भूले आपके सरकारी हुक्मरान उसे दफना चुके हैं और इसलिये वह तैयारी कर रहे हैं भोपाल से भी बड़े हादसे की. बात हो रही है भारत-अमेरिका के बीच होने वाले न्युक्लियर करार की जो आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखों का वो सपना है जिसे पूरा करने के लिये वो कुर्सी गंवाने की हद तक जाने को तैयार थे.

भूलियेगा नहीं किस तरह आपके ही एक साथी ब्लागर अमर सिंह ने सांसदो को पैसे देकर मनमोहन की सरकार बचवाई (ऐसा IBN पर देखा था).

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आपको इस न्युक्लियर करार के बारे में पता है? यह वह करार है जो भारत को विश्व शक्ति का दर्जा दिलवा सकता है. वह करार जो भारत को एकलौता ऐसा देश बनायेगा जो संयुक्त राष्ट्र का परमानेन्ट सदस्य न होकर भी मुक्त रूप से परमाणू ऊर्जा के व्यापार में हिस्सा ले सकेगा.

जिसके बाद आयेंगी अमेरिकी परमाणू कम्पनियां भारत में और पैसे लेकर लगायेंगी वह संयंत्र जिसमें परमाणू ऊर्जा से बिजली बन पाये.

लेकिन यह करार सिर्फ पैसे के बदले मिलता तो कीमत छौटी थी. इसकी कीमत हम बहुत बड़ी चुकानी को तैयार हैं. इसकी कीमत हम देने को तैयार है लांखों जानों से. जो इस करार को करने के लिये भोपाल को भुला चुके हैं वो चेर्नोबिल याद कर लें. वहां भी था एक परमाणू संयंत्र जहां पर हुई दुर्घटना के प्रभाव से 100,000 (एक लाख) से ज्यादा जानें कैन्सर से गईं और 10,000,000 (दस लाख) से ज्यादा लोग कैंसर ग्रस्त हुये. यह कह रही है ग्रीनपीस की ताज़ा रपट.

कामन सेन्स कहता है कि किसी भी दुर्घटना को रोकना हो तो ऐसे कठोर नियम बनाने चाहिए जिसमें गलती की कोई जगह न हो. और उन नियमों का पालन न करने वालों को सख्त से सख्त सज़ा देनी चाहिये ताकी कोई कोताही न करे... लेकिन भारत की कांग्रेस सरकार ने कह दिया है कि आप इस देश में आयेंगे तो आपको हम पूरा लाइसेंस देंगे देश में लाखों जानों से खेलने का और अगर आपने दुर्घटना कर दी तो आपको हम पूरी मदद करेंगे बिना किसी जवाबदारी के साफ बच कर जाने को.

भोपाल के नरसंहार के बाद हमारी सरकारी मशीनरी तुरत-फुरत हरकत में आयी... काबिले-तारीफ थी वह तेज़ी, लेकिन तेज़ी थी क्योंकि यूनियन कार्बाइड के दोषियों को बचाना था. इसलिये कानून ताक पर रखे गये, नियम भुलाये गये और ऊपर-ऊपर और ऊपर से आदेश आते रहे दोषियों को बचाने के लिये.

लेकिन इस बार सरकार ने और भी तेज़ी दिखाई है. दोषियों को बचाने के लिये दुर्घटना होने का इंतज़ार तक नहीं किया... पहले ही सर्टिफिकेट दे दिया कि आप चाहें जितनों को मारें हम आपका पीछा नहीं करेंगे. फिर हम मांग लेंगे आपसे चिड़ियों का चुग्गा और डाल देंगे अपनी भिखारी जनता के सामने. और फिर आपको पूरा मौका देंगे निकल जाने का. यही हिस्सा है उस करार का जो भारत सरकार अमेरिका के साथ कर रही है.

युनियन कार्बाइड के 470 मिलिअन तो उसने खुद भी नहीं चुकाये, यह तो उसके इंश्योरेंस की रकम ही थी. इस बार भी अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो मिल जायेगी आपको 460 मिलियन डालरों की भीख क्योंकि यही सबसे बड़ी वह कीमत है जो अमेरिकी कंपनियां चुकाने को बाध्य होंगी अगर कोई दुर्घटना घटी! और यह कीमत तय की है आपकी सरकार ने. अभी-अभी आपकी सरकार ने आपके देश वालों की जान की कीमत 10 मिलियन डालर घटा दी.

आपको कैसा लग रहा है मुद्रास्फीती के इस गिराव पर?

अमेरिकी जानें इस से कई गुना महंगी हैं वहां पर अगर कोई न्युक्लियर दुर्घटना होती है तो कंपनियां देंगी 10 बिलियन डालर तक. मतलब हर अमेरिकी आपके जैसे 20 के बराबर है. अब तो आपको अपने देशवालों की औकात का सही अंदाज़ा भी हो गया होगा.

वही अमेरिका जो अपने देश की कंपनियो के लिये इतना सस्ता सौदा तलाश रहा है अपने देश में होने वाले तेल के रिसाव पर एक ब्रिटिश तेल कंपनी (BP) पर 10 बिलियन डालरों का जुरमाना ठोकने की तैयारी कर रहा है जिससे वह कंपनी तबाह और बरबाद हो जायेगी.

भारत, क्यों न यह सौदा ऐसे देशों से हों जो दूसरों की जान की कीमत भी समझें? रूस बढ़ा हुआ मुआवज़ा देने को तैयार है. और जर्मनी में तो मुआवज़े की कोई सीमा ही नहीं निर्धारित की जा सकती. तो क्यों इस देश के US रिटर्न प्रधानमंत्री बेताब हैं अपने देशवासियों की जानों का इतना सस्ता सौदा करने के लिये?

Friday, April 23, 2010

शरद पवार की बेटी ने माना कि उसने झूठ बोला था

शरद पवार की पार्टी पावर में हो और घपला न हो ऐसा कहीं होता है? एनसीपी को देखकर तो अपने पाक दामन पर लालू प्रसाद जैसे भी गर्व कर सकते हैं. चाहे तेलघी  हो, या शक्कर या आईपीएल के शेयर ये लोग खाने में हमेशा अव्वल रहते हैं.

झूठ बोलने में नेता तो जगजाहिर ही हैं लेकिन उनकी औलादें (जो नेता नहीं हैं) वो भी इस सफाई से झूठ बोल लेती हैं यह नही पता था. अब पता चल गया है कि बचपन से ही ट्रेनिंग मिले तो बेईमानी करने के लिये नेता होना जरूरी नहीं है.

बात हो रही है सुप्रिया सुले की (जिनके नाम के साथ अब पवार तो जुड़ा भी नहीं है… फिर भी..?) जो शरद पवार की पुत्री हैं और झूठ बोलने में नंबर वन हैं. लेकिन अब शक्कर पवार… अर्र्र.. शरद पवार के साथ नहीं रहती तो झूठ पर कायम रहने की ट्रेनिंग कमजोर हो गई है.

पहले सुप्रिया सुले कहती रहीं की मेरे पति कि IPL से संबंधित किसी कंपनी में (इन्डीयन पैसाखोरों की लीग) में हिस्सेदारी नहीं है, लेकिन जब छापे पर छापे पड़ने चालू हुये और ढोल की पोल बजने लगी तो अब इन्होंने मान लिया कि हां भई हिस्सेदारी है!

त भैया 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है इनके पति कि MSM (Multi-Screen Media) नाम की कंपनी में जिसके पास इस पैसाखोर लोगों की लीग के प्रसारण अधिकार हैं.

बीसीसीआई का चेयरमैन बनकर शरद पवार ने भी क्या गुल खिलाये हैं?

इन पैसाखोरों का पेट तो भरने का नहीं, लेकिन क्या इनके पाप का घड़ा कभी भरेगा?

[सुनने में आया है कि ICC अपना चेयरमैन पवार को बनाने वाली है. सही है, शायद उन्हें घपलेबाजों की कमी पड़ रही होगी.]

अबे कुछ तो शर्म करो नेताओं.

Monday, February 22, 2010

भारत, प्रधानमंत्री और पहला हक अल्प-संख्यकों का और पाकिस्तान के वो अल्प-संख्यक सिक्ख.

1. हिन्दुस्तानी सरकार के नुमाइंदे अपील कर रहे हैं कनाडा, यूएसए और यूरोप में बैठे सिक्खों से कि वो अपनी सरकारों पर दबाव बनायें कि वह सब मिल कर पाकिस्तान से कहें कि सिक्खों की जानमाल की रक्षा करो.

2. हिन्दुस्तान पाकिस्तान से बातचीत करने को तैयार है. कश्मीर पर भी, क्योंकि उसे विश्वास है कि पाकिस्तान के हर सवाल का उसके पास माकूल जवाब होगा. हिन्दुस्तान पाकिस्तान के हर सवाल का जवाब देगा, लेकिन एक भी सवाल नहीं होगा खुद उसके पास पूछने के लिये. यह भी नहीं कि कश्मीर के लिये आंसू बहाने वाले पाकिस्तानियों, क्या तुमने उन्हें देख रहे हो जो पाकिस्तान में ही मजहब के नाम पर मारे जा रहे हैं?

3. सुप्रीम कोर्ट ने सज्जन कुमार के खिलाफ नॉन बैलेबल वारंट निकाल दिया. तो 1984 से 25 साल बाद अब तो सज्जन कुमार गिरफ्तार हो जायेगा... या इसके लिये भी सिक्ख भाइयों को युरोप और यु-एस-ए में दबाव बनाना होगा?

4. मनमोहन 'सिंह' इतने महान निकले कि सिक्खों की कुर्बानी हंसते-हंसते दे रहे हैं. चाहे वो 1984 हो, या कश्मीर में सिक्खों की बड़े पैमाने पर हत्या, या अब पाकिस्तान, किसी से कुछ नहीं कहा जायेगा.

5. जूता मार कर एक खालसा ने टाइटलर का टिकट काट दिया. सरकार को रास्ते पर लाने के लिये कितने खालसों को जूते उठाने पड़ेंगे? कहां-कहां और किस-किस पर?

6. हिन्दुस्तान में 1411 बाघ हैं. सबको पता है. पाकिस्तान में 'सिंह' कितने है? इनको बचाने के लिये कौन सी कम्पनी बात करने की गुजारिश करेगी?

7. जो अल्पसंख्यक, मानवाधिकार, आदी-आदी वादी भारत के 'चिंताजनक' हालात पर बात करते नहीं थकते, क्यों वो चिंता नहीं करते हमारे उन लोगों कि जो बाहर अल्प-संख्यक हो गये हैं. क्या सिर्फ एक बयान भी इतना महंगा लगता है कि नहीं दिया जाता?

8. गुरु ने कहा था

चिड़ियां नाल मैं बाज लड़ांवा
तां गोबिंद सिंह नांव कहांवा...

और

देह शिवा वर मोहे इहै
शुभ कर्मन ते कबहुं न टरौं
न डरौं अरि सों जब जाय लरौं
निश्चय कर अपनी जीत करौं

तो क्या कमी हो गई हमारे निश्चय में कि जीती नहीं, हर बाजी हारी हमने और मोहताज हुये सहारे का उन्हीं लोगों का जो जिम्मेदार हैं इस शर्म का.

Saturday, February 6, 2010

'बेगुनाहों' ने मार दिया बाटला अभियुक्त को गिरफ्तार कराने वाले मास्टर को

दिल्ली के बाटला कांड के 'बेगुनाह' अब भी जेल में सड़ रहे हैं और उनके सुराग देने पर दिल्ली पुलिस की एटीएस आजमगढ़ जाकर शहजाद को पकड़ लाई. वही शहजाद जिसने कबूल किया कि उसने भी वीर शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा (जिसके परिवार की सुरक्षा दिल्ली सरकार ने वापस ले ली अभी-अभी) पर गोली चलाई थी.

शहजाद को पकड़ने में एटीएस की मदद एक स्थानीय स्कूल के प्रबंधक ने की थी. उसने एटीएस के लोगों को रुकने का स्थान मुहैया कराया और एटीएस को शहजाद के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिये. इनका नाम श्री दिनेश यादव था, जिन्हें अब मार दिया गया है. इस कांड में स्कूल का एक आदमी और भी मारे गये. 

सबसे पहले तो नमन उस शहीद दिनेश यादव को जिसने भेड़ियों के शहर में रहते हुये भी देश का साथ न छोड़ा, और फिर धिक्कार उस दिगविजय सिंह को जिसने अभी-अभी आजमगढ़ की यात्रा कर बाटला कार्यवाही पर सवाल उठाने वालों को यह भरोसा दिलाया कि वह जांच मे 'पूरा सच' निकलवायेंगे.

क्या है पूरा सच दिग्विजय सिंह?

  • क्या मोहनचंद्र कि हत्या आतंकियों ने नहीं की?

हमें भी बताओ तुम्हें किस चीज़ पर शक है.

दिग्विजय सिंह क्या तुम एक बार और जाओगे आजमगढ़ उस शहीद की अंतिम यात्रा में जिसने देशद्रोही आतंकियों के खिलाफ मुहिम में अपनी जान कुर्बान की? या फिर तुम सत्ता के भूखे भेड़िये की तरह सिर्फ वोट खसोटने के लिये ही यात्रायें करते हो?

अब भी जिन्हें बाटला कांड की सत्यता और श्री मोहन चंद्र शर्मा की शहीदी पर शक हो उन्हें शर्म से डूब मरना चाहिये. लेकिन अगर यह शर्म का मामला होता तो डूब भी मरते, यह तो साफ-साफ देशद्रोहियों की साजिश है.

बिहार में चुनाव होते हैं तो मुम्बई में हाहाकर मचता है, और मुंबई में चुनाव होने होते हैं तो बिहार में रेल स्टेशन जल जाता है. सत्ता हथियाने के लिये जो न करना पड़े वो कम है़.

जब देश जल रहा होगा तब सत्ताधारी उसके हाल पर रोयेंगे या नीरों की तरह चैन से बंसी बजायेंगे?

खबर: नईदुनिया के हवाले से.

Tuesday, October 27, 2009

बिकोज़ छत्रधर महतो इस ए गुड मैन

अपनी एक ट्रेन माओवादी आतंकवादियों के कब्जे में है. कई सौ यात्री हैं उस ट्रेन में उन सब की जिंदगी दांव पर है, और सौदा करने वाले हैं हमारे देश के नेता. माओवादी भी तैयार है सौदे के लिये, 1 के बदले 400. बोलो क्या कहती हो दिल्ली सरकार? छत्रधर महतो को छोड़ेंगे?

कंधार के नाम पर भाजपा सरकार को पानी पी-पीकर कोसने वाले यतींद्रनाथ के बदले एक सौदा पहले भी कर चुके हैं. माओवादी इमानदार साबित हुए. POW को छोड़ दिया. दोनों तरफ से अच्छी डील हुई, दोनों सौदागर इत्मीनान में है, पार्टी रिलायबल है, डील चलती रहे.

इसलिये माओवादियों की तरफ से ताजी आफर इतनी जल्दी आ गई, पहले 1 के बदले 10 थे, अब 500 के बदले सिर्फ एक – छत्रधर महतो. क्या अपनी सरकार को सौदा बुरा लगेगा?

{कंधार-कंधार-कंधार} बार-बार मुझे याद आता है कंधार. अब सरकार उन्हीं की है जिन्होंने कंधार का इतना गहन विश्लेषण किया. लेकिन फैसला दूसरा होगा इसकी अपेक्षा व्यर्थ है क्योंकि यतीन्द्रनाथ के मामले में एक उत्साहवर्धक precedent दिया जा चुका है.

मीडिया का गेम भी चालू हो चुका है. ट्रेन तक पुलिस/आर्मी पहुंचे न पहुंचे, कुछ चुनिंदा चैनलों के नुमाईंदे पहुंच गये. ऐसा लगता है जैसे तैयार बैठे थे.

कंधार में देश का हाथ मरोड़ा जा रहा था अजहर मसूद को छुड़ाने के लिये. वो तो एक आतंकवादी था. अब जो सामने है उसके गुट को कोई आतंकवादी नहीं कहता. देश का एक खास  कुबुद्धिजीवी वर्ग तो सिर्फ इनके दर्द में जीता, दर्द में मरता है. ये लोग गरीबों के मसीहा, सर्वहारा वर्ग को जिताने वाले, व दुखियों के हमदर्द हैं. तो भाई जब अजहर मसूद जैसे शैतान को छोड़ सकते हैं तो फिर छत्रधर महतो को क्यों नहीं, खासकर तब जब ‘ही इज़ ए गुड मैन’ जैसा कि एनडीटीवी में लगातार दिखाया जा रहा है.

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ताजा समाचार है कि छ्त्रधर के लोगों ने ट्रेन छोड़ दी. मतलब डील जमी नहीं, या यह सब एक जबर्दस्त पब्लिसिटी स्टंट था?

माओवादियों के पीछे आखिर बुद्धीजीवी दिमाग है न.

Wednesday, May 20, 2009

अमर सिंह की कांग्रेस को धमकी

खबर के अंदर की खबर पढ़ना भी एक कला है. अब राजनीति से दो-चार होते कई साल बीत चुके हैं तो राजनेताओं की चालों का अंदाजा लगाना भी अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है. amarsinghnishanchiबात है अमर सिंह की. ये पुराने चालबाज हैं. इनके पत्ते सधे होते हैं और अपने काम निकालने के लिये यह हर प्रपंच कर लेते हैं. इसी कला में निपुण होने के चलते यह मुलायम के लिये अपरिहार्य हो गये. भाई अब तो हालात यूं है कि आजम खान ने भी इनसे पंगा लिया तो उनकी चला-चली हो गई.

तो बात है अमर सिंह के कल के बयान की. विश्वास मत के इतने दिनों बाद, चुनाव के भी बाद अब अमर सिंह के अंदर का ईमान जाग गया और उन्होंने खुलासा कर ही डाला की सोमनाथ चटर्जी ने उनसे कांग्रेस समर्थन को कहा था.

क्यों? अब कैसे इन पुरानी बातों को याद कर लिया? क्या दुश्मनी हो गयी ताजी-ताजी सोमनाथ से? बुढऊ की मिट्टी क्यों खराब करने पर तुले हैं?

यह सोमनाथ से दुश्मनी नहीं है, सोमनाथ तो घुन है जो पिस गया क्योंकि अमर सिंह अपनी रोटियां सेंकने के लिये आटा बनाने में लगे हैं.

यह गूढ़ बात है. चेतावनी है अमर सिंह कि कांग्रेस को. अगर तुमने हमें लपेटा तो बर्रों के छत्ते को खोल डालूंगा. राजफाश कर दुंगा. पर्दानशीं रहस्यों को बेपर्दा कर दूंगा.

सोमनाथ को लपेट कर उन्होंने सैम्पल दिखाया है कि असल माल पोटली में बंद है, बोलो तो खोलूं.

अमर सिंह कांग्रेस के लिये नोट बांट रहे थे विश्वास मत के दौरान (आइबिएन ने छुपाते-छुपाते भी दिखा डाली). किसके कहने पर?

इतने राज दफन हैं अमर सिंह के सीने में कि जो खुल जायें तो ऐसी पिक्चर का मसाला तैयार हो जाये जिसे हिट कराने के लिये बड़े भैया अमिताभ की भी जरुरत न रहे.

और आप क्या सोच रहे थे? सोमनाथ को बेफालतू में निपटा दिया अमर सिंह ने? नहीं यह निशान्ची अब सारे गुर सीख चुका है, अब यह प्यादों पर वक्त बर्बाद नहीं करता, सीधे वज़ीर का शिकार करता है.

Sunday, May 17, 2009

आडवाणी जी का फैसला सही है

आडवाणी जी ने फैसला किया है कि वह अब विपक्ष के नेता नहीं होंगे. बीजेपी में अभी भी नये स्तरीय नेतृत्व की कमी है, और शायद इतनी जल्दी भरपाई भी नहीं होगी, लेकिन फिर भी आगे की राजनीति के हिसाब से मुझे लगता है कि आडवाणी जी का फैसला सही है.

आडवाणी जी जानते हैं कि यह पांच साल बीजेपी को बहुत काम करना है जिससे वह अगले पांच सालों में वह जिम्मेदारी निभा पाये जिसे निभाते हुये हम उसे देखना चाहते हैं.

इन पांच सालों में बीजेपी को उभरते हुये नेतृत्व की जरुरत है, आडवाणी जी को एक नये नेतृत्व को उभरने का मौका देना है और उसे मदद करनी है.

उन्हें देखना होगा कि बीजेपी सही राह पर चले… लेकिन अगली लड़ाई, अगली पीढ़ी के लिये होगी.

जय हिंद.

Wednesday, May 13, 2009

माओ कि मसखरियां

माओ इतने सालों तक चीन के सर्वोच्च पद पर रहे. इतने बड़े देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचे लोगों से अपेक्षा यह तो है ही कि उनमें ‘common sense’ नाम की uncommon चीज थोड़ी मिले, लेकिन विश्व के बाकी देशों से चीन अपवाद क्यों बने. अपने देश समेत हर देश में सनकी, गैर जिम्मेदार, और नाकाबिल लोग ही सर्वोच्च पदों पर ज्यादा पहुंचते हैं. खैर बात उनकी नहीं माओ की हो रही है. तो आज याद करते हैं माओ कि कुछ ऐसी मसखरियों को जिनकी कीमत चीन के लोगों ने गहरी चुकाई.maomaomao सचमुच माओ ने कुछ ऐसे अजीब फैसले लिये जिन्हें भीषण अदूरदर्शिता और सनक ही मान सकते हैं. देखिये तो जरा: -

1. चिड़ीमार माओ

माओ को सब लोग विश्व के पूंजीपतियों के दुश्मन के रूप में जानते हैं (यह वही ‘महान’ नेता हैं जिन्होंने स्तालिन को विश्वास दिलाया था कि वो पूंजीपति देशों के विनाश के लिये 30 करोड़ चीनीयों को कुर्बान करने से पीछे नहीं हटेंगे.) लेकिन कितने लोग यह जनते हैं कि प्यारे कम्युनिस्ट माओ चिड़ियों के भी कट्टर दुश्मन थे.

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भैया पांच चिड़िया मार दीं, अभी और कित्ती मार के माओ अंकल खुश होंगे?

1958 में उन्हें पता चला कि चीन के चावल चिडियां खा रहीं है इसलिये चीनी भूखें हैं. तो उन्होंने हुक्म पारित करा दिया – ‘मार चिड़िया’. चीन के किसानों, पदाधिकारियों को कहा गया कि चिड़िया उड़ाओ, चिड़िया के घोसले ढूंढ़-ढूंढ़ के तोड़ो, अंडे फोड़ दो, गुलेल से मार दो. तो लोग लग गये और चीन में लाखों चिड़ियाओं ने अपनी जानें गंवा दीं.

तो क्या चीन के चावल चिड़ियों से बच गये? लोग भूखे नहीं रहे?

नहीं भाई, बाद में बात खुली कि जितने चावल चीन की चिडि़या खातीं थीं उससे ज्यादा तो वे उन कीड़ों को खाती थी जो फसल बर्बाद करते थे. चिडि़यां मरीं तो कीड़ों की ऐश हो गयी. चिड़िया रहित चीन में टिड्डियों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हुई और इस हद तक बढ़ोतरी हुई कि फसलें टिड्डियों के पेट में गईं और चीन में अकाल पड़ा.

चीन के चावल टिड्डियां खा गईं.

2. गरीबमार माओ

माओ के धत्करम चिड़ियां मार कर ही रुक जाते तो क्या गनीमत होती, इन्होंने तो अपने देश के बाशिंदों को भी नहीं बख्शा. माओ को नारे गढ़ने का शौक था, चीनी भाषा में खूब आऊं-माऊं नारे गढ़े उन्होंने, उसमें से एक था ‘The great leap forward’ मैं इसका अनुवाद करूंगे ‘जेsss लंबी छलांग’.

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हमाला प्याला चेअलमैन माओ अंकल हमें छलांग लगवा लहे हैं

तो पहले माओ ने चीन को चलाया, फिर कुदवाया और तब भी दिल नहीं भरा तो ‘जेsss लंबी छलांग’ लगवायी.

इस जेsss लंबी छलांग में माओ ने चीन की कहानी कुछ यूं कर दी

1) स्वाधीन खेती के पर कतर दिये और किसानों को मजबूर किया कि वो झुंड के झुंड में पब्लिक खेती पर काम करे. इसके लिये उन्हें मजबूर किया गया कैद करके.

2) किसानों से सस्ते दरों में अनाज खरीद कर महंगे में बेचा, किसानों को सिर्फ सरकार को ही अनाज बेचने की इजाजत थी

3) घर-घर में गांव वालों को मजबूर किया गया कि वो लोहा बनाने के लिये भट्टी लगवायें और उन्हें लोहा बनाने का टार्गेट दिया गया. इस काम में लोग सब तरफ लकड़ी काटते डोलते रहे और टार्गेट पूरा करने के लिये लाखों ने अपने घर के बर्तन-भांडे गला डाले. नहीं करते तो माओ क्या करते वो हम बताना पड़ेगा आपको?

तो किसान को किसानी नहीं करनी दी, दे दनादन बेगार कराई (जिससे बचाने के लिये सत्ता में आये थे अपने कम्युनिस्ट शोषक). इसका असर यह हुआ कि खेत में अनाज पड़ा का पड़ा रह गया. लोगों को पार्टी के गुंडो ने परेशान किया (जैसा आजकल बंगाल में कर रहे हैं सीख कर) और गिनिये 1, 2, 3, नहीं पूरे 4.3 करोड़ लोग उस अकाल में मर गये जो इस सब नौटंकी के कारण पड़ा. कहते हैं उस बार चीन की 55 प्रतिशत भूमी अकाल ने चपेट डाली.

माओ की चंपू सरकार ने कितने ही लोगों को इस सब अत्याचार के बारे में खबर लीक करने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया.

भाइ अगर हिन्दुस्तान में ऐसा होता तो इतना तो है कि सरकार गिर जाती, लेकिन अपने कम्युनिस्ट एक बार काबिज होते हैं तो हटते हैं कहीं? उन्हें तो उखाड़ना पड़ता है.

3) यारमार माओ

इत्ता सब माओ ने करवा डाला तो कहीं से विरोध तो होना था? कुछ लोगों में तो होती है इतनी दम कि मृत्यु की कीमत पर भी गलत बात का विरोध किया जाये, तो ऐसे लोग उभरने लगे जो माओ की गलतियों के बारे में खुलकर बात करने लगे. आखिरकार जब माओ ने देख लिया कि सबको वो नहीं मार सकता तो माओ सत्ता के केंद्र से उतर गया और नाम का सत्ता अध्यक्ष हो गया, लेकिन माओ को क्या यह स्वीकार्य होता कि डेंग ज़ियाओपिंग और लिउ शाउकि देश को चला पायें.

lalsenagoonsतोड़ो, मारो, पीटो, खसोटो, अपना इतिहास बच न जाये

तो जब यह लोग सत्ता के केंद्र में आये तो माओ ने अपने इन पुराने दोस्तों की जड़ें खोखली करने का प्लान बनाय. उसने एक ‘सांस्कृतिक क्रांति’ करवाने के नाम पर नौजवान पीढ़ी को उकसाया, उन्हें गुटबंदित किया और एक नयी शक्ति बनाई जिसे नाम दिया गया ‘लाल रक्षक’ (The Red Guard).

तो क्या रक्षा की होगी इस ‘लाल सेना’ ने? इन लोगों ने क्रांति के नाम पर चीन के इतिहास को मिटा डालने में कसर नहीं छोड़ी. इन्होंने मूर्तियां तोड़ दीं, पुरातन इमारते ध्वस्त कर दीं, पुरानी बहुमूल्य किताबें जला दीं, यहां तक की परिवारों तक के लिखित इतिहास को मिटा दिया. ये था माओ का सांस्कृतिक कार्यक्रम.

ये इस हद तक हुआ कि जब यह लाल रक्षक चीन के ऐतिहासिक नगर ‘फोर्बिडन सिटी’ की तरफ बढ़ने लगे तो इस धरोहर के भी नष्ट हो जाने के डर से डेन्ग ज़ियाओपिंग ने शहर के दरवाजे बन्द करवा कर सेना तैनात करवा दी.

इस सेना ने के लोगों ने जासूसी कर के बहुत सारे लोगों को ‘क्रांति विरोधी’ करार देकर मौत के घाट उतरवाया. चाहे सरकार के उच्च अधिकारी हो, या निचले स्तर के, हर कोई डर में जीता था कि कब किसी भी बात पर उसे क्रांति विरोधी का नाम देकर टपका देंगे.

आखिरकार ये लाल सेना खुद ही गुटों में बंट गई और चीन की आधिकारिक सेना के हथियार आदी छीन कर जब उन्होंने आपस में लड़ना शुरु किया तो सरकार हरकत में आई और इस नालायकी का अंत किया.

तो माओ कि कुछ ऐसी दास्तानें आपने सुन ली जो ‘ईमानदार’ (या ईनामदार) कम्युनिस्ट लेखक आपको नहीं बताते. कम्युनिस्ट कारनामें और भी हैं, क्या-क्या कहें, क्या-क्या सुनायें.

Saturday, April 18, 2009

व्हाट अ कान्फीडेन्ट मैन!

ये सारे वो ‘कान्फीडेन्ट मैन’ हैं. इनका कान्फीडेन्स का राज इनका खुद पर नहीं अपने गुर्गों पर भरोसा है.

akshay pratap singh 
अक्षय प्रताप सिंह

anna shukla
अन्ना शुक्ला

Baleshwar Yadav
बालेश्वर यादव

Brij Bhushan Sharan Singh
बृज भूषण शरण सिंह

Munna Shukla 24 criminal charges
मुन्ना शुक्ला

owaisi
सलाउद्दीन ओवैसी

     afzalansari
अफज़ल अंसारी

dpyadav
डी पी यादव

guddu pandit   
गुड्डू पंडित

Pappu Yadav
पप्पु यादव

taslimuddin
तस्लीमुद्दीन

prabhunath singh
प्रभुनाथ सिंह

dadan
ददन पहलवान

shahabuddin    
शहाबुद्दीन

conf1
मुख्तार अंसारी

surajbhansingh
सुरजभान सिंह

ये सब आपका वोट चाहते हैं, ज्यादातर अपने लिये, और जिन्हें कानून के चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया है वो अपने रिश्तेदारों के  लिये.

  इन सबके चेहरे को देखिये

इनके चेहरे पर तारीख गवाही दे रही है. क्या आप उसे पढ़ सकते हैं?

Friday, April 17, 2009

कसाब को किस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है?

अजमल कसाब जब पहले-पहल पकड़ा गया तो रो-रोकर उसने मांग की कि उसको मार दिया जाये, लेकिन थोड़ी ही देर बाद रोना अस्पताल में इलाज करवाने के लिये था. जेल गया तो पहले सारा कच्चा चिट्ठा उगल मारा. बाप-भाई, बहनोई सबके पते दे दिये, लेकिन हिन्दुस्तानी मेहमाननवाजी तो पूरे जग में प्रसिद्ध है, थोड़े दिन सरकारी मुर्ग खाये तो मुटिया गया, हिन्दुस्तानी कानून का हाल-बेहाल भी पता चल गया, इसलिए आजकल वो अपराधी नहीं नेताओं की तरह मांगे कर रहा है.

मुझे यह दो, मुझे वह दो, यह कैदी भी सुविधापरस्त हो चला है. जब ऐसी टोटल ऐश हो तो क्या डर कानून का, इसलिये अदालत में मजे से अपने बयान से मुकर गया. उसने कहा कि बयान तो दबाव में दिया था मैंने.

अगर इसकी जगह कोई और देश होता (जैसे चीन या रूस) तो पट से ट्रायल, और फटाक से फांसी तक पहुंच चुका होता कसाब. कसाब के अपराध को साबित करने के लिये भी लंबा मुकदमा चाहिये?

चलिये अब मुद्दे की बात पर आते हैं. आखिर कौन से कानून हैं वो जिनका उल्लंघन कसाब ने किया जब वो मुम्बई में लोगों की जानें लेने निकला (पूरे 166 लोगों को मारा इन इस्लामिक आतंकवादियों ने).

1. किसी व्यक्ति की जान लेना.
2. देश के खिलाफ युद्ध
3. लूट
4. खूब सारे और छोटे-मोटे कानून...

कानूनों कि लिस्ट लंबी है, और कसाब पर फाइल की गई चार्जशीट भी.... दिल थाम के सुनिये .... 1000, 2000, 3000.... नहीं, पूरे 11,000 पेज की है (पाकिस्तान के बाबा आजम के भी दद्दु गजनी के ताऊ से शुरु की होगी गपड़चौथ)

इस चार्जशीट को पढ़ने और समझने में लगेंगे जज को 20 साल, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाते-जाते और फैसला होते-होते कसाब भी अपनी हूरें कब्जाने जन्नतनशीन हो चुका होगा (बुढ़ापे से मरेगा)

अच्छा वो कानूनों की सूची पढ़ ली थी न आपने? सही सूची है न? कुछ कमीबेशी?.... नहीं है?

भाई आपको बता दें कि महाराष्ट्र (कांग्रेस का शासन है जी इधर) में एक धांसू कानून और है जिसे कहते हैं मकोका (MCOCA). नाम याद रखना. इस धांसू कानून के अंतर्गत कुछ और आतंकवादी बंद हैं जिन पर फौरन कांग्रेस के सेक्युलर सरकार ने मकोका चिपका दिया था और वो जेल में सड़ रहें हैं. वो थे 'हिन्दू आतंकवादी' प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित. कांग्रेस को भरोसा है कि प्रज्ञा और पुरोहित कसाब से ज्यादा खतरनाक हैं जिन पर ज्यादा कठोर कानून लगना चाहिये.

वैसे ये भी पता होना चाहिये कि अगर कसाब पर मकोका लगा होता तो वह आज अदालत में मुकर नहीं पाता क्योंकि मकोका के अंतर्गत उच्च पुलिस अधिकारी के आगे दिया बयान मान्य होता है. अब जब कसाब अपने हल्फिया बयान से मुकर गया तो पुलिस की सारी कार्यवाही नये सिरे से होगी (मतलब अफजल को नया हमसाया मिल गया).

और भी जबर्दस्त खबर सुनेंगे?

कसाब के वकील (वही जो दाउद के गुर्गों के मुकदमे लड़ता रहा है) ने कहा कि भैया कसाब तो एकदम बच्चा है. उस पर मुकदमा बच्चों के कोर्ट में चलाया जाये, इस कोर्ट को कोई हक नहीं सुनवाई की. अब समझे वाघमारे को हटाने का राज? जैसे-जैसे केस पुराना होगा, कसाब के खिलाफ तथ्य हल्के होंगे और उसके पक्ष में मजबूत.

अब तो यह सोचता हूं कि क्यों तुकाराम ओंबले ने जान देकर इस हरामखोर को जिंदा पकड़ा, ठोक देना था वहीं.

क्या आप में से कोई मुम्बई की चुनी हुई सरकार से पूछेगा कि उसे कसाब मकोका के लायक क्यों नहीं लगा?

Monday, April 13, 2009

हिमाकत देखिये… गलत वक्त पर सही बात!

चुनाव का समय है, आजकल नेतादर्शन कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं. नेतागण टीवी पर भारी डिबेटें कर रही हैं और उसमें लचर-लचर दलीलें आंय-बांय बक रहे हैं, हम मुंह फाड़े झेल रहे हैं.

ऐसी ही एक दलील का पोस्टमार्टम करते हैं

दलील है – गलत वक्त पर सही बात

बानगी पेश है : आडवाणी ने देश का पैसा वापस मंगाने की बात अब ही क्यों उठाई… क्यों उठाई अब? बोलो? जवाब दो… अब ही क्यों?

chup karटेप लगा दो मुंह पर, फिर नहीं बोलेगा. 

क्यों भैया कोई खास मुहुर्त चल रहा है इस समय जिसमें देश कि भलाई की बात करना मना है? भाई मेरे तुम ये न पूछ रहे कि बाकियों ने अब भी क्यों नहीं उठाई, तुम ये पूछ रहा हो कि जिसने उठाई उसने भी क्यों उठाई?

घसियारा लाजिक है. बल्कि घास चरके लीद किया हुआ लाजिक है.

देश हित की बात है. देश का पैसा है. टैक्स दिये बिना, घूस-वूस में कमा के देश के बाहर भेज दिया. कोई लाख-दो लाख नहीं 25 हजार करोड़ है. अगर कोई आदमी चुनाव के समय ही सही, अगर यह कहे की भैया देशचोरों से पैसा वापस लाना है तो इन्हें ऐतराज है?

खबर तो पिछले साल से है कि जर्मन सरकार नाम बतलाने के लिये तैयार थी. यहां तक की नवंबर में मैंने भी इसका जिक्र किया था (http://wohchupnahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html, नीचे जा के पहला पाइंट देखिये) अपने पत्रकार भाई लोग तो बिना बात की बकवास करके नोट जुटाने में चिपे थे… तो भैया तब तो न उन्होंने, न तुमने इस बात का जिक्र किया. तकिये के नीचे दबाकर बैठे थे. अब अगर बात उठी है तो इसे उड़ाने की बजाय बिठाकर गौरवान्वित कर रहे हो़? नेता लोग तो पहले ही अजब-गजब थे, और अब अपने देश के पत्रकार गजब-अजब हो रहे हैं.

इधर कोई चिल्ल मचा रहा है ‘ऐं क्यों बोला अब..’ उधर कोई बिलबिला रहा है ‘ओये.. अब क्यों बोला..’

सच्ची-सच्ची बोलूं?

बात यह नहीं है कि अब ही क्यों बोला.. बात यह है कि भैया -- क्यों बोला!… बोला ही क्यों! --  क्यों ही बोला!…

अब नहीं भी बोलता तो जब भी बोलता तब भी ‘अब बोला?’ कर देते अपने गुणीजन.

अबे थोड़ी तो शर्म करो… क्या इसी दिन के लिये देश का नमक खा कर बड़े हुये हो?

Sunday, April 12, 2009

समाजवादियों का मेनिफेस्टो… हंसी के गुलगुले

लोग सपा के मेनिफेस्टो पर हंस रहे हैं बहुतों का कहना है कि ऐसी बेवकूफी पहले नहीं देखी. इन्टरनेट पर जिस भी जगह मेनिफेस्टो के बारे में पढ़ा तो उस टिप्पणी करने वालों ने गुस्सा नहीं हंसी का इजहार किया. सचमुच अमिताभ के छोटे भाई, अनिल अंबानी के दोस्त ने जो गुल खिलाया है उससे गुलगुली होती है.

लेकिन भाई जरा टेक्स्ट का सबटेक्स्ट पढ़ना सीखो. इस मेनिफेस्टो की अपील कहीं और ही है. जरा इसके प्रस्तावों पर गौर करते हैं. होली की भांग का नशा, चढ़ा हुआ है अब तक. बेचारे


होरी की भांग अब तक
ना उतरी भैया
  1. अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा बंद करेंगे. (यह देशभाषा प्यार है?)
    तालिबान ने भी अफगानिस्तान में अंग्रेजी शिक्षा बंद करा दी थी हम करा देंगे तो अपन को कुछ खास वोट तो मिलेंगे.

  2. सारे आफिसों में से अंग्रेजी गायब करा देंगे.
    क्या चलायेंगे जनाब? उर्दू या हिंदी यह भी बता देते.

  3. सारे कम्पयुटरों को आफिसों और शिक्षा स्थलों से गायब कर देंगे
    वैसे भी ज्यादातर मदरसे कम्प्युटर क उपयोग नहीं करते (सिवाय उनके जहां समझदार लोग हैं).

  4. सारे कृषि उपकरण बंद करा देंगे. ट्रेक्टर की जगह बैल चलायेंगे
    बहुत अच्छे, इन बुलों से बुलशिट लेकर देश में बांटने में आसानी होगी

  5. शेयर बाजार बंद कर देंगे
    फिर अनिल अंबानी का क्या होगा? छोटा भाई नाराज हो जायेगा.

  6. बड़े-बड़े वेतन पाने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही करेंगे
    भाई देश में बस एक ही अमर अर्रे… अमीर आदमी चलेगा… और कौन अपने अमीर सिंह (भैया 7 मिलियन डालर की मिल्कियत वाला तो खुद को खुल्ले में कहते हैं अमीर सिंह जी)

  7. मालें बंद करा देंगे
    शुरुआत सहारा माल से कराओगे चाचा या बत्ती दे रहे हो?

  8. सारी प्राइवेट कम्पनी में कम से कम मजदूरों के स्तर का वेतनमान करा देंगे
    सही है इनकी सरकार बनी तो वैसे भी पूरे देश को यही वेतनमान नसीब होगा.

  9. सारी महंगी शिक्षा बंद करा देंगे
    वैसे भी देश में इंजीनियर, वैज्ञानिक, डाक्टर ज्यादा हो गये हैं.

  10. पाकिस्तान और बांग्लादेश से दोस्ती बढ़ायेंगे
    हमारे भविष्य के वोटर वहीं से तो आने हैं. है न अमीर सिंह जी?

  11. सांप्रादायिक ताकतों पर वार कर आतंक को जड़ से मिटा देंगे
    देश के सारे हिंदुओं को नष्ट कर दिया जाये तो किसके खिलाफ होगा आतंक?

  12. बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देंगे
    रोजगार देने से ज्यादा आसान है.

  13. वकीलों और व्यापारियों के लिये योजनायें बनायेंगे
    वकीलों कि तो जरुरत पड़ेगी अगर यह सब कर दिया भैया, और व्यापारी जब आप उनका भरता बना दोगे तो भत्ता देना होगा न.

  14. किसानों की समस्याओं पर ध्यान देंगे
    देना, ध्यान देना बहुत समस्यायें मिलेंगी जब उनके ट्रेक्टर छीन कर, उनके कृषी उपकरण हथिया कर आप उन्हें आदिम युग में धकेल दोगे.

Sunday, March 29, 2009

हम क्या कहते हैं, वो क्या सुनते हैं, वो जो सुनते हैं, हम कब कहते हैं

आडवाणी की प्रेस कांफ्रेंस का लाइव टेलेकॉस्ट देख के हटा हूं, अच्छा हुआ की लाइव देख ली वरना इन  पत्रकारों की ताजी बदतमीजी को समझ नहीं पाता. पता नहीं ये किस आटे का पिसा खाते हैं. क्या ये उसी समाज की उपज हैं जहां उन लोगों का जन्म हुआ जो अपने कर्तव्य और देश के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी दे गये.

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आज आडवाणी ने प्रेस कांफ्रेस बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे के लिये बुलवाई थी मुद्दा था देश का 25 लाख करोड़ रुपया जो कि काला धन बनकर स्विस बैंको में चला गया है.

कुछ समय पहले जर्मन गर्वनमेंट के हाथ उन लोगों की जानकारी लगी जिनका पैसा स्विस बैंकों में जमा है, उन्हें यह भी पता लगा कि किसका कितना पैसा है वहां. तो उन्होंने सारी दुनिया में ऐलान किया कि जो-जो देश हमसे पूछेगा, हम उन्हें बतायेंगे कि वहां पर किस आदमी का कितना-कितना धन इन बैंकों में है.

इस बात को कई महीने हो गये, एक दो अखबारों में खबरें भी छपी (लेकिन सत्ता के गुलाम पत्रकारों को देशहित नहीं दिखता, इसलिये यह खबरें उतनी तक नहीं दिखाई गयी जितना ये लोग बार गर्लों को दिखा देतें हैं). बिरादर, देश का 25 लाख करोड़ रुपया बाहर भेज दिया गया, और यह भी जानिये कि हम महान हिन्दुस्तानीयों को एक और रुतबा हासिल है, सारे देशों में पैसे जमा करने में हमारा नंबर 1 है, मतलब भारतियों का सबसे ज्यादा पैसा जमा है वहां. वाह रे देश की सरकारों, बहुत रुकवाया करप्शन तुमने पिछले 60 सालों में.

जिस समय यह खबर आई उस समय आडवाणी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर जर्मनी से उन हिन्दुस्तानियों के नाम पूछने का सुझाव दिया जिनका पैसा वहां जमा है, तो बिरादर अपने महाशक्तिशाली प्रधानमंत्री तो नहीं, लेकिन वित्त मंत्रालय की तरफ से टालू जवाब आ गया.

तो आडवाणी ने प्रेस कांफ्रेस बुलाई थी इसलिये कि वो कहें कि है बलशाली प्रधानमंत्री मनमोहन जी, आप जी-20 सम्मेलन में जा रहे हैं वहां मिलेंगे आप जर्मनी के चांसलर से भी, तो हे मनमोहन जी वहां इस बात को उठायियेगा, वहां कहियेगा कि बिरादर दे दो हमें उन लोगों की सूची जिन्होंने देश का पैसा बाहर जमा कर रखा है. और यह बात पब्लिक फोरम पर आडवाणी ने इसलिये कही कि पिछले पत्र की तरह यह भी दबा न दी जाये.

पूरी प्रेस कांफ्रेंस में आडवाणी ने बताया की किस तरह इस पैसे का इस्तेमाल देश की बेहतरी के लिये होना चाहिये, और उन्होंने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया, और यह भी कहा कि वो जरूर पूछेंगे जर्मनी से कि बताओ उन लोगों के नाम जिन्होंने देश को चूना लगा लगा कर पैसा स्विस बैंकों में भेज दिया.

एक पत्रकार ने उनसे कहा कि अगर उन लोगों के नाम पता चल गये जिनका इतना पैसा जमा है तो भूचाल आ जायेगा. तो आडवाणी ने उससे कहा कि मैं चाहता हुं कि ऐसा हो, उन लोगों के नाम खुलें जिससे देश का पैसा देश में वापस आ पाये.

उन्होंने इस प्रेस कांफ्रेंस में यह भी बताया कि बीजेपी की सरकार बनने पर वो देश में शिक्षा के लिये काम करने के लिये प्रतिबद्ध हैं, और देश में उच्च कम्प्युटर शिक्षा लाने के लिये प्रतिबद्ध हैं.

लगभग 45 मिनिट चली यह प्रेस कांफ्रेस, और बातें सारी यहीं हुईं, लेकिन अंत होते-होते एक सयाने पत्रकार ने पूछ लिया कि वरुण गांधी पर क्या खयाल हैं, तो आडवाणी ने वही कहा जो वह कहते हैं आ रहे हैं, कि वरुण ने कहा है कि बयान मेरा नहीं है.

और भाई मेरे, इन महान पत्रकारों की जमात ने 45 मिनिट की कांफ्रेंस में से क्या निष्कर्ष निकाला सिर्फ आखिरी पांच मिनट? इन्होंने निकाला

'आडवाणी ने वरुण का बचाव किया'

  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने कहा कि देश का 285 करोड़ रुपया काला धन बन चुका है
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने मनमोहन से उन लोगों का नाम पूछने को कहा जिनका पैसा है यह
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि इस पैसे को देश में वापस लाना है
  • इन्होंने यह नहीं सुना कि आडवाणी ने कहा कि भूचाल आये तो भी उन लोगों के नाम जगजाहिर होने चाहिये
  • इन्होंने बस वही सुना जिसे सुनने की परमिशन इनके आकाओं ने दी.
  • इन्होंने सुना बस वरुण, देश को यह भूल गये

जिस-जिसने यह प्रेस कांफ्रेस देखी हो, और बाद में इसके बारे में पत्रकारों की कवरेज देखी हो, उसका खून आज खौल उठा होगा.

जय चौथा खंभा...

और बीजेपी, वक्त आ गया है कि तुम भी whitehouse की तरह से Youtube पर अपना चैनल लगाओ और अपने भाषण, वक्तव्य और प्रेस कांफ्रेसों के विडियो वहां डालो. कम से कम देश अगर कोई रेफ्रेंस चाहे, तो वह तो मिले.

Saturday, February 14, 2009

देश को अपने काम कि हफ्तावार रपट देना… क्या कोई हिन्दुस्तानी नेता ऐसा करेगा?

प्रेसिडेन्ट ओबामा ने बदलाव (Change) का वादा किया था, और धीरे-धीरे इस बात के चिन्ह दिखने लगे हैं कि बद्लाव हो रहा है. सबसे पहला और सबसे जरुरी बद्लाव जो दिख रहा हे, वह है पारदर्शिता.

ओबामा ने कई पहल की हैं जिनसे लगता  है कि लक्ष्य जनता को मूढ़ मान कर जानकारी से दूर रखना नहीं, बल्कि जानकारी को उसके नजदीक लाना है.

obama

कुछ ही हफ्तों पहले ओबामा ने एक नई शुरुआत की. Youtube पर White house के Channel पर उन्होंने देश को इस बात की हफ्तावार रपट देने शुरु किया है कि पूरे हफ्ते में उन्होंने क्या किया, किस तरह कि दिक्कतें उन्हें आईं, और क्या समाधान उन्होंने ढूंढ़े. अगर कोई नया कानून या कदम उन्होंने लिया तो उसका ज़िक्र भी वो वहां करते हैं. और देश में क्या गलत हो रहा है, उसके खिलाफ आवाज भी वो उठाते हैं (उसे पर्दे के पीछे छुपाने की कोशिश करने के बजाय).

तो उन्होंने अमेरिकी जनता को बताया कि किस प्रकार वो देश में आये आर्थिक संकट से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने लोगों को संकट से लड़ने कि प्रेरणा भी दी, और उन कदमों से अवगत कराया जो वो ले रहे हैं. और साथ ही उन्होंने उन वाल-स्ट्रीट कि कंपनियों को चेतावनी भी दी जिन्होंने अपने उच्च-पद के लोगों को इस संकट काल में करोड़ों डालर बोनस के रूप में दिये. उन्होंने कहा कि अमेरिका को इस तरह का ‘लालच’ बर्दाश्त नहीं.

ओबामा ने अभी-अभी अमेरिकी कांग्रेस से 700+ बिलियन डालरों को आर्थिक संकट से जूझने के लिये पारित करवाया है. और उन्होंने इन रुपयों के खर्च के ब्योरा देने के लिये एक वेबसाइट की घोषणा की जहां लोग देख पायेंगे की पैसा कहां खर्च हुआ और इस खर्चे पर अपने विचार भी रख पायेंगे. इसका इस्तेमाल यकीनन इस बात को निश्चित करने में होगा की पैसा इमानदारी से खर्च हो, क्योंकि खर्च और उसका प्रभाव सब देख रहे हैं.

अब कुछ सवाल

1. क्यों नहीं हिन्दुस्तान में उच्च पदाधिकारी अपने काम का ब्यौरा अपने डिपार्टमेन्ट की वेबसाइट द्वारा लोगों को दें. यह तो एक वेबकैम से संभव है.

2. क्यों न सभी कल्याणकारी योजनाओं कि एक वेबसाइट हो जहां यह जानकारी विस्तार में हो कि पैसा कहां खर्च हुआ (वाउचर स्कैनिंग, व पाने वालों के नाम सहित). और यहां लोगों की शिकायत के लिये जगह भी हो.

इस सब में खर्च बहुत ज्यादा नहीं होने वाला, और अगर ऐसा हो पाये तो जितना पैसा बेईमान लोगों द्वारा डकारे जाने से बचकर आयेगा, उससे भरपाई हो जायेगी.

Better transparency will lead to better governance.

और ओबामा को इस तरह की कोशिश के लिये मुबारकबाद.

आप भी ओबामा की हफ्तावार रपट जरूर देखें. और जोर दें की हमारे यहां भी बदलाव आये.

Wednesday, January 14, 2009

आप किसे बनायेंगे देश का अगला प्रधानमंत्री

अगला लोकसभा चुनाव अब कुछ खास दूर नहीं. ज्यादातर पार्टियों में चुनावों की सुगबुगाहट शुरु हो चुकी है, और कुछ जगहों में मतदाताओं को जोड़ने का काम भी जारी हो चुका है. यह चुनाव देश के लिये निर्णायक दिशा तय करेंगे ऐसी मान्यता है.अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो आडवाणी भी अटल बिहारी की तरह देश के प्रधानमंत्री के तौर पर राजनीति में अपनी आखिरी पारी खेलेंगे, और अगर कांग्रेस जीतती है तो ना-नुकुर करते हुये राहुल गांधी जबरदस्ती प्रधानमंत्री बना दिये जायेंगे.

अगर फैसला आपके हाथ हो तो आप किसे प्रधानमंत्री चुनेंगे.

आडवाणी को?

या

राहुल गांधी को?